पिछले कुछ दिनों से दुनिया के सबसे बड़े और मजबूत लोकतंत्र में सबसे अधिक चर्चा इस बात को लेकर हो रही है कि क्या लोगों का वोट चोरी हो रहा है ? क्या चुनाव चोरी हो रहा है ? क्या Special Intensive Revision यानी SIR के नाम पर लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटाए और जोड़े जा रहे हैं ? क्या चुनाव आयोग में भीतरखाने गड़बड़झाला चल रहा है? क्या चुनाव आयोग में सिर्फ मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की मनमानी चल रही है ? फिर तीन सदस्यीय चुनाव आयोग का मतलब क्या रह जाता है ? विपक्षी पार्टियां चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल खड़ी कर रही हैं. कॉकरोच जनता पार्टी के कार्यकर्ता अब ज्ञानेश कुमार का विकेट लेने पर अड़े हैं. ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का आखिर क्या होगा ? सवाल ये भी है कि देश भर के 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में SIR के तहत जारी ड्राफ्ट मतदाता सूचियों से 13 करोड़ से अधिक नाम हटाए गए. क्या वो वाकई मतदाता नहीं थे ? अगर थे– तो उनका वोट का अधिकार छीनने के लिए जिम्मेदार कौन है ? आखिर, चुनाव आयोग को SIR प्रक्रिया के दौरान वोटर लिस्ट में छूटे नाम जोड़ने के लिए खास अभियान चलाने की जरूरत क्यों महसूस हुई ? दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में लोगों का चुनाव आयोग को लेकर भरोसा हिला या बरकरार है ? अगर लोगों का चुनावी प्रक्रिया से भरोसा उठ गया – तो ये किसी सरकारी आदेश या कानून से जल्दी वापस तो नहीं आएगा ? ऐसे में आज मैं आपको बताने की कोशिश करूंगी कि आखिर चुनाव आयुक्तों के बीच किस तरह का रिश्ता रहा है? लोगों का भरोसा बहाल रखने के लिए चुनाव आयुक्तों का आचार-विचार कैसा होना चाहिए ? अक्सर चुनाव आयोग सवालों में क्यों रहता है ? आजादी के बाद से लेकर अबतक चुनावी प्रक्रिया को बेहतर और पारदर्शी बनाने के लिए किस तरह के रास्ते चुने गए ? आज कुछ ऐसे ही सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश करेंगे.
हमारे संविधान की प्रस्तावना हम भारत के लोगों से होती है. हम भारत के लोगों ने संविधान के अनुच्छेद 324 के तरह चुनाव आयोग बनाया. चुनाव आयोग को लोकसभा, राज्यसभा, विधानसभाओं, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति का चुनाव कराने की जिम्मेदारी सौंपी. क्योंकि, अपनी वोट की ताकत से ही हम भारत के लोग तय करते हैं कि कौन हमारी विधानसभा में नुमाइंदगी करेगा और कौन संसद में ? कौन लोगों की बेहतरी के लिए सबसे बढ़िया विकल्प हो सकता है ? एक बड़ा सच ये भी है कि हम भारत के लोगों का संविधान, स्वतंत्र न्यायपालिका और निष्पक्ष चुनाव आयोग में अटूट भरोसा रहा है. अगर भारत में पाकिस्तान या बांग्लादेश की तरह कभी तख्तापलट नहीं हुआ – तो इसकी एक बड़ी वजह हमारी निष्पक्ष चुनाव व्यवस्था रही है, जिसे पवित्र बनाए रखने की जिम्मेदारी चुनाव आयोग की है. भले ही भारत 15 अगस्त, 1947 को आजाद हो गया…भले ही 26 जनवरी, 1950 को गणतंत्र बन गया. लेकिन, गणतंत्र को लोकतंत्र में बदलने जिम्मेदारी चुनाव आयोग के कंधों पर थी. पूरे देश में एक साथ चुनाव कराने की बड़ी चुनौती थी. भारत में आजादी के साथ ही सभी वयस्कों को वोट देने का अधिकार मिला . आजाद भारत की 36 करोड़ आबादी में से करीब साढ़े सत्रह करोड़ लोग वोटर बने. जिसमें से 85 फीसदी लोग पढ़-लिख नहीं सकते थे. तब चुनाव कराने की जिम्मेदारी सुकुमार सेन पर थी. लोकसभा और राज्यों के विधानसभा लिए चुनाव साथ-साथ होने थे. ऐसे में बड़ा सवाल यही था कि इतने बड़े देश में आखिर वोटिंग कैसे कराई जाए ?
