SIR पर सवाल, दांव पर चुनाव आयोग की साख, ज्ञानेश कुमार की भूमिका पर क्यों उठ रही उंगलियां?

संविधान सभा के सामने एक बड़ा ये भी था कि बगैर निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव प्रणाली के लोकतंत्र सफल नहीं हो सकता है. ऐसे में दिल्ली की प्रचंड गर्मी और आजादी की खुली हवा के बीच 15-16 जून को संविधान सभा में एक बहुत ही गंभीर मुद्दे पर बहस हुई.

Jantar Mantar

भारत एक सोच (Photo: News24)

पूरे देश ने देखा कि आंदोलनकारियों को दिल्ली में रोकने के लिए क्या-क्या हुआ? प्रदर्शनकारी हिसाब लगा रहे हैं कि उन्हें अपनी रणनीति में अभी कहां-कहां बदलाव करने की जरूरत है और पुलिस-प्रशासन हिसाब लगा रहा है कि भविष्य में किस तरह की सर्तकता बरतनी होगी. लेकिन, देश का आम आदमी मन ही मन सोच रहा है कि उसके न्याय हो रहा है अन्याय? Special Intensive Revision के दौरान जो कुछ हुआ – उसे लेकर सबसे ज्यादा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार सवालों में हैं. अब सवाल उठता है कि क्या ज्ञानेश कुमार की नीति गलत थी और नीयत साफ? कई पूर्व चुनाव आयुक्त भी SIR की प्रक्रिया पर सवाल उठा चुके है. SIR के बाद जिस तरह से सियासी बवंडर उठा और कॉकरोच जनता पार्टी की एंट्री हुई. ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग हो रही है. ऐसे में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का क्या होगा? इस सवाल का जवाब भविष्य के गर्भ में है. लेकिन, चुनाव आयोग की छवि और विश्वसनीयता को सबसे अधिक नुकसान हुआ है. हमारे पुरखों में संविधान बनाने समय एक निष्पक्ष चुनाव आयोग की कल्पना की, संवैधानिक संस्था बनाया. लेकिन, चुनाव आयुक्त की नियुक्ति का रास्ता संसद के ऊपर छोड़ दिया. क्या इसी कमी का फायदा बाद में सियासतदानों ने उठाया ? SIR में पहले 13 करोड़ नाम कटे और अब नाम जोड़ने के लिए खास मुहिम चलाई जा रही है. इससे लोगों के मन में संदेह पैदा हो गया है कि जब नाम जोड़ना ही था – तो वोटर लिस्ट से नाम हटाने की जल्दबाजी क्यों की गयी? क्या आनन-फानन में कराई गयी SIR का मकसद किसी खास राजनीतिक दल को फायदा पहुंचाना था ? आखिर चुनाव आयोग किसका रेफरी है ? कहां से शक्तियां लेता है और किसके प्रति जिम्मेदार है ? दिल्ली की किलेबंदी और ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए प्रदर्शन और हिरासत की खबरों के बीच ये जानना और समझना भी जरूरी है कि हाल के विधानसभा चुनावों में SIR का साइड इफेक्ट किस तरह दिखा ? जहां वोटरों के ज्यादा नाम कटे वहां नतीजे किसके पक्ष में गए और जहां ज्यादा नाम जुड़े वहां नतीजे किसके पक्ष में गए? संविधान बनाते समय हमारे पुरखों ने किस तरह के चुनाव आयोग की कल्पना की और उन्हें किस बात की सबसे अधिक चिंता थी ? धरना-प्रदर्शन और राजनीति के बीच आज कुछ ऐसे ही सुलगते सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश करेंगे.

