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प्राचीन भारत से विकसित भारत तक, कैसे बदली नारी की भूमिका? अभी बाकी है छूना आसमान

दुनिया बदल रही है. उससे भी तेज रफ्तार से दुनिया की तरक्की में महिलाओं की भूमिका बढ़ रही है. आज की नारी मां दुर्गा में भले ही मां दुर्गा की तरह दस हाथ न हो लेकिन, अपने दो हाथों से उसे दस हाथों जैसा काम करना पड़ता हैं.

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हमारी वर्कफोर्स में महिलाएं किस रफ्तार से बढ़ रही है? (Photo: News24)

ये एक शाश्वत सत्य है, जो बदलावों को कुबूल कर लेता है वो अपना किरदार खुशी-खुशी बेहतर ढंग से निभाता है. अब आपके मन में सवाल उठ रहा होगा कि आज मैं बदलाव की बात क्यों लगी? बदलाव की बयार राजनीति में भी चल रही है और कूटनीति में भी. सामाजिक ताने-बाने में भी और महिला-पुरुष के रिश्तों में भी. ऐसे में शारदीय नवरात्रि में जब भारत के करोड़ों घरों में रोजाना देवी के अलग–अलग रूपों की पूजा हो रही है, लोग व्रत रखे हुए हैं. देवी को प्रसन्न करने की कोशिश कर रहे हैं. कन्या पूजन करेंगे, दूसरी पर महिलाओं पर अत्याचार और हिंसा की खबरें भी आ रही हैं. देश में रोजाना 80 से 90 रेप के मामले सामने आते हैं. ऐसा क्यों ? ऐसे में ये जानना और समझना जरूरी है कि हमारे देश में सामान्य महिलाओं की स्थिति क्या है? उनका घर से बाहर तक किरदार किस तरह बदल रहा है? उनकी आवाज और पहचान को कहां से शक्ति मिल रही है ? प्राचीन भारत में महिलाओं की स्थिति क्या थी? हिंदू परंपरा में धन की देवी हैं लक्ष्मी. ज्ञान की देवी सरस्वती और शक्ति की देवी दुर्गा. मतलब, अगर देवलोक में कोई कैबिनेट जैसी व्यवस्था रही होगी – तो उसमें सभी हाई प्रोफाइल मंत्रालयों की बागडोर महिलाओं के हाथों में होगी. मां दुर्गा महिषासुर मर्दिनी है. उनके दस हाथ हैं. वो एक समय में कई काम करती हैं. हमारी परंपरा में महिला को शक्ति स्त्रोत के रुप पर देखा गया है. नारी को सृष्टि के संचालन में शक्ति, सृजन और संतुलन का संगम का रूप माना गया. करीब 5 हजार साल पुरानी सरस्वती और सिंधु नदियों के किनारे फली-फूली सभ्यता के अवशेष बताते है कि उस दौर में महिलाओं को समाज में बहुत ऊंचा स्थान था. प्राचीन ग्रंथ बताते हैं कि महिलाएं संभवत: पुरुषों के साथ युद्ध में भी हिस्सा लेती थीं. त्रेता युग में युद्ध के दौरान राजा दशरथ के रथ का धुरा टूटा, तो कैकई ने रथ के पहिये में अपना हाथ लगा दिया. इसी तरह राजा जनक ने जब अपनी बेटी सीता को शिव धनुष उठाये देखा तो प्रण किया कि जो उस धनुष को तोड़ेगा, उसी के साथ सीता का विवाह होगा. मतलब, सीता युद्ध कला में पारंगत थीं. महाभारत काल में द्रौपदी का जन्म अग्नि से बताया गया, जिनके स्वयंवर में मछली की आंख भेदने की शर्त रखी गयी थी. दक्षिण भारत के सातवाहन शासक अपने नाम से पहले अपनी माता का नाम लगाते थे. दुनियाभर में मशहूर सांची स्तूप में करीब साढ़े तीन सौ महिला दानियों का जिक्र है. मतलब, आज से करीब ढाई हजार साल पहले महिलाओं के पास दौलत और उसे अपने हिसाब से इस्तेमाल करने की आजादी थी. उस दौर में महिलाओं के कारोबार यानी बिजनेस में शामिल होने के भी संकेत मिलते हैं. प्राचीन भारत में महिलाओं की बेहतर सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक स्थिति के अनगिनत उदाहरण दिये जा सकते हैं. लेकिन, बड़ा सवाल ये है कि आखिर ऐसा क्या हुआ – जिससे देश की आधी आबादी का बड़ा हिस्सा घर की चारदीवारी में सिमट गया ? पिछले कुछ दशकों में हमारे समाज की बेटियों और महिलाओं को लेकर सोच में कितना बदलाव आया है ? हमारी वर्कफोर्स में महिलाएं किस रफ्तार से बढ़ रही है? विकसित भारत में महिलाएं किस तरह की भूमिका निभाती दिख सकती है ? संसद और विधानसभाओं से लेकर कॉरपोरेट बोर्डरूम तक में महिलाएं किस तरह अपनी धमक बढ़ा रही हैं? आज कुछ ऐसे ही सवालों के जवाब अतीत के पन्नों से लेकर भविष्य की दूरबीन से देखने की कोशिश करेंगे – अपने स्पेशल शो में नारी शक्ति की उड़ान.बाकी है छूना आसमान !

