क्या बिना डॉक्टरी सलाह के दवा लेना या खुद इलाज करना ठीक है? हमारे देश में एक ट्रेंड ये भी दिख रहा है कि सेहत को मोर्चो पर आधी समस्या ओवर ट्रीटमेंट की है तो आधी अंडर ट्रीटमेंट की . ऐसे में ये समझना जरूरी है कि भारत जैसे बड़े देश की बड़ी आबादी को आयुष्मान बनाने के लिए किन-किन मोर्चों पर काम करने की जरूत है? अमेरिका और यूरोप के हेल्थ सिस्टम से क्या-क्या सीखने की जरूरत है? वहां मरीजों का इलाज किस तरह होता है ? अमेरिका या यूरोपीय देशों में लोगों को बिना डॉक्टर की पर्ची के दवाएं क्यों नहीं मिलती है? आज कुछ ऐसे सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश करेंगे
बीमारियों का चक्रव्यूह: इलाज से कितने दूर, कितने पास?
यह एक अजीब विडंबना है कि हमारे देश में अधिकांश लोग अपनी सबसे कीमती पूंजी यानी सेहत को लेकर ही सबसे ज्यादा लापरवाह रहते हैं. नौकरी, करियर और कमाई की भागदौड़ में स्वास्थ्य को दांव पर लगा दिया जाता है. नतीजा यह निकलता है कि समय के साथ शरीर बीमारियों का घर बनने लगता है. थोड़ी सी बचत और शुरुआती अनदेखी के चलते जीवन भर की जमा-पूंजी गंभीर बीमारियों के इलाज में खर्च हो जाती है.
आंकड़ों पर नजर डालें तो आज भारत में 22 करोड़ से अधिक लोग हाई ब्लड प्रेशर और 10 करोड़ से अधिक लोग डायबिटीज से पीड़ित हैं. वहीं, प्री-डायबिटिक लोगों की संख्या भी लगभग 13.6 करोड़ के पार है. इसके साथ ही हृदय रोग, कैंसर, लिवर और किडनी की गंभीर समस्याओं के मामलों में भी लगातार उछाल दर्ज किया जा रहा है. सवाल उठता है कि जिस देश ने दुनिया को निरोगी काया और दीर्घायु का फलसफा सिखाया, वही भारत आज इतनी तेजी से बीमार क्यों पड़ रहा है? क्या अस्वस्थ नागरिक 2047 तक ‘विकसित भारत’ के विजन को मजबूती दे पाएंगे?
घर-घर में दवाओं का डिब्बा: सेल्फ मेडिकेशन की खतरनाक आदत
22 साल के रमेश को जब भी हल्का बुखार या थकान महसूस होती है, वह सीधे दफ्तर में रखे जेनरिक दवाओं के बॉक्स से गोली निकालकर खा लेता है. मौसम बदलते ही छींक आए तो हिमांशु बिना सोचे दवा निगल लेता है. सिरदर्द हो या बदन दर्द, ज्यादातर लोगों ने अपनी पसंदीदा गोलियां तय कर रखी हैं. भारतीय मध्यमवर्गीय परिवारों में एक ऐसा डिब्बा आम तौर पर मिल ही जाता है, जिसमें सर्दी, खांसी, बुखार, सिरदर्द, गैस और पेट दर्द की दवाइयां पहले से रखी होती हैं. देश में ‘सेल्फ मेडिकेशन’ इतना सामान्य हो चुका है कि लोग सालों पहले डॉक्टर द्वारा लिखे पर्चे को बिना दोबारा जांच कराए वर्षों तक दोहराते रहते हैं. नियमित हेल्थ चेकअप या डॉक्टर से परामर्श को अक्सर फिजूलखर्च मान लिया जाता है.
अस्पतालों के बाहर लंबी कतार
अस्पतालों के बाहर लगने वाली लंबी कतारों में शामिल एक बड़ा हिस्सा इन्हीं छोटी-मोटी लापरवाहियों का शिकार होता है. खुद से दवा लेने पर तात्कालिक राहत जरूर मिल जाती है, लेकिन अंदर ही अंदर गंभीर बीमारियां पनपने लगती हैं. जब दर्द असहनीय हो जाता है या शरीर जवाब देने लगता है, तब मरीज डॉक्टर के पास पहुंचता है और तब तक स्थिति काफी बिगड़ चुकी होती है.