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खेल के मैदान में रेफरी वो व्यक्ति होता है– जिसके ऊपर प्रतियोगिता को निष्पक्ष तरीके से कराने की जिम्मेदारी होती है. रेफरी नियम के मुताबिक खेल कराने के लिए जिम्मेदार होता. खेल के दौरान व्यवस्था बनाए रखने. नियमों को लागू करने और विवाद की स्थिति में फैसला देने का काम करता है. रेफरी नियम-कायदों से बंधा होता है. लोकतंत्रीय व्यवस्था के चुनाव की तुलना किसी खेल से करना तो ठीक नहीं होगा. लेकिन, हमारे देश में इलेक्शन कमीशन की भूमिका बहुत हद तक चुनावों के दौरान रेफरी जैसी रहती है. मैदान में राजनीतिक दल खिलाड़ी की भूमिका में हैं और जनता दर्शक नहीं निर्णायक की भूमिका में. हमारा संविधान खेल के नियमों की किताब है. हमारे संविधान की प्रस्तावना हम भारत के लोगों से होती है. हम भारत के लोगों ने संविधान के अनुच्छेद 324 के तरह चुनाव आयोग बनाया. चुनाव आयोग को लोकसभा, राज्यसभा, विधानसभाओं, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति का चुनाव कराने की जिम्मेदारी सौंपी. क्योंकि, अपनी वोट की ताकत से ही हम भारत के लोग तय करते हैं कि कौन हमारी विधानसभा में नुमाइंदगी करेगा और कौन संसद में ? कौन लोगों की बेहतरी के लिए सबसे बढ़िया विकल्प हो सकता है ? ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार आखिर विपक्षी पार्टियों और कॉकरोच जनता पार्टी की फायर लाइन में आए कैसे ?

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दिल्ली एयरपोर्ट पर फ्लाइट के भीतर से ही कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके के साथ आशुतोष रांका और सौरव दास को हिरासत में ले लिया गया. CJP ने देशभर के युवाओं से 10 अक्टूबर को जंतर-मंतर पहुंचने की अपील की थी. ऐसे में बाहर से आनेवाले प्रदर्शनकारियों को दिल्ली बॉर्डर पर ही रोकना का पुख्ता इंतजाम किया गया था. जंतर-मंतर की ओर जानेवाले हर रास्ते को सुरक्षाकर्मियों ने बंद कर रखा था – जिसने भी आगे बढ़ने की कोशिश की पुलिस ने बस में बैठाने में देरी नहीं लगायी.

SIR के खिलाफ प्रदर्शन में शामिल होने जा रहे चार पूर्व मुख्यमंत्रियों अरविंद केजरीवाल, ममता बनर्जी, माणिक सरकार, पी. विजयन को दिल्ली में हिरासत में लिया गया. केजरीवाल ने प्रदर्शनकारियों से अपील की–जहां रोका जाए, वहीं अनशन शुरू कर दीजिए. प्रदर्शनकारियों को जंतर-मंतर पहुंचने से रोकने के लिए बॉर्डर सील करने से लेकर मेट्रो के 45 स्टेशन तक बंद किये गए. तमाम प्रतिबंध और कड़े पहरे के बाद भी दिल्ली में प्रदर्शन की तस्वीरें कई हिस्सों से आईं. करीब तीन हजार से अधिक लोगों को हिरासत में लेने की खबर है. सत्ताधारी बीजेपी का कहना है कि जंतर-मंतर की कहानी पूरे भारत की कहानी नहीं है.