जिस रफ्तार से तकनीक बदल रही है. दुनिया बदल रही है. उससे भी तेज रफ्तार से दुनिया की तरक्की में महिलाओं की भूमिका बढ़ रही है. आज की नारी मां दुर्गा में भले ही मां दुर्गा की तरह दस हाथ न हो लेकिन, अपने दो हाथों से उसे दस हाथों जैसा काम करना पड़ता हैं. घर-परिवार की जिम्मेदारी संभालने के साथ दफ्तर में ड्यूटी भी करनी पड़ती है, जिससे जिंदगी की मुश्किलें आसान हो सकें. लेकिन, बदलते वक्त के साथ रिश्तों के मायने भी तेजी से बदल रहे हैं. इसी हफ्ते मेरठ सेशन कोर्ट ने मुस्कान और साहिल को फांसी की सजा सुनाई. नीले ड्रम कांड से मुस्कान देश के घर-घर चर्चा का मुद्दा बन गयी. सवाल पूछा जाने लगा कि क्या एक महिला इतनी क्रूर हो सकती है कि वो अपने पति की हत्या कर नीले ड्रम में सील कर दे? इंदौर की सोनम रघुवंशी हो या पुणे की सिया गोयल. ऐसे कई नाम हाल के वर्षों में सुर्खियां बने. महिलाओं के तौर-तरीके और तेवर को लेकर सवाल उठाए गये. इन बदलावों को समाज का हर वर्ग अपने-अपने लेंस से देखने की कोशिश कर रहा है. लेकिन, क्या इक्का-दुक्का घटनाओं के आधार पर भारत जैसे विशाल देश की महिलाओं के बारे में टिका-टिप्पणी या कोई राय बनाना ठीक है ? संभवत: बिल्कुल नहीं. सच्चाई ये है कि पिछले कुछ दशकों में महिलाओं ने पुरुषों के वर्चस्व वाले हर क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बढ़ायी है. चाहे लड़ाकू विमान उड़ना हो या सरहद की निगेहबानी. एक आंकड़े के मुताबिक, हमारे देश की वर्कफोर्स में साल 2017-18 में महिलाओं की हिस्सेदारी 23.3 फीसदी थी – जो 2025 में बढ़कर 40 फीसदी पर पहुंच गई. साल 2025 में 15 साल से अधिक उम्र की 20 करोड़ लड़कियां या महिलाएं रोजगार में थीं. ऐसे में भारत के नक्शे पर महिलाओं की किरदार तेजी से चमकदार होता जा रहा है.