अस्पतालों में उमड़ती भीड़ और गंभीर बीमारियों के डरावने आंकड़े
दिल्ली स्थित AIIMS की ओपीडी में रोजाना औसतन 14 से 15 हजार मरीज पहुंचते हैं, जिनमें से करीब 60 फीसदी मरीज उत्तर प्रदेश, बिहार और अन्य पड़ोसी राज्यों से होते हैं. बड़े सरकारी अस्पतालों का यह दबाव देश में बीमारियों की तेज रफ्तार की गवाही देता है:
- कैंसर: हर साल 15 से 16 लाख नए मामले सामने आ रहे हैं.
- लिवर सिरोसिस: सालाना 10 लाख से अधिक नए मामलों की पहचान होती है.
- हृदय रोग: दिल के मरीजों की संख्या 5.5 करोड़ का आंकड़ा पार कर चुकी है.
- क्रोनिक किडनी डिजीज (CKD): किडनी मरीजों की तादाद 13.8 करोड़ तक पहुंच गई है.
देश में 1.86 लाख से अधिक आयुष्मान आरोग्य मंदिर
इन गंभीर स्थितियों की सबसे बड़ी वजह बीमारी की शुरुआत में लापरवाही और जांच में देरी है. हालांकि, स्थानीय स्तर पर चिकित्सा तंत्र को मजबूत करने के लिए देश में 1.86 लाख से अधिक आयुष्मान आरोग्य मंदिर संचालित हैं, जिनमें 1.34 लाख उप-स्वास्थ्य केंद्र, 24,483 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) और 5,474 शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र शामिल हैं. इन केंद्रों पर अब तक कैंसर के लिए 60 करोड़ से अधिक, हाइपरटेंशन के लिए 41.5 करोड़ और डायबिटीज के लिए 41.3 करोड़ स्क्रीनिंग की जा चुकी हैं. इसके बावजूद, एक अध्ययन के अनुसार देश में 64 फीसदी लोग अब भी सेल्फ मेडिकेशन पर निर्भर हैं. लोग डॉक्टर के बजाय मेडिकल स्टोर संचालक, परिजनों, दोस्तों या एआई चैटबॉट्स की सलाह पर दवाइयां खा रहे हैं.
अमेरिका और यूरोप: सख्त नियम और प्राथमिक स्वास्थ्य ढांचा
पश्चिमी देशों में दवाओं और इलाज का सिस्टम भारत से काफी भिन्न और कड़े नियमों से बंधा है.
- अमेरिका का मॉडल : अमेरिका में बिना डॉक्टर के प्रेस्क्रिप्शन (पर्चे) के एंटीबायोटिक या गंभीर बीमारियों की दवा खरीदना पूरी तरह गैरकानूनी है. वहां दवाओं को दो श्रेणियों में बांटा गया है:
- OTC (Over the counter): केवल बेसिक फर्स्ट-एड और सामान्य दर्द निवारक.
- Prescription Medicines: एंटीबायोटिक्स, बीपी, शुगर, डिप्रेशन और कंट्रोल्ड ड्रग्स के लिए डॉक्टर का पर्चा अनिवार्य है, जो सीधे रजिस्टर्ड फार्मेसी को भेजा जाता है.
अमेरिका ने 2025 में स्वास्थ्य पर कुल 5.3 ट्रिलियन डॉलर (औसतन प्रति व्यक्ति 15,474 डॉलर यानी करीब 14.70 लाख रुपये) खर्च किए. इसका मतलब ये नहीं कि अमेरिका के लोग दुनिया में सबसे तंदरुस्त है या उन्हें कोई बीमारी नहीं . करीब 35 करोड़ आबादी वाले अमेरिका में 4 करोड़ से अधिक लोग डायबिटीज के शिकार हैं . तो हर दूसरा व्यस्क हाई ब्लड प्रेशर का मरीज है . ऐसे में वहां इलाज के सिस्टम को समझना जरूरी है .