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प्रदर्शनकारी CEC ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग पर अड़े हैं. पूरे देश को जंतर-मंतर बनाने की बात कही जा रही है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या ज्ञानेश कुमार को हटाने और वोट चोरी के मुद्दे पर आंदोलन और प्रचंड होगा. SIR पर उठते सवाल, वोट चोरी और चुनाव चोरी जैसे गंभीर आरोपों पर चुनाव आयोग तथ्यों के आधार पर दूध का दूध और पानी का पानी क्यों नहीं कर रहा है? एक कहावत है – इधर कुआं, उधर खाई. मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर सरकार की स्थिति भी कमोबेश वही है. कॉकरोच जनता पार्टी पहले ही मोदी सरकार में शिक्षा मंत्री रहे धर्मेंद्र प्रधान का विकेट ले चुकी है. लेकिन, धर्मेंद्र प्रधान और ज्ञानेश कुमार में अंतर है. किसी मंत्री को कुर्सी पर बैठाना या हटना प्रधानमंत्री के विवेक का विषय है. वहीं, मुख्य चुनाव आयुक्त को कुर्सी पर बैठाना तो आसान है. लेकिन, कुर्सी से हटाना किसी के विवेक का विषय नहीं है. संविधान में मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए महाभियोग की व्यवस्था की गयी है. ऐसे में अगर ज्ञानेश कुमार ने अपने विवेक के आधार पर इस्तीफा नहीं दिया तो जनवरी 2029 तक वो अपने पद पर बने रहेंगे. लेकिन, बड़ा सवाल ये नहीं है. बड़ा सवाल ये है कि बतौर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की अगुवाई में जिस तरह SIR हुआ – उसका हाल में हुए विधानसभा चुनावों पर किस तरह असर पड़ा. इस साल पश्चिम बंगाल में 15 साल पुराना TMC का किला ढह गया और बीजेपी का कमल खिला. असम में लगातार तीसरी बार बीजेपी की सरकार बनी. एक दलील ये भी दी जा रही है कि पश्चिम बंगाल में SIR के दौरान जहां सबसे ज्यादा वोट कटे – वहां बीजेपी को फायदा हुआ. क्या ये संपूर्ण सत्य है ? आंकड़ों के जरिए समझने की कोशिश करते हैं कि पश्चिम बंगाल में नाम कटने और जुड़ने का असर किस तरह का दिखा. विपक्ष लगातार आरोप लगा रहा है कि देश में वोट चोरी और चुनाव चोरी हो रहा है. वोट चोरी के मुद्दे पर लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी दलबल के साथ राष्ट्रपति से मुलाकात कर चुके हैं.

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग. आंदोलन और अनशन के बीच SIR के बाद हुए चुनावों पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं. दलील दी जा रही है कि पश्चिम बंगाल में BJP की प्रचंड जीत में SIR ने बड़ी भूमिका निभायी. आंकड़े बताते हैं कि बीजेपी के पक्ष में करीब 8 फीसदी वोटरों के समर्थन में बदलाव था. वहीं, TMC के वोट में 7 फीसदी गिरावट देखी गयी. इसका एक मतलब ये भी निकाला जा रहा है कि BJP को मिले अतिरिक्त वोट खासतौर से TMC के खाते से खिसके. पश्चिम बंगाल में SIR के बाद 91 लाख वोटर कम हुए – वहीं जीत का अंतर सिर्फ 32 लाख वोट का रहा. लेकिन, असम में बिल्कुल अलग पैटर्न दिखा. SIR में नाम बहुत कम कटे और जीत का अंतर बहुत अधिक रहा.

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इस साल हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव की अगर 14 ऐसी सीटों पर नजर दौड़ाई जाए – जहां SIR की वजह से सबसे ज्यादा वोट कटे. वो सीटें होंगी चौरंगी, जोरासांको, हावड़ा उत्तर, समसेरगंज, कोलकाता पोर्ट, एंटली, मेटियाबुरुज, बैरकपुर, मानिकतला, नोआपारा, लालगोला, पानीहाटी, हावड़ा मध्य और श्रीरामपुर. 2026 के पश्चिम बंगाल चुनाव में इन 14 सीटों में से सात पर बीजेपी जीती और सात सीटों पर टीएमसी उम्मीदवार जीते. लेकिन, 2021 के बंगाल चुनाव में ये सभी सीटें TMC के खाते में थीं. पश्चिम बंगाल में जिन विधानसभा सीटों पर SIR के बाद सबसे ज्यादा वोट जुड़े – वहां भी बीजेपी के लिए क्लीन स्वीप जैसी स्थिति रही.