लंबी लड़ाई के बाद आजादी मिल गयी. लंबी जिरह के बाद संविधान तैयार हो गया लेकिन, सही मायनों में लोकतंत्र बनना अभी बाकी था. भारत के लोगों को फैसला करना था कि संसद और विधानसभाओं में उनकी नुमाइंदगी कौन करेगा ? इसके लिए चुनाव कराना जरुरी था. लेकिन, बड़ा सवाल ये था कि आखिर इतने विशालकाय देश में चुनाव कैसे हो ? जिस मुल्क के करीब 85 फीसदी लोग अपना नाम भी नहीं लिख-पढ़ पाते थे. वो आजादी की फिज़ा में किस तरह सरकार चुनने में अपनी भागीदारी निभाएं. ऐसे कई सवालों पर लगातार माथाचच्ची कर रहे थे – देश के पहले चुनाव आयुक्त सुकुमार सेन.
चुनाव आयोग के अधिकारियों ने बहुत कड़ी मेहनत के बाद 17 करोड़, 32 लाख 12 हज़ार 343 वोटरों का रजिस्ट्रेशन किया. क्योंकि, 21 वर्ष से ऊपर के सभी नागरिकों को वोटिंग का अधिकार दिया गया था. ऐसे में तय हुआ कि बैलेट पेपर पर किसी भी उम्मीदवार का ना नाम होगा. ना चुनाव चिन्ह. मत पेटियों पर उम्मीदवार का चुनाव चिन्ह चिपका दिए गए. बैलेट पेपर पसंदीदा उम्मीदवार की पहचान वाले बैलेट बॉक्स में गिराने की व्यवस्था की गई.
लोकसभा और राज्यों के विधानसभा चुनाव साथ-साथ होने तय हुए. चुनावी दंगल का दायरा करीब एक लाख वर्ग मील में फैला हुआ था. आजाद भारत में लोकतंत्र की पहली परीक्षा में 53 राजनीतिक पार्टियां मैदान में खड़ी थीं. जो सभी अपने-अपने तरीके से नए भारत को गढ़ने का वादा लोगों के बीच कर रही थी. कड़ी परीक्षा चुनाव आयुक्त सुकुमार सेना की भी थी. चुनाव में सुरक्षा के लिए मतदान केंद्रों पर गड़बड़ी रोकने के लिए भारी तादाद में पुलिस के जवानों को भी लगाया गया.
25 अक्टूबर, 1951 को पहला वोट हिमाचल की चिनी तहसील में पड़ा. पूरी प्रक्रिया 21 फरवरी 1952 तक चली. दूर-दराज के कई इलाकों तक चुनाव अधिकारियों को मतदान केंद्रों तक पहुंचने के लिए भारी दिक्कतों का भी सामना करना पड़ा. रामचंद्र गुहा अपनी किताब India After Gandhi में मिजोरम में बर्मा बॉर्डर से लगे इलाकों में बने पोलिंग बूथ का जिक्र करते हुए एक पत्रकार के हवाले से लिखते हैं – इस इलाके (मिजोरम बॉर्डर) में रहने वाले लोग लड़ाई के दौरान लगनेवाली कतारों के सिवाए किसी दूसरी तरह की कतार के बारे में नहीं जानते थे. लेकिन, उन्होंने इस चुनाव का बड़ी जोर-शोर से स्वागत किया. वे कई दिनों तक सफर कर मतदान केंद्रों तक पहुंचे. इस दौरान वे मुश्किल जंगल और घाटियों से गुजरे, वहां रात्रि विश्राम किया और आग के चारों ओर सामुदायिक नृत्य किया. इस तरह मिजो समुदाय के 92 हजार लोग, जिन्होंने शताब्दियों से किसी मुद्दे का फैसला तीर और कमान से ही किया था, वे पहली बार मतपत्र के जरिए अपना फैसला सुनाने के लिए सामने आए थे.