अमेरिका में इलाज कराना बहुत महंगा है. ऐसे में वहां खासतौर से इलाज के चार मॉडल हैं –
- प्राइवेट हेल्थ इंश्योरेंस – जो ज्यादातर कामकाजी लोगों को कंपनियों के जरिये मिलता है . बीमा कंपनी शर्तों के हिसाब से इलाज का खर्चा उठाती है .
- मेडिकेयर – 65 साल से अधिक उम्र के लोगों के लिए संघीय सरकार का हेल्थ इंश्योरेंश योजना है .
- मेडिएड – कम आय वाले लोगों के लिए संघीय और राज्य सरकार की इलाज के लिए योजना .
- बिना बीमा के इलाज – 2025 में अमेरिका में करीब 8 फीसदी आबादी बिना हेल्थ इंश्योरेंश की रही … जिसे इलाज का पूरा खर्चा खुद उठाना पड़ा .
अमेरिका में प्राइमरी हेल्थ केयर का तंत्र बहुत मजबूत है . वहां इलाज की प्रक्रिया हमारे देश से थोड़ी अलग है . अमेरिका में मरीज को सबसे पहले हेल्थ इंश्योरेंश चुनना होता है..फिर प्राइमरी केयर डॉक्टर या स्पेशलिस्ट से अपाइंटमेंट लेना होता है. डॉक्टर की सलाह पर टेस्ट, दवाइयां या अस्पताल में भर्ती किया जाता है.आखिरी में इंश्योरेंश कंपनी शर्तों के हिसाब से इलाज के खर्चे में से अपना हिस्सा चुकाती है, बाकी मरीज को देना होता है .
अमेरिका में मरीज को दवाईयां डॉक्टर के Prescription पर ही मिलती है. बिना डॉक्टर की पर्ची के एंटीबयोटिक खरीदना मुश्किल है . यहां तक दवा रिपीट करने के लिए भी डॉक्टर की इजाजत जरूरी है – तभी किसी मेडिकल स्टोर से दवा खरीदी जा सकेगी . अमेरिका में इलाज बहुत महंगा होने की कई वजह है .
अस्पताल और मेडिकल सर्विसेज की ऊंची कीमत
इंश्योरेंस कंपनियों और अस्पतालों के बीच संबंध
दवाईयों की लागत और मरीज का अपना हिस्सा
ब्रिटेन (UK) का NHS मॉडल
ग्रेट ब्रिटेन में इलाज की जिम्मेदारी सरकार की ‘नेशनल हेल्थ सर्विस’ (NHS) के पास है. यहां परामर्श, दवाएं, सर्जरी और अस्पताल में भर्ती पूरी तरह मुफ्त है. हालांकि, इसमें एक लंबी प्रक्रिया शामिल है. मरीज को पहले जनरल प्रैक्टिशनर (GP) से मिलना होता है, जहां अपॉइंटमेंट के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता है. बीमारी की गंभीरता को देखकर ही स्पेशलिस्ट को रेफर किया जाता है. यदि कोई मरीज निजी स्तर पर तुरंत स्पेशलिस्ट से मिलना चाहे, तो उसे 150 से 300 पाउंड तक की फीस चुकानी पड़ती है.
ब्रिटेन में प्राइवेट इलाज का विकल्प खुला
ब्रिटेन में अगर कोई मरीज NHS की लंबी वेटिंग लिस्ट से बचना चाहता है तो प्राइवेट इलाज का विकल्प खुला है . हालांकि, इमरजेंसी में NHS बेहतरीन और मुफ्त इलाज देता है . वहीं, प्राइवेट में इलाज कराने पर मोटा खर्चा करना पड़ता है . ब्रिटेन में बिना रेफरल स्पेशलिस्ट से प्राइवेट में तुरंत अपाइंटमेंट के लिए 150 से 300 पाउण्ड का बिल चुकाना पड़ता है . यूरोपीय और अमेरिकी हेल्थ सिस्टम में कई ऐसी चीजे हैं – जिससे सीख ली जा सकती है. मसलन, प्राइमरी हेल्थ सर्विसेज सिस्टम का मजबूत होना, जिससे बीमारी के गंभीर होने से पहले ही पता चल जाता है और रोकथाम के लिए जरूरी उपाय होने लगते हैं . इतना ही नहीं, दवाओं के विवेकपूर्ण इस्तेमाल पर भी अमेरिका में बहुत जोर रहता है .