पश्चिम बंगाल के चुनावी नतीजों के आंकड़े एक इशारा ये भी कर रहे हैं कि जहां SIR की वजह से वोटर घटे, वहां TMC को कुछ बढ़त दिखी. दूसरी ओर, जहां वोटर बढ़े वहां बीजेपी बड़े अंतर से जीती. लेकिन, पश्चिम बंगाल का पैटर्न असम में पूरी तरह बदल जाता है. तमिलनाडु और केरल में भी पैटर्न बदला-बदला दिखता है. पश्चिम बंगाल में SIR के दौरान करीब 91 लाख नाम कटे और बीजेपी-टीएमसी के बीच वोटों का अंतर रहा 32.11 लाख का. लेकिन, इस नतीजे का दूसरा पहलू ये है कि सूबे की 294 सीटों में से बीजेपी के खाते में गयी – 207 सीटें और TMC सिर्फ 80 सीटों पर सिमट गयी. दलील दी जा रही है कि जहां वोटर लिस्ट से अधिक नाम हटाए गए – वहां बीजेपी के पक्ष में चुनावी स्विंग अधिक रहा. दूसरी ओर, जिन क्षेत्रों में नाम कम हटाए गए – वहां बीजेपी के पक्ष में स्विंग कम रहा. वहीं, अगर असम के आंकड़ों को देखा जाए – तो वहां SIR में 2.43 लाख नाम हटे. लेकिन, जीत-हार का अंतर 17 लाख से अधिक वोटों का रहा. बिहार की बात की जाए तो SIR में नाम कटे करीब 69 लाख लोगों के जीत-हार का अंतर रहा 51.60 लाख वोटों का. तमिलनाडु और केरल के नतीजे कुछ और कहानी कहते हैं. अब सवाल ये है कि ऐसी क्या मजबूरी और जल्दबाजी रही कि पहले चुनाव आयोग ने SIR में 13 करोड़ वोटरों के नाम काटे और SIR प्रक्रिया पर सवाल उठने के बाद अब नाम जोड़ने के लिए खास अभियान चला रहा. इसका एक मतलब तो ये भी निकलता है कि चुनाव आयोग ने अपनी गलती मान ली है. दरअसल, SIR वोटर लिस्ट के शुद्धिकरण के लिए चलने वाली एक प्रक्रिया है. साल 1951 से लेकर 2004 के बीच 8 बार SIR हुआ – ये भारत जैसे विशालकाय देश में 2 से 3 साल तक चलने वाली प्रक्रिया रही है. साल 2004 के बाद 21-22 साल तक SIR नहीं हुआ. चुनाव आयोग ने 2025 में बिहार विधानसभा चुनाव से पहले SIR का फैसला लिया. वक्त के साथ SIR में तकनीक की भी एंट्री हुई. कभी फॉर्म में बदलाव के मुद्दे पर सवाल उठा – तो कभी डेटा को दिल्ली से कंट्रोल करने के मुद्दे पर.

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आजादी के बाद भारत में SIR कोई पहली बार नहीं हुआ है. आजादी के बाद 1952 से 1955 के बीच पहली बार SIR हुआ…उस SIR पहली बार वोटर लिस्ट में बड़े पैमाने पर शुद्धिकरण हुआ. गंभीर खामियों को सुधारा गया और लाखों ऐसी महिलाओं के नाम जोड़े गए – जिन्होंने पहले कभी अपना नाम दर्ज नहीं कराया था. इसके बाद 1957, 1961, 1965–1966, 1983–1984, 1987–1989 में SIR प्रक्रिया हुई. साल 1993-1995 के बीच यानी टी. एन. शेषण के दौर में बड़े पैमाने पर वोटर शुद्धिकरण अभियान चलाया गया. इससे फर्जी और डुप्लिकेट वोटों पर बड़े स्तर पर रोक लगी. पहली बार वोटर पहचान पत्र की शुरुआत हुई.