लोकतंत्र की पहली परीक्षा में करीब 60 फीसदी वोटरों ने हिस्सा लिया . स्वतंत्र भारत में लोगों ने अपने विवेक से संसद और विधानसभाओं के लिए प्रतिनिधियों का चुनाव किया. लोकतंत्र की पहली चुनावी परीक्षा ने भारत को एक नए मुकाम पर पहुंचा दिया और दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश बन गया. सुकुमार सेन ICS अफसर थे. लेकिन, आजाद भारत के वोटरों की स्थिति और मिजाज से परिचित थे. ऐसे में लोकतंत्र की मजबूती और लोगों की चुनावी व्यवस्था में भरोसा कायम करने के लिए वोटिंग की प्रक्रिया इतनी आसान बनाई गयी – जिससे हर व्यक्ति अपनी समझ के हिसाब से अपने वोट के अधिकार का इस्तेमाल कर सके. उसे इस बात का एहसास रहे कि जो सरकार बनी है – वो उसके वोट की ताकत से बनी है. इसलिए उम्मीदवारों के निशान वाले चुनाव चिन्ह रखे गए. हर पार्टी के लिए अलग बैलेट बॉक्स रखा गया था. करीब चार महीने तक चली चुनावी प्रक्रिया के बाद केंद्र और राज्यों में लोगों द्वारा चुनी गई सरकार बनी. चुनाव-दर-चुनाव आयोग भी लोकतंत्र की मजबूती के लिए बदलाव के पथ पर आगे बढ़ने लगा और 1960 के दशक में एक ही बैलेट पेपर पर सभी उम्मीदवारों के नाम और चुनाव चिन्ह वोटरों को दिया जाने लगा. बैलेट पेपर अलग-अलग बक्सों की जगह एक ही बक्से में डाले जाने लगे. चुनावी प्रक्रिया को आसान और पारदर्शी बनाने के लिए आयोग नए-नए रास्ते खोजने लगा. चुनावों को सत्ताधारी पार्टी के प्रभाव से पूरी तरह मुक्त रखने के लिए भी Election Commission लगातार मंथन कर रहा था. इस कड़ी में पहली बड़ी पहल 1960 के केरल विधानसभा चुनाव के दौरान हुई…जब आदर्श आचार संहिता के तहत बताया कि चुनाव के दौरान क्या करना है और क्या नहीं ?
चुनाव आयोग का ध्यान अब उन कमियों की ओर जाने लगा, जिन्हें लोकतंत्र की मजबूती के लिए दुरुस्त करना जरुरी था.
चुनावी प्रक्रिया को और पारदर्शी बनाने के लिए द रजिस्ट्रेशन ऑफ इलेकटोरल रुल्स,1960 लाया गया. फिर कन्डक्ट ऑफ इलेक्शन रुल्स,1961 वजूद में आया. मतदाता सूची अपडेट करने से लेकर चुनाव कराने की प्रक्रिया तक में सुधार की गाड़ी तेजी से आगे बढ़ने लगी. उस दौर में चुनाव के दौरान आचार संहिता की बात भी जोरशोर से उठने लगी. सियासी पार्टियों के साथ बातचीत और सहमति के बाद एक दस्तावेज तैयार हुआ. जिसमें बताया गया कि चुनाव के दौरान क्या करना है और क्या नहीं. साल 1960 के केरल विधानसभा चुनाव से आदर्श आचार संहिता की शुरूआत हुई? साल 1962 के आम चुनाव में सभी राजनीतिक दलों को चुनाव के दौरान आचार संहिता की लक्ष्मण रेखा दिखाई गयी.