भारत बनाम पश्चिम: पहुंच, खर्च और अपॉइंटमेंट की हकीकत
अमेरिका में हेल्थ सर्विसेज का सिस्टम इंश्योरेंस और डॉक्टर से जुड़ा है, जिससे इलाज सुरक्षित और रिकॉर्ड में रहता है . वहां इलाज बहुत महंगा है . एक अनुमान के मुताबिक, भारत में प्राइवेट अस्पतालों में हार्ट बाईपास सर्जरी में करीब पौने सात लाख रुपये खर्च होते हैं – वहीं, अमेरिका में ये खर्चा 75 से 80 के बीच बैठता है. हमारे देश में हिप रिप्लेसमेंट में करीब साढ़े सात लाख रुपये तक का बिल आता है – वहीं, अमेरिका में 35 से 40 लाख रुपये का बिल बन जायेगा. अमेरिका एक विकसित देश है – लेकिन, अगर वहां किसी नए मरीज को स्पेशलिस्ट डॉक्टर से अपॉइंटमेंट चाहिए तो उसके लिए एक से डेढ़ महीने तक की वेटिंग सामान्य बात है . ब्रिटेन में भी स्पेशलिस्ट डॉक्टरों से मुलाकात के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता है .
यूनाइटेड किंगडम में अगर मरीज National Health Service यानी NHS के जरिए किसी स्पेशलिस्ट डॉक्टर से मिलना चाहता है – तो कैंसर के केस में 4 हफ्ते के भीतर, हार्ट के मामले में 12 से 18 हफ्ते के भीतर और हड्डी से जुड़ी बीमारियों के मामले में 20 से 40 हफ्ते में अपॉइंटमेंट मिल जाता है . जनरल प्रैक्टिशनर से अपॉइंटमेंट बीमारी की गंभीरता के आधार पर तय होता है . मतलब, हमारे देश में डॉक्टरों तक पहुंचना पश्चिमी देशों की तुलना में ज्यादा आसान है . इसके बाद भी ज्यादातर लोग डॉक्टरी सलाह को बीमारी गंभीर होने तक खास तवज्जो नहीं देते हैं .
भारत में दुनियाभर से इलाज बेहतरीन और सस्ता
दुनियाभर के मरीज सस्ते और बेहतरीन इलाज के लिए भारत की ओर देख रहे हैं . एक आंकड़े के मुताबिक, साल 2009 में जहां 1.12 लाख विदेशी मरीज इलाज के लिए भारत आए थे, वहीं 2025 में यह संख्या बढ़कर 5.07 लाख हो गई…मतलब 16 वर्षों में विदेशी मरीजों की संख्या करीब 4.5 गुना बढ़ी . पश्चिमी देशों की तुलना में भारत में इलाज बहुत सस्ता है . स्पेशलिस्ट से अपाइंटमेंट बहुत आसान है . सर्जरी और दवाईयों का खर्चा भी बहुत कम है. दवाओं के इस्तेमाल और खरीद-बिक्री को लेकर हमारे देश में अमेरिका और यूरोपीय देशों की तरह सख्त नियम-कायदे नहीं हैं . इसलिए बिना डॉक्टर के Prescription के भी ज्यादातर दवायें आसानी से मेडिकल स्टोर से मिल जाती हैं .
स्वास्थ्य का त्रि-स्तरीय ढांचा और प्राथमिक केंद्रों की चुनौतियां
भारत में स्वास्थ्य सुरक्षा का एक त्रि-स्तरीय ढांचा है—प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC), सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) और जिला अस्पताल, जिसके बाद मेडिकल कॉलेज व सुपर-स्पेशलिटी अस्पताल आते हैं. हालांकि पीएचसी नेटवर्क के आधुनिकीकरण पर काम जारी है, लेकिन जमीनी स्तर पर दशकों से डॉक्टरों की कमी, दवाओं की अनुपलब्धता और जरूरी उपकरणों के अभाव की शिकायतें रही हैं. मजबूत प्राथमिक ढांचे की कमी के चलते ही लोग सीधे मेडिकल स्टोर से दवा लेने या बीमारी को नजरअंदाज करने के लिए मजबूर होते हैं. यदि पीएचसी स्तर पर नियमित डॉक्टर और समय पर जांच उपलब्ध हो, तो बड़े अस्पतालों की कतारें और महंगे निजी इलाज की मजबूरी दोनों कम हो सकती हैं.