साल 2002–2004 के बीच देशभर में चरणबद्ध तरीके से SIR हुआ. इस दौरान लाखों मृत, स्थानांतरित और डुप्लिकेट वोटरों को लिस्ट से बाहर किया गया. एक आंकड़े के मुताबिक, साल 2002 में भी पश्चिम बंगाल में ड्राफ्ट मतदाता सूची से 69.31 लाख नाम हटाए गए थे. अब सवाल उठता है कि जब वोटर लिस्ट में शुद्धिकरण चुनाव आयोग का काम है – तो फिर इतना बवाल क्यों, आखिर गलती कहां हुई ?

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पिछले साल बिहार विधानसभा चुनाव से ठीक पहले वहां SIR कराई गयी. इसमें करीब 47 साल लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटाए गये. SIR में वोटर लिस्ट से बाहर हुए नामों की संख्या बिहार के कुल वोटरों का करीब 5.95% रहा. हमारे देश में नया वोटर बनने के लिए Form 6 भरना पड़ता है. अबकी बार SIR के दौरान फॉर्म 6 में एक अतिरिक्त घोषणा जोड़ी गई, जिसमें आवेदक को बताना था कि उसके माता-पिता या दादा-दादी का नाम पहले किसी SIR वोटर लिस्ट में था या नहीं. ऐसे में सवाल उठा कि आखिर चुनाव आयोग ने ये बदलाव क्यों और कैसे किया? मामला जब सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो CJI सूर्यकांत ने कहा कि SIR के लिए बदले गए फॉर्म 6 को सुप्रीम कोर्ट ने मंजूरी नहीं दी हैं. साथ ही ये भी कहा कि रिकॉर्ड देखेंगे किसने संशोधन किया?

दरअसल, SIR प्रक्रिया आसान बनाने के लिए जिस ECINet का इस्तेमाल हुआ – वो भी सवालों में आ गया. पिछले SIR से इसबार का SIR कई मायनों में अलग था. मसलन 2002 से 2004 के बीच हुआ SIR कागजी फॉर्म और मैनुअल एंट्री पर आधारित था. वहीं, इसबार डिजिटलीकरण, ऑनलाइन पोर्टल, मोबाइल ऐप्स के जरिए डेटा वेरिफिकेशन का काम हुआ. पहले घर-घर जाकर नया नाम जोड़ा जाता था. इसबार वोटर को पिछले SIR रिकॉर्ड के साथ अपने माता-पिता/दादा-दादी का रिकॉर्ड भी जोड़ना है. पहले मैन्युअल जांच की वजह से कुछ डुप्लीकेट नाम छूट जाते थे. लेकिन, इसबार आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सॉफ्टवेयर की मदद से डुप्लीकेट नाम की पहचान तुरंत हो गयी. पहले कोई डिजिटल पहचान पत्र या फोन वेरिफिकेशन का सिस्टम नहीं था. इसबार स्वैच्छिक रूप से आधार नंबर और मोबाइल नंबर को मतदाता डेटा से जोड़ना का सिस्टम बनाया गया.

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तकनीक की मदद से वोटर शुद्धिकरण की चलनेवाली लंबी प्रक्रिया को संभवत: कुछ महीनों में निपटाने की कोशिश की गयी.तकनीक मामूली अंतर की वजह से भी मैप नहीं होने वाले करोड़ों नामों को ड्राफ्ट लिस्ट से बाहर कर दिया. देश भर के 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में SIR के तहत जारी ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से 13 करोड़ से अधिक नाम बाहर कर दिए गए हैं. इसमें दिल्ली में सबसे ज्यादा 33% नाम कटे हैं. दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के लोगों को करीब दो दशक बाद चुनाव आयोग द्वारा आचानक SIR कराने के फैसले ने पहले चौंकाया…फिर 13 करोड़ लोगों के नाम छंटना और अब चुनाव आयोग द्वारा कटे नामों को जोड़ने के लिए विशेष अभियान चलाने का फैसला.