1967 के लोकसभा और विधानसभा चुनावों में सूबाई सरकारों से कहा गया कि वे राजनीतिक दलों से आचार संहिता के पालन करने के लिए कहें. उसके बाद चुनावों में आदर्श आचार संहिता का कड़ाई से पालन होने लगा. साल 1967 में देश के कई राज्यों में सत्ता का मिजाज बदला. गठबंधन सरकारें बनीं… लेकिन, सत्ता के किसी भी प्रभाव से पूरी तरह मुक्त रहते हुए चुनाव आयोग लोकतंत्र की गाड़ी आगे बढ़ाने में लगा रहा. इससे सत्ता में बैठे राजनीतिक पार्टियों और सत्ता से बाहर खड़ी पार्टियों दोनों को ही अपने लिए पूरी संभावना दिख रही थी. कांग्रेस, कम्युनिस्ट, सोशलिस्ट, हिंदुत्ववादी सबको अपने लिए बड़ा सियासी आसमान दिखाई दे रहा था और इसकी एक बड़ी वजह थी – निष्पक्ष चुनाव आयोग.
चुनाव आयोग को और निष्पक्ष बनाने और चुनावों में धनबल और बाहुबल का इस्तेमाल रोकने के मकसद से साल 1974 में तारकुंडे समिति का गठन किया गया. इस कमेटी ने सुधार के लिए कई सिफारिशें की. चुनाव आयोग में भारत के लोगों का भरोसा तब और बढ़ा . जब इमरजेंसी के बाद हुए चुनावों में इंदिरा गांधी की अगुवाई वाली कांग्रेस चारों खाने चित हो गई. और दो साल बाद लोगों की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरने की वजह से जनता पार्टी भी चुनाव हार गई और कांग्रेस की सत्ता में दोबारा वापसी हुई.
1970 के दशक में राजनीतिक गलियारों में कहा जाने लगा इंडिया इज इंदिरा और इंदिरा इज इंडिया. लेकिन, हमारी संवैधानिक संस्थाएं लोकतंत्र की जड़ों को सींचने का काम करती रहीं. वो साल 1975 का था. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के 1971 के लोकसभा चुनाव को अमान्य घोषित कर दिया था. कोर्ट ने चुनाव में सरकारी मशीनरी के इस्तेमाल से जुड़े आरोपों को लेकर फैसला सुनाया था. इसके बार देश में इमरजेंसी लगी और फिर चुनाव की घंटी बजी. लोगों ने अपनी वोट की ताकत से कांग्रेस को सत्ता से आउट कर दिया. खुद इंदिरा गांधी रायबरेली लोकसभा सीट पर चुनाव हार गयीं. लेकिन, उन्होंने चुनाव पर सवाल नहीं उठाया. लोगों के फैसलों को दोनों हाथ जोड़कर कुबूल किया और जनता द्वारा तय भूमिका में चली गयीं. ये हमारे राजनीतिक दलों का. हमारे देश के लोगों का चुनाव आयोग में भरोसा है. 1980 के दशक तक देश की राजनीति का चरित्र पूरी तरह बदल चुका था. चुनाव जीतने के लिए अलग तरह के हथकड़े आजमाए जाने लगे थे. ऐसे में Election Commission के सामने चुनौती ये थी कि चुनावों के दौरान हिंसा को कम कैसे किया जाए ? बोगस वोटिंग जैसी घटनाओं को कैसे खत्म किया जाए. हफ्तों चलने वाली वोटों की गिनती को मिनटों में कैसे निपटाया जाए. इस दिशा में एक बड़ा कदम साल 1982 में उठाया गया. केरल के पारुर विधानसभा क्षेत्र में पहली बार चुनाव के दौरान EVM यानी Electronic Voting Machine का इस्तेमाल हुआ. ये भारत में बैलेट पेपर युग के खात्मे की दिशा में पहला कदम था. साल 1984 के आम चुनाव में कांग्रेस को 400 से अधिक सीटें मिलीं. राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने. लेकिन, अगले आम चुनाव यानी साल 1989 में लोगों ने कांग्रेस को खारिज कर दिया. लेकिन, राजीव गांधी ने चुनावी प्रक्रिया या चुनाव आयोग पर सवाल नहीं उठाया – इस्तीफा देकर लोगों द्वारा तय भूमिका में चले गए. कभी राजीव गांधी के करीबियों में से एक रहे तेज-तर्रार नौकरशाह टीएन शेषन को जब चुनाव आयुक्त की कुर्सी पर बैठाया गया – तो ये संवैधानिक संस्था आचनक सेंटरस्टेज पर आ गयी. चुनाव आयोग की धमक का एहसास पूरे देश को करवाया टी एन शेषन ने बोगस वोटिंग रोकने के लिए मतदाताओं को पहचान पत्र जारी करने की तूफानी कोशिश हुई. तो चुनाव आयोग के कामकाज को और व्यवस्थित करने के लिए इसे तीन सदस्यीय बना दिया गया. जमकर बवाल हुआ–तब सवाल ये उठा कि क्या चुनाव आयोग की शक्ति एक व्यक्ति में केंद्रित होनी चाहिए या फिर आयोग सामूहिक संवैधानिक संस्था के रूप में काम करे ?