बदलते भारत में ऐसा कोई क्षेत्र नहीं-ऐसा कोई काम नहीं-जहां महिलाएं अपनी दमदार मौजूदगी दर्ज न करा रही हों. भारत के राष्ट्रपति की कुर्सी पर द्रौपदी मुर्मू हैं. सुप्रीम कोर्ट के 37 जजों में तीन महिलाएं हैं. जस्टिस बी.वी. नागरत्ना, जस्टिस वी. मोहना और स्टिस सुनीता अग्रवाल. अगले साल सितंबर में जस्टिस बी.वी. नागरत्ना का पहली महिला चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया बनना तय है. मोदी सरकार के मंत्रियों में दो महिलाएं कैबिनेट मंत्री हैं. वित्त मंत्रालय की जिम्मेदारी निर्मला सीतारमण संभाल रही हैं.अन्नपूर्णा देवी को महिला एंव बाल कल्याण मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपी गयी है. ब्यूरोक्रेसी में भी महिलाओं की भागीदारी तेजी से बढ़ी है. केंद्र सरकार में हर पांच में से एक सेक्रेटरी लेबल पोस्ट पर महिला अफसर है. वैसे तो सर्विंग IAS अफसरों में महिलाओं की भागीदारी 20 से 21 फीसदी है . लेकिन, 2024 बैच में IAS में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 41% पर पहुंच चुका है. IPS में महिलाओं की भागीदारी फिलहाल 20 से 21% के बीच है. लेकिन, पिछले कुछ वर्षों में ये संख्या तेजी से बढ़ते हुए 28% से 35% तक पहुंच गयी है.

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कुछ साल पहले तक इंजीनियरिंग सेक्टर में महिलाओं की संख्या गिनती की थी. लेकिन, आज की तारीख में पासआउट होनेवाले इंजीनियरिंग ग्रेजुएट्स में से 28 से 30 फीसदी के बीच लड़कियां हैं. देश की सेहत ठीक करने की जिम्मेदारी भी महिलाएं पूरी शिद्दत से उठाने के लिए तेजी से कदम बढ़ा रही हैं. देश के डॉक्टरों में महिलाओं की संख्या 29% तक पहुंच चुकी है. वहीं, नर्सिंग और अन्य पदों पर महिलाओं की मौजूदगी 80% तक है. कॉरपोरेट सेक्टर में भी महिलाओं की भागीदारी बढ़ रही है और निजी क्षेत्र की कंपनियों में महिला निदेशकों की हिस्सेदारी 30% पहुंच गई है. एक अनुमान के मुताबिक, प्राइवेट सेक्टर में एंट्री लेबल पर महिलाओं की संख्या करीब 33 फीसदी है. वहीं, मैनेजमेंट लेबर पर ये संख्या 24 फीसदी के आसपास है. एक स्टडी के मुताबिक, संगठित और असंगठित के वर्कफोर्स में आधी आबादी की हिस्सेदारी 41 फीसदी से अधिक है.

खेती महिलाओं के रोजगार का सबसे बड़ा आधार है. अगर क्षेत्र के हिसाब से देखा जाये तो कृषि, वानिकी और मत्स्य पालन में 64.4%, अन्य सेवाओं में 13%, मैन्युफैक्चरिंग में 11.8%, व्यापार, होटल और रेस्तरां में 6.4%, कंस्ट्रक्शन 4%, परिवहन, भंडारण और संचार 1.3%. आज की तारीख में महिलाएं गांव से लेकर शहर तक..खेल के मैदान से अंतरिक्ष तक अपनी चटक छाप छोड़ रही हैं. आसमान में फाइटर जेट उड़ाने से लेकर जमीन पर सरहद की सुरक्षा का मोर्चा महिला शक्ति ने संभाल रखा है. आर्मी में 6.85%, नेवी में 6% और एयरफोर्स में 13.4% महिलाओं की भागीदारी है. महिलाएं तेजी से विकसित भारत में नई कहानी लिखने के लिए मार्च कर रही हैं.