अति-सतर्कता बनाम घोर लापरवाही: दोनों स्थितियां घातक
हमारे देश में दो तरह के लोग हैं – एक वो जो अपनी सेहत को लेकर जरूरत से ज्यादा सतर्क हैं . वो समय-समय पर अपना हेल्थ चेकअप कराते हैं … CBC यानी Complete Blood Count, ब्लड शुगर, लिपिड प्रोफाइल, लिवर फंक्शन टेस्ट, किडनी फंक्शन टेस्ट, थायराइड प्रोफाइल, विटामिन और मिनरल्स, यूरिन टेस्ट में अगर थोड़ा भी कुछ ऊपर-नीचे हुआ – तो तुरंत उसे ठीक करने के लिए डॉक्टर के पास पहुंच जाते हैं… क्या शरीर की अंदरूनी हलचल के बीच हेल्थ रिपोर्ट में मामूली ऊपर-नीचे के ग्राफ को बहुत गंभीरता से लेने की जरूरत है? आखिर, बाहरी दखल यानी शरीर में दवा के जरिए दखल कब होना चाहिए ? दूसरी ओर, देश में एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है – जो अपने शरीर में बीमारी को तब तक छुपाता है – जब तक शरीर जवाब न देने लगे . ऐसे लोगों की संख्या भी कम नहीं है – जो डॉक्टर द्वारा एक बार लिखी गयी बीपी या शुगर की दवा 4-5 साल तक चलाते रहते हैं . बीच में कभी डॉक्टर से संपर्क करने या दवा के शरीर पर प्रभाव को जानने और समझने की कोशिश नहीं करते हैं . दोनों ही स्थितियां खराब हैं . विकसित भारत के सपने को सकार करने के लिए ठीक नहीं हैं .
कमाई और सेहत का सीधा कनेक्शन: दो हिस्सों में बंटा भारत
145 करोड़ की आबादी वाले भारत में आर्थिक गैर-बराबरी का सीधा असर लोगों के स्वास्थ्य और इलाज के तौर-तरीकों पर साफ दिखाई देता है. एक हालिया अध्ययन के अनुसार, देश के शीर्ष 10 फीसदी लोगों की कुल राष्ट्रीय आय में 58 फीसदी हिस्सेदारी है, जबकि नीचे की 50 फीसदी आर्थिक रूप से कमजोर आबादी मिलकर केवल 15 फीसदी कमा पाती है. ऐसे में कमाई का सेहत से सीधा कनेक्शन है.
सम्पन्न वर्ग (ओवर-केयर और सप्लीमेंट्स): आर्थिक रूप से मजबूत वर्ग समय-समय पर नियमित हेल्थ चेकअप करवाता है और छोटी-छोटी अंदरूनी हलचलों पर डॉक्टरों से लगातार परामर्श लेता है. हालांकि, कई बार जरूरत से ज्यादा सतर्कता के फेर में गैर-ज़रूरी सप्लीमेंट्स और दवाओं का इस्तेमाल बढ़ जाता है. यह दवाएं किसी एक पैरामीटर को नियंत्रित तो कर देती हैं, लेकिन शरीर पर कई तरह के साइड इफेक्ट्स छोड़ जाती हैं.
वंचित वर्ग (मजबूरी में ही अस्पताल का रुख): दूसरी ओर, ग्रामीण और कमजोर तबके का एक बहुत बड़ा हिस्सा बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं से भी वंचित है. 35 से 40 वर्ष की उम्र तक इस वर्ग के अधिकांश लोगों ने जीवन में कभी फुल बॉडी चेकअप नहीं कराया होता. आर्थिक तंगी के चलते जांच और डॉक्टर की फीस वहन करना मुमकिन नहीं होता, जिससे जांच केवल अत्यंत गंभीर या आपातकालीन स्थिति में ही कराई जाती है.