एक अनुमान के मुताबिक, 2002 से 2004 के बीच हुए SIR में करीब 3 से 5 फीसदी नाम हटाए गए – जो इस दुनिया नहीं थे या जिनके नाम दो जगह दर्ज थे. लेकिन, ज्ञानेश कुमार की अगुवाई में हुई SIR में करीब 15% नाट कट गए. अब सवाल उठता है कि ये तकनीक की मदद से फटाफट चुनाव आयोग के इतिहास में एक नई लकीक खींचने की कोशिश थी या फिर किसी सोची-समझी रणनीति का हिस्सा ? संभवत:, इस मुद्दे को वर्तमान और इतिहास अलग-अलग चश्मे से देखेगा. लेकिन, हमारे पुरखों के बीच संविधान सभा में निष्पक्ष चुनाव आयोग बनाने के लिए लंबी जिरह हुई. वो तारीख थी – 15 जून, 1949 संविधान सभा के एक सदस्य शिब्बन लाल सक्सेना ने एक प्रस्ताव पर आपत्ति जताई. संविधान के मसौदे में लिखा था कि चुनाव आयोग की नियुक्ति राष्ट्रपति करेंगे. शिब्बन लाल सक्सेना की दलील थी कि सरकार अपने ही चुनावों के लिए रेफरी का चुनाव खुद करेगी. आशंका जताई गयी कि सत्ताधारी पार्टी अगला चुनाव जीतने के लिए अपने किसी मन पसंद व्यक्ति को चुनाव आयुक्त की कुर्सी पर बैठा सकती है! ऐसे में संविधान सभा में इस बात पर जमकर बहस हुई कि चुनाव आयुक्त की नियुक्ति कैसे की जाए…चुनाव आयोग के हाथ किस तरह मजबूत किए जायें, जिससे चुनाव आयुक्त पक्षपात से पूरी तरह मुक्त रहे.

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संविधान सभा के सामने एक बड़ा ये भी था कि बगैर निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव प्रणाली के लोकतंत्र सफल नहीं हो सकता है. ऐसे में दिल्ली की प्रचंड गर्मी और आजादी की खुली हवा के बीच 15-16 जून को संविधान सभा में एक बहुत ही गंभीर मुद्दे पर बहस हुई. जिसमें एक ऐसी व्यवस्था बनाने की बात कही जा रही थी – जिसमें चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त को कार्यपालिका के दबाव और प्रभाव के मुक्त रखने की बात हो रही थी. ऐसे में 15 जून, 1949 को डॉक्टर अंबेडकर ने एक संशोधन प्रस्ताव रखते हुए कहा कि पहले के प्रस्तावित अनुच्छेद में प्रावधान था कि केंद्रीय विधान मंडलों के दोनों सदनों के लिए एक आयोग और प्रत्येक प्रांतों और राज्यों के लिए एक पृथक निर्वाचन आयोग हो, जिसे राज्यपाल या राज्यप्रमुख नियुक्त करे. लेकिन संशोधित प्रस्ताव में यह कहा गया है कि निर्वाचन का काम एक ही आयोग के हाथ में रखा जाये और उसकी सहायता सहायक प्रादेशिक आयुक्त करें.

इस संशोधन प्रस्ताव को लाने के पीछे कई दलीले दी गईं. पंडित ह्रदय नाथ कुंजरू जैसे संविधान सभा सदस्य डॉक्टर अंबेडकर की दलीलों से सहमत नहीं थे. तो प्रोफेसर शिब्बन लाल सक्सेना ने चुनाव आयोग की नियुक्त करने का अधिकार राष्ट्रपति को दिए जाने के पक्ष में नहीं थे. एक मशवरा ये भी था कि मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति संसद के दोनों सदनों द्वारा दो-तिहाई बहुमत से हो. पंडित ह्रदय नाथ कुंजरू चाहते थे कि चुनाव आयुक्तों के पास इतने मजबूत सुरक्षा उपाय हों कि वे ‘निडर होकर’ अपना काम कर सकें. हालांकि, उन्होंने सर्तक करते हुए कहा कि अगर लोकतंत्र का संचालन ऐसे लोग करेंगे, जिनकी ईमानदारी पर भरोसा नहीं किया जा सकता, तो लोकतंत्र की जड़ में ही जहर घुल जाएगा.