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Indian Armed Forces यानी Army, Air Force और Navy में करीब 11000 महिलाएं अफसर हैं. साल 2014 में ये संख्या करीब तीन हजार के आसपास है. दिल्ली में हाल में हुए धरना-प्रदर्शन के दौरान भारी तादाद में हथियारों से लैश महिला सुरक्षाकर्मी दिखीं. वो भी किसी की बेटी हैं. किसी की पत्नी हैं. किसी की मां हैं. ऐसी महिलाओं पर चर्चा क्यों नहीं होती – जो घर और बाहर दोनों की जिम्मेदारियां निभा रही हैं. जो एक तरह से डबल ड्यूटी करती हैं. जीडीपी वाली सोच और आंकड़ों में घरेलू काम की कोई अहमियत नहीं है. क्योंकि, घरेलू काम की कोई सैलरी नहीं होती है. उसे सर्विस की कैटगरी में भी नहीं गिना जाता है. हमारे सामाजिक ताने-बाने में घरेलू काम-काज महिलाओं की Understood जिम्मेदारी है. अगर घर एक कंपनी होता – तो महिलाएं उसकी CEO, COO, CFO, मैनेजर, वर्कर, स्पोर्ट स्टॉप सब होतीं.जिस काम के बदले उन्हें कोई सैलरी नहीं मिलती है. ये रोल हमारे देश की आधी आबादी गांव से लेकर शहर तक निभा रही है. इस रोल को निभाने में वो अपनी पहचान को भी खो देती हैं – उनकी पहचान किसी की पत्नी, किसी की मम्मी और किसी की बेटी तक सीमित रह जाती है. लेकिन, इंटरनेट ने महिलाओं की आवाज और पहचान को आगे करने में एक बड़ी भूमिका निभायी है. बदलते भारत में महिलाएं अपनी पुरानी पहचान के साथ नई पहचान बना रही हैं – जो विकसित भारत के लिए GDP को बड़ा बनाने में आधी शक्ति बनने की राह पर आगे बढ़ रही हैं.

एक स्टडी के मुताबिक, हमारे देश में एक महिला रोजाना औसतन 289 मिनट मतलब करीब 5 से 6 घंटे रोजाना सिर्फ घरेलू काम में खर्च करती है. जिसके लिए उसे कोई सैलरी नहीं मिलती है. लेकिन, पढ़ी-लिखी महिलाएं घरेलू जिम्मेदारियां निभाने के साथ रोजगार के लिए घर की दहलीज से बाहर भी देख रही हैं. उनके सपनों को परवाज मिली है – इंटरनेट से. इंटरनेट से लैस स्मार्टफोन उन्हें कमाई के नये रास्ते दिखा रहा है. आवाज बुलंद करने का हौसला दे रहा है.

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दरभंगा में बैठी कोई महिला इंटरनेट के जरिए अपना अचार देश के हर कोने तक पहुंचा रही है .कोई महिला बिहार में अपने गांव से ही खाजा-तिलकुट दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों तक पहुंचा रही है.तो कोई शादी-ब्याह के लोग गीतों को दुनिया के नक्शे पर नई पहचान दिलाने के लिए कोशिश कर रही है. बिजनेस आइडिया से लेकर दुनिया से जुड़ने तक में..खास प्रोडक्ट के लिए बाजार तलाशने से लेकर हुनर तराशने तक में.इंटरनेट क्रांतिकारी भूमिका निभा रहा है. 2047 तक विकसित भारत बनाने के लिए जरूरी है कि महिलाओं को Workforce में इस तरह जोड़ा जाये – जिससे उनकी क्षमता और हुनर का पूरा इस्तेमाल हो सके. एक ऐसा सुरक्षित और समावेशी Eco System बनाना होगा- जिसमें महिलाएं बिना किसी हिचकिचाहट के दफ्तर और कारखानों में काम के लिए निकल सकें. नौकरी, उद्योग, उद्योग, स्टार्टअप, सर्विस, कृषि-प्रसंस्करण और डिजिटल अर्थव्यवस्था में सक्रिय भागीदारी निभा सकें . महिलाओं की आर्थिक भागीदारी बढ़ने का मतलब होगा परिवार की कमाई के साथ-साथ देश की GDP को भी ताकत मिलना. पिछले कुछ वर्षों में महिलाओं को लेकर समाज की सोच में बहुत बदलाव आया है – लेकिन, अभी बहुत कुछ बदलना बाकी है.