2047 का विजन और बुनियादी ढांचे की जरूरत
जिस रफ्तार से भारत में बीमारों की संख्या बढ़ रही है और दवाइयों से लोगों का तेजी से नाता जुड़ता जा रहा है…वैसे में 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र की कतार में खड़ा करने के लिए जरूरी है कि देश के भीतर बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं का बुनियादी ढांचा नीचे से मजबूत किया जाए … भारत की बड़ी आबादी को अभी और सस्ता… और बेहतर इलाज की जरूरत है . एक ऐसा मजबूत ढांचा खड़ा की जरूरत है…जहां जाकर लोग अपनी बीमारी के बारे में डॉक्टर से खुलकर सलाह ले सकें..जहां खर्चा इतना कम हो..जिसे चुकाने में आर्थिक रूप से कमजोर आदमी को भी दिक्कत न हो… जहां वो समय-समय पर सस्ते में टेस्ट करा सके..लोगों के सामने अपनी समझ और मर्जी से दवाइयां खरीदकर खुद इलाज करने की मजबूरी न रहे .
डायग्नोस्टिक्स बाजार का बूम बनाम बीमारी का फैलाव
एक अनुमान के मुताबिक, हमारे देश में हेल्थ चेकअप का बाजार करीब 10 हजार से 11 हजार करोड़ रुपये के बीच का है, जिसके 2033 तक 24 से 25 हजार करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है . इसी तरह डायग्नोस्टिक का बाजार अभी एक लाख करोड़ के आसपास है – जिसमें से 76 फीसदी शहरी क्षेत्रों से आते है और 24 फीसदी गांवों में . ब्लड प्रेशर और डायबिटीज तो अब युवाओं को भी तेजी से अपनी चपेट में ले रहे हैं . वहीं, हमारे देश में कैंसर मरीजों की संख्या भी बहुत तेजी से बढ़ रही है. एक तरह से भारत कैंसर कैपिटल बनता जा रहा है . इसी तरह, पिछले सात वर्षों में दिल के मरीजों की संख्या तीन गुना बढ़ी है .
आपको जानकर हैरानी होगी कि हमारे देश में रोजाना 7800 से अधिक लोग दिल से जुड़ी बीमारियों की वजह से दम तोड़ देते हैं. भारत के लोगों का लिवर भी तेजी से खराब हो रहा है – 5 से 7 करोड़ लोग लिवर की गंभीर बीमारियों से जूझ रहे हैं. ऐसे में शरीर में बढ़े हल्के यूरिक एसिड, बॉर्डर लाइन पर शुगर, बीपी या कॉलेस्ट्रोल की कई वजह हो सकती है..इसे खतरे की घंटी भी माना जा सकता है, जो मरीज और डॉक्टर दोनों को सोचने का वक्त देते हैं. ऐसे बदलावों को बिना किसी दवा के लाइफस्टाइल में बदलाव के जरिए भी ठीक किया जा सकता है. कई बार एक बेहतर इलाज ये भी मुमकिन है कि कुछ न किया जाए – सिर्फ सतर्कता और सावधानी बरती जाये . लेकिन, क्या हमारे डॉक्टर ऐसा इलाज मरीजों को सुझाएंगे और क्या हमारे देश के मरीज ऐसा इलाज सुझाने वाले डॉक्टरों पर भरोसा करेंगे?
चुनौती ये भी है कि हमारे देश की बड़ी आबादी के जेहन से अदृश्य बीमारियों को पालने-पोसने वाली मानसिकता को कैसे निकाला जाये? छोटी बीमारियों में डॉक्टरी सलाह को गैर-जरूरी, फालतू और खर्चीला समझने वाली सोच से कैसे आजादी दिलाई जाए? क्योंकि, सेहत को लेकर सावधानी और सर्तकर्ता कई बड़ी और गंभीर बीमारियों से शरीर को बचा सकती है . तरक्की की तेज रफ्तार में कदमताल के साथ जिंदगी जीने का एक ऐसा संतुलित तरीका आजमाने की जरूरत है … जिसमें अदृश्य बीमारियों के खिलाफ शरीर में कवच तैयार किया जा सके . क्योंकि, स्वस्थ नागरिक ही खुद का … अपने परिवार का, अपने समाज का और अपने देश के विकास में दमदार भूमिका निभा सकते हैं .