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संविधान सभा में लंबी जिरह के बाद फैसला हुआ कि चुनाव आयोग को इस तरह से स्वतंत्र और निष्पक्ष रखा जाए, इसका तानाबान कुछ इस तरह से रहे. जिसमें कोई भी सत्ताधारी पार्टी चुनाव आयोग और इसमें अहम पदों पर बैठे अधिकारियों को प्रभावित न कर सके. चुनाव आयोग की संवैधानिक नींव तो तैयार कर दी गई लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति की प्रक्रिया का रास्ता जानबूझकर खुला छोड़ दिया गया. 74 साल तक संसद ने मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति पर कोई कानून नहीं बनाया.

फिलहाल मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति वाली समिति में प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक मंत्री होता है. मतलब, तीन में से दो सदस्य सीधे प्रधानमंत्री के नियंत्रण में होते हैं. संविधान सभा में जो सवाल कभी शिब्बन लाल सक्सेना और ह्रदय नाथ कुंजरू ने उठाया था – वो आज भी प्रासंगिक है. क्योंकि, आज भी चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के मुद्दे पर सवाल उठता है कि क्या ऐसी व्यवस्था बनाई जानी चाहिए – जिसमें चुनाव लड़ने वाले एक पक्ष का रेफरी चुनने की प्रक्रिया पर जरूरत से ज्यादा प्रभाव हो.

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संविधान ने चुनाव आयोग को एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था बनाया. मुख्य चुनाव आयुक्त को आसानी से हटाए जाने से सुरक्षा दी गई. लेकिन, चुनाव आयुक्त की नियुक्ति की प्रक्रिया तय करने का अधिकार संसद पर छोड़ दिया गया. आजादी के बाद चुनाव आयुक्तों ने भी अपने-अपने हिसाब से चुनावी प्रक्रिया पारदर्शी और निष्पक्ष बनाने की कोशिश की. लेकिन, बड़ा सवाल यही है कि जिस संस्था को सत्ता और विपक्ष दोनों के चुनावी व्यवहार की निगरानी करनी है – वो आज खुद सवालों में है. सरकारें बदलती रहती हैं. राजनीतिक दल सत्ता में आते-जाते रहते हैं – लेकिन, चुनाव आयोग की संवैधानिक भूमिका ज्यों की त्यों बनी रहती है. संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग को बहुत शक्तियां दी गयी हैं. लेकिन, चुनाव आयोग की शक्तियां न्यायिक समीक्षा से परे नहीं हैं. जब ये सवाल आता है कि चुनाव आयोग आखिरी रेफरी किसका है? सरकार का – बिल्कुल नहीं. किसी राजनीतिक दल का – बिल्कुल नहीं. लोगों का – सीधे तौर पर नहीं. हमारी लोकतंत्रीय व्यवस्था में चुनाव आयोग संविधान का रेफरी है. लोग और संविधान एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं. ऐसे में संविधान चुनाव आयोग को अधिकार देता है और जनता चुनावी प्रक्रिया के जरिए सरकार चुनती है. ऐसे में इलेक्शन कमीशन का कर्म-धर्म-मर्म यही है कि वोटर का फैसला स्वतंत्र, निष्पक्ष औप पारदर्शी तरीके से सामने आए. किसी तरह की शक-सुबहा के लिए कोई गुंजाइश न बचे. चुनाव आयोग को सिर्फ निषपक्ष होना ही नहीं दिखना भी चाहिए, लेकिन, SIR प्रक्रिया के दौरान चुनाव आयोग की निष्पक्षता, पारदर्शिता और विश्वसनीयता तीनों को लेकर लोगों के मन में शक के बीज पड़ गये हैं. ऐसे में डैमेज कंट्रोल का रास्ता खुद चुनाव आयोग के भीतर से निकलेगा. सरकार निकालेगी या अदालत से निकलेगा? इस सवाल का जवाब अभी भविष्य के गर्भ में है.