वो साल 1990 का था और महीना दिसंबर का. मुख्य चुनाव आयुक्त की कुर्सी पर बैठते टीएन शेषन ने चुनाव सुधार को ऐसी रफ्तार दी – जिससे इलेक्शन कमीशन चर्चा के केंद्र में आ गया…चुनावों में धनबल, बाहुबल, सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग और आचार संहिता के उल्लंघन के खिलाफ सख्त रुख अपनाया जाने लगा.
टीएन शेषन ने चुनाव में बोगस वोटिंग रोकने के लिए मतदाता पहचान पत्र की व्यवस्था को आगे बढ़ाया. चुनावी हिंसा, बूथ कब्जा या गड़बड़ी की स्थिति में चुनाव स्थगित करने या दोबारा मतदान कराने की शक्ति का भी इस्तेमाल होने लगा. ऐसे में ये भी चर्चा होने लगी कि शेषन अपनी मनमानी कर रहे हैं. साल 1993 में चुनाव आयोग को तीन सदस्यीय बना दिया गया – एम.एस. गिल और जी.वी.जी. कृष्णमूर्ति को चुनाव आयुक्त बना दिया गया. शेषन ने इसका विरोध किया और इसे अपनी शक्तियों को कम करने की कोशिश के तौर पर देखा…इस मामले को लेकर शेषन सुप्रीम कोर्ट पहुंचे. कोर्ट ने साफ किया कि अन्य चुनाव आयुक्त सिर्फ सलाहकार नहीं, आयोग के पूर्ण सदस्य हैं. ऐसे में मतभेद की स्थिति में बहुमत से फैसला लेने की व्यवस्था बनाई गयी. लेकिन, चुनाव आयुक्तों के बीच खटपट की खबरें लगातार आती रहीं. दूसरी ओर, चुनाव सुधार की मुहिम लगातार आगे बढ़ती रही.
चुनावी प्रक्रिया को और आसान बनाने का रास्ता EVM में दिख रहा था. ऐसे में संसद ने EVM को वैध बनाने के लिए अपने कानून में संशोधन किया. 1998 में दिल्ली, मध्यप्रदेश और राजस्थान में विधानसभा चुनाव के दौरान 16 सीटों पर एकबार फिर EVM का इस्तेमाल हुआ और ये सिलसिला ऐसे आगे बढ़ा कि साल 2004 में पूरे देश में लोकसभा चुनाव के दौरान लोगों ने EVM का बटन दबाकर अपने वोट की ताकत का इस्तेमाल किया. लेकिन, EVM पर चुनाव हारनेवाली पार्टियां सवाल भी उठाती रहीं.
चुनाव दर चुनाव होते रहे. कई दिनों तक चलने वाली वोटों की गिनती का काम मिनटों में पूरा होने लगा. चुनाव आयोग वोटों की गिनती का डाटा अपनी वेबसाइट पर जारी करने लगा… इलेक्शन कमीशन ने EVM पर उठाते सवालों को खत्म करने और चुनावी प्रक्रिया में लोगों का भरोसा बहाल रखने के लिए VVPAT की व्यवस्था की. मतलब, वोटर ये देख सकता है EVM पर जो बटन दबाया – उसी निशान को वोट गया है या नहीं ?