आज देश में लाखों महिलाएं स्वयं सहायता समूहों यानी Self Help Groups, छोटे कारोबार, हस्तशिल्प, फूड प्रोसेसिंग, एग्री प्रोडक्ट, ब्यूटी, वेलनेस सर्विसेज, रिटेल और डिजिटल कमर्स के जुड़ रही हैं. अगले दो दशकों में गांव से शहर तक यही छोटे कारोबार बड़े कारोबार में बदलेंगे. मतलब, विकसित भारत में महिलायें नौकरी खोजने वाली नहीं बड़े स्तर पर नौकरी पैदा करने वाली भूमिका में दिखेंगी . किसान परिवारों की पढ़ी-लिखी बेटियां-विकसित भारत में खेती की तस्वीर बदलती दिख सकती हैं. मतलब, आने वाले समय में खेतों में महिलाएं सिर्फ मजदूर के रूप में काम करती नहीं दिखेंगी – तकनीक की मदद से खेती के तौर-तरीकों में बड़े बदलाव की सूत्रधार बनती दिख सकती हैं- Experimentative Farmer, Producer, Entreprenure और Exporter के तौर पर देश के कृषि सेक्टर की तस्वीर बदलती दिख सकती हैं.

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इसमें कोई शक नहीं कि गांवों में भी गरीब परिवारों के लोग बेटियों को स्कूल-कॉलेज भेजने में जरा भी हिचकिचाहट नहीं दिखा रहे.टीवी, स्मार्टफोन और इंटरनेट ने बेटियों का दुनिया से साक्षात्कार कराया है. अवसरों का आसमान दिखाया. ये भी सच है कि STEM यानी Science, Technology, Engineering, and Mathematics की पढ़ाई में लड़कियों की संख्या तेजी से बढ़ रही है. देश में STEM की पढ़ाई करने वालों में 43 फीसदी लड़कियां है. इसका एक मतलब ये हुआ कि विकसित भारत में टेक्निकल और प्रोफेशनल डिग्री वाली मम्मियों की बड़ी तादाद होगी . जो अपनी बेटियों को खुद से बेहतर बनाने की कोशिश करती दिख सकती हैं. मतलब, आने वाले वर्षों में भारत को दुनिया की टेक कैपिटल बनाने में महिला शक्ति बड़ी भूमिका निभाती दिख सकती हैं. लेकिन, एक और पक्ष पर गंभीरता से विचार करना जरूरी है. महिलाओं का काम तो लगातार बढ़ रहा है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या पुरुष महिलाओं का घरेलू काम हल्का करने में बराबरी की भूमिका निभाएंगे? क्या घर संभालने से लेकर बच्चों को बड़ा करने तक में पुरुषों की भूमिका बराबरी की रहेगी? क्या हमारा समाज इसे आसानी से कबूल करेगा? महिलाओं को लेकर समाज की सोच और नजरिये में आखिर कितना बदलाव आयेगा?

जब बेटियां स्कूल-कॉलेज में पढ़ेंगी. दफ्तरों में नौकरी करेंगी. फैक्ट्री चलाएंगी. स्कूल-कॉलेज में पढ़ाएंगी.हर महीने पुरुषों की तरह कमा कर लाएंगी. तो फिर घर संभालने की पूरी जिम्मेदारी सिर्फ उनकी ही क्यों ? घर और दफ्तर के बीच संतुलन बनाने की एकतरफा जिम्मेदारी सिर्फ महिलाओं की ही क्यों? रोजमर्रा की घरेलू जिम्मेदारियां निभाने में बराबरी वाली सोच को समाज कब और किस तरह कुबूल करेगा ? महिलाओं के लिए आजादी की सीमा अक्सर सुरक्षा के नाम पर खींच दी जाती है. हमारा समाज बेटियों से कामयाबी की उम्मीद तो करता है. लेकिन, उनसे ये भी उम्मीद की जाती है कि वो पारंपरिक रहे. समाज और परिवार की मर्यादा में रहें.