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लेखक के बारे में

Anurradha Prasad

Anurradha Prasad

अनुराधा प्रसाद के लिए पत्रकारिता सिर्फ पेशा नहीं...मिशन है। अपनी साढ़े तीन दशक की टेलीविजन पत्रकारिता में हर तरह का प्रयोग देखा...हर बदलाव की साक्षी रहीं... एक तेज-तर्रार रिपोर्टर से सफल मीडिया उद्यमी बनीं....अपनी तेज नज़र, दूरदर्शी सोच और कलम के दम पर मीडिया जगत में एक दमदार हस्ताक्षर हैं। अनुराधा प्रसाद जी न्यूज़ 24 की एडिटर-इन-चीफ और बीएजी नेटवर्क की सीएमडी हैं  । बतौर टेलीविजन पत्रकार हर भारतीय की आवाज बुलंद करने की ईमानदार कोशिश किया और हमेशा Think First के फलसफे पर आगे बढ़ने में यकीन करती हैं। न्यूज़ 24 पर इतिहास गवाह है...सीरीज के जरिए दर्शकों को अतीत के पन्नों से रू-ब-रू करवाती रही हैं.. तो भारत भाग्य विधाता जैसी सीरिज के जरिए उन संस्थाओं और व्यक्तियों से दर्शकों का परिचय कराया- जो आजाद भारत में लोकतंत्र को  मजबूत और गणतंत्र को बुलंद बनाने में खामोशी से कर्मयोगी की भूमिका में हैं। इसी तरह भारत एक सोच के जरिए वक्त से आगे की सोच से भी दर्शकों का साक्षात्कार कराती रही हैं । ये अनुराधा प्रसाद की मुखर और प्रखर सोच का ही नतीजा है कि न्यूज़ 24 पर माहौल क्या है-कार्यक्रम में आम आदमी की आवाज को  पूरी तवज्जो मिलती है...तो India’s Tiger जैसी टेली सीरीज के जरिए उन गुमनाम जासूसों के योगदान से भी दर्शकों तो मिलवाने का भगीरथ प्रयास हो रहा है, जो खामोशी से अपना काम कर नेपथ्य में चले गए । मंथन का मंच सजा कर समाज और सिस्टम के असरदार लोगों की सोच से दर्शकों का साक्षात्कार कराती रही हैं । 1990 के दशक में प्रसारित आपके The horse's mouth और Let’s Talk शो ने भारतीय टेलीविजन को चर्चित शख्सियतों के इंटरव्यू का नया अंदाज दिया...तो आमने-सामने में आपके तीखे सवालों का देश के ज्यादातर सियासतदानों ने सामना किया। आपकी अगुवाई में बीएजी नेटवर्क ने सामाजिक सरोकार और जागरूकता के संदेश वाले कई कार्यक्रम बनाए तो चुनावी मौसम में नेताओं के चाल, चरित्र और चेहरे को भी रोचक अंदाज में दर्शकों के सामने रखने का सफल प्रयोग किया । अनुराधा प्रसाद भारत में टेलीविजन पत्रकारिता में पहली पीढ़ी की पत्रकार हैं...जिन्होंने अपनी बुलंद सोच और नए-नए शोज से भारतीय टेलीविजन न्यूज़ का चेहरा बदला । अनुराधा प्रसाद भारत को समर्पित एक ऐसी शख्सियत हैं... जो पत्रकारिता के जरिए हमेशा समाज को कुछ नया देने के मिशन में पूरी शिद्दत से जुटी रहती हैं...जुटी हुई हैं और जुटी रहेंगी।
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