चुनाव आयोग के सदस्यों में मतभेद और असहमति कोई नयी बात नहीं. साल 2009 में मुख्य चुनाव आयुक्त एन. गोपालस्वामी ने चुनाव आयुक्त नवीन चावला को हटाने की सिफारिश की. आरोप नवीन चावला की निष्पक्षता को लेकर लगाए गए थे. इसी तरह 2019 में तब के चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने भी आचार संहिता से जुड़े कुछ मामलों में आयोग के बहुमत के फैसलों पर असहमति जताई थी. बंद कमरों में चुनावी प्रक्रिया में सुधार से जुड़े मुद्दों पर असहमति या मतभेद बड़ी बात नहीं. ऐसी स्थिति में फैसला कैसे होगा – इसका भी मैकेनिज्म तय है. लेकिन, मतभेदों का बाहर निकलना कहीं-न-कहीं इलेक्शन कमीशन की साख को कमजोर करता है.
नरसिम्हा राव सरकार के दौर में जब चुनाव आयोग को तीन सदस्यीय बनाया गया – तो दलील दी गयी कि इस बदलाव का मकसद मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन का वर्कलोड कम करना है. इसका दूसरा पक्ष ये था कि सरकार उनकी मनमानी पर रोक लगाना चाहती थी. टीएन शेषन अपनी आत्मकथा Through the Broken Glass में लिखते हैं – मेरा वर्कलोड हुआ करता था सुबह 10 मिनट और शाम 3 मिनट का. दिन के बाकी समय मैं अपना वक्त क्रॉसवर्ड पज़ल हल करने में बिताता था. चुनाव आयुक्तों की अंदरुनी केमेस्ट्री चाहे जैसी भी रही हो – लेकिन, चुनाव सुधार की प्रक्रिया लगातार चलती रही. लोगों के मन में चुनावी प्रक्रिया को लेकर शक-सुबहा दूर करने की कोशिश समय-समय पर चलती रही. EVM को लेकर उठते सवालों को खत्म करने के लिए VVPAT लाया गया. मकसद सिर्फ एक था कि वोटर को पता चले कि उन्हें जिसे वोट दिया है – वो बिल्कुल सही उम्मीदवार को गया है. मशीन में कोई लोचा नहीं है. लेकिन, अगर देश के करीब एक अरब वोटरों में से 13 करोड़ के नाम मतदाता सूची शुद्धिकरण के नाम पर छंट जाएं – तो क्या होगा ? क्या लोगों का चुनावी प्रक्रिया से भरोसा नहीं हिलेगा ? उसमें भी अगर पता चलेगा कि चुनाव आयोग के भीतर ही दो फाड़ है. अब विपक्षी पार्टियां और युवा सड़कों पर आंदोलन कर रहे हैं – मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा मांग रहे हैं.
2 अक्टूबर यानी गांधी जंयती को दिल्ली से मुंबई तक मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रचंड प्रदर्शन हुआ. चुनाव आयोग की SIR प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए. मुंबई में हुए प्रदर्शन को ट्रेलर बताया गया. कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने ऐलान किया कि असली प्रदर्शन दिल्ली के जंतर-मंतर पर होगा.
CJP ने साफ कर दिया है कि अगर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने इस्तीफा नहीं दिया – तो 10 अक्टूबर को पूरे देश से कॉकरोच दिल्ली पहुंचेंगे. दरअसल, चुनाव आयोग की स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं. जून 2025 में शुरू हुए SIR में 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से 13 करोड़ से अधिक नाम काटे जा चुके हैं. इसे विपक्षी पार्टियां वोट चोरी और चुनाव चोरी का नाम दे रही हैं.
SIR प्रक्रिया के दौरान मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य दो आयुक्तों के बीच मतभेद की खबरें भी आईं. इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा कि SIR प्रक्रिया को लेकर दोनों चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने उठाए थे. 10 महीनों में कम से कम 14 बार इसे लेकर आधिकारिक तौर पर आपत्ति जताई. SIR प्रक्रिया के बाद बिहार, पश्चिम बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु जैसे राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जो सही वोटर ड्राफ्ट सूची से बाहर हो गए और अपनी वोट देने के अधिकार का इस्तेमाल नहीं कर पाए – उसके लिए जिम्मेदार कौन ?
वोटर लिस्ट में नाम जोड़ने और काटने के लिए नियम तय है. लेकिन, SIR प्रक्रिया के दौरान कई ऐसे बदलाव किए गए-जिससे शक-सुबहा के लिए जमीन तैयार होने लगी. उसके बाद SIR मुद्दे पर ज्ञानेश कुमार बनाम सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की खबरों ने इस विवाद को और बड़ा दिया. सियासत से सड़क तक मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार चर्चा के केंद्र में आ गए. SIR प्रक्रिया और उनके तौ-तरीकों को लेकर सवाल उठने लगा.
विवादों का बवंडर खड़ा होने के बाद अब चुनाव आयोग 20 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में एक खास मुहिम शुरू करने जा रहा है. इसका मकसद उन वोटरों का नाम दोबारा जोड़ना है, जो वोटर लिस्ट से बाहर हो गए हैं. किसी गलत नाम का वोटर लिस्ट से कटना एक प्रशासनिक कामयाबी हो सकती है. लेकिन, वोटर लिस्ट शुद्धिकरण के नाम पर किसी सही नागरिक का नाम काटना उसका सरकार चुनने का अधिकार छीनने जैसा है? ऐसे में सवाल उठता है कि SIR की वजह से जो सही नागरिक वोट नहीं डाल पाए – उसका जिम्मेदार कौन?
इस साल अप्रैल में पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव हुए. चुनाव से ठीक पहले SIR हुआ – वहां करीब 37 लाख वोटरों की अपील ट्रिब्यूनल के पास है– जिनमें करीब एक लाख मामले निपटाए गए हैं. हैरानी की बात ये है कि इसमें से करीब 93 हजार वोटरों को वैध पाया गया – मतलब सिर्फ सात फीसदी ही फर्जी निकले. पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओ पी रावत अपने एक लेख में दलील देते हैं कि अगर एक लाख वोटरों में 93 हजार वैध हैं – तो 37 लाख की अपील में यह आंकड़ा 34 लाख तक जा सकता है. ऐसे में सवाल उठता है – वैध मतदाताओं को उनके संवैधानिक अधिकार से वंचित किसने किया ? क्या SIR की वजह से बंगाल में चुनावी नतीजे प्रभावित हुए ? बिहार विधानसभा चुनाव से इलेक्शन कमीशन की भूमिका पर सवालों में है. बिहार से SIR प्रक्रिया की शुरुआत हुई थी. आयोग ने SIR को रुटीन प्रक्रिया बताया था , जिसे चुनाव आयोग रुटीन प्रक्रिया बता रहा है – उसे विपक्षी पार्टियां वोट चोरी और चुनाव चोरी बता रही हैं. दरअसल, चुनाव की निष्पक्षता सिर्फ वोटिंग या काउंटिंग के दिन की प्रक्रिया से पूरी नहीं होती है. चुनाव आयुक्तों के बीच फैसले में पारदर्शिता, वोटर लिस्ट, चुनाव कार्यक्रम, आचार संहिता, उम्मीदवार और दलों के लिए समान अवसर, अफसरों की नियुक्ति, चुनाव परिणाम तक की पूरी प्रक्रिया आती है. पिछले 76 साल से अगर हम भारत के लोगों का चुनाव आयोग में भरोसा बरकरार रहा है – तो इसकी एक बड़ी वजह इस संस्था की निष्पक्षता रही है. पारदर्शिता रही है. समय-समय पर अपनी कमियों को ठीक करने वाली सोच रही है. भारत के लोग कभी खंडित जनादेश देकर नेताओं के चाल-चरित्र और चेहरे को देखते हैं..तो कभी किसी को प्रचंड बहुमत से सत्ता में पहुंचाकर उसे खुलकर फैसला लेने की शक्ति देते हैं. ऐसे में SIR प्रक्रिया और चुनाव आयुक्तों के बीच मतभेद को लेकर जो भी धुंध है – वो खुद चुनाव आयोग को साफ करनी होगी? वो भी पूरी ईमानदारी से, ये भी चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है कि एक भी वैध नागरिक अपने वोट के अधिकार से वंचित न रहे. SIR प्रक्रिया के दौरान – जो भी गलतियां हुई या कमियां रह गयीं, उसे पारदर्शी तरीके से ठीक करना लोकतंत्र की मजबूती और चुनाव आयोग की साख दोनों के लिए बहुत जरूरी है.
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