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ये हमारी परंपरा और सामाजिक ताने-बाने से निकला मर्म है. समाज और सृष्टि को आगे बढ़ाने में महिला शक्ति की भूमिका है- जिसमें लोग शक्ति के लिए दुर्गा, धन के लिए लक्ष्मी और ज्ञान के लिए सरस्वती की पूजा करते हैं. दूसरी ओर, एक सच ये भी है कि महिलाओं के खिलाफ हिंसा और अपराध भी होते हैं . NCRB यानि National Crime Records Bureau के आंकड़ों के मुताबिक, 2024 में महिलाओं के खिलाफ अपराध के 4,41,534 मामले दर्ज हुये. वहीं, 2023 में ये आंकड़ा 4,48,211 का रहा. 2022 में 4,45,256 और 2021 में 4,28,278. 2024 में रोजाना महिलाओं के खिलाफ अपराध के औसत 1200 से अधिक केस दर्ज हुये. लेकिन, ये पूरी तस्वीर नहीं है. FIR में दर्ज घटनायें समाज में महिलाओं के खिलाफ अपराधों की पूरी संख्या नहीं बताते हैं. कई घटनायें सामाजिक दबाव, पारिवारिक प्रतिष्ठा और पुलिस तक पहुंच में दिक्कतों की वजह से अपराधिक रिकॉर्ड में नहीं आ पती हैं. NCRB के आंकड़े बताते हैं कि महिलाओं के खिलाफ अपराध में सबसे बड़ा हिस्सा घरेलू हिंसा है यानि पति और रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता.

महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान का मसला सिर्फ सड़क, सार्वजनिक स्थान, कार्यस्थल तक सीमित नहीं है. घर, परिवार और परिचितों के बीच भी महिला सुरक्षा उतना ही जरूरी है. किसी भी समाज में महिलाओं की सुरक्षा सिर्फ कानून के जरिये सुनिश्चित नहीं की जा सकती है. आधी आबादी की सुरक्षा और सम्मान का रास्ता समाज के भीतर से निकलना चाहिये. इसे कानून के साथ-साथ सामाजिक व्यवहार में शामिल करने की आदत डालनी होगी . सुरक्षित भारत सिर्फ महिलाओं के लिए ही बेहतर नहीं होगा.बल्कि, दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र और बुलंद गणतंत्र के एक-एक नागरिक के लिये होगा.

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विकसित भारत के लिए महिलाओं को लेकर समाज की सोच में भी बड़े बदलाव की दरकार है. ये बात जेहन से निकालनी होगी कि मेहनत करना पुरुषों का काम है और सतंलुन बनाना महिलाओं की जिम्मेदारी. क्योंकि, विकसित भारत में महिलाएं सिर्फ Work Force में ही भागीदार नहीं होंगी.वो Leadership और Ownership में भी बराबर की हिस्सेदारी के लिए संघर्ष कंधे से कंधा मिलाते हुये हर मोर्चे पर दिखेंगी. वो Wealth creator, taxpayer, entrepreneur, policymaker, leader भी होंगी. वो नौकरी मांगने से अधिक नौकरी देने वाला बनना चाहती हैं. गांवों में महिलायें भी विकसित भारत बनाने की दिशा में ग्रोथ इंजन बनने के लिए तैयार बैठी हैं. मौजूदा समय में राजनीति महिलाओं को एक वोट बैंक के तौर पर देखती है. सरकारी योजनाओं के जरिये आधी आबादी में एक बड़े वर्ग को लाभार्थी के तौर पर देखती है. लेकिन, महिलायें इस भूमिका से निकलना चाहती हैं. भले ही देश के 21 राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों में पंचायत और निकाय में महिलाओं के लिए आधी सीटें रिजर्व हैं. लेकिन, संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की संख्या पुरुषों की तुलना में बहुत कम है. ऐसे में संसद के भीतर और विधानसभाओं के अंदर तस्वीर बदलनी तय है.

भले ही महिलाओं को संसद और विधानसभाओं के भीतर एक तिहाई आरक्षण देने के लिए नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 कानून बन चुका हो.लेकिन, अभी तक ये जमीन पर लागू नहीं हो पाया है. 2029 आम चुनाव से इसे लागू कराने की एक कोशिश इस साल अप्रैल में हुई. लेकिन, सरकार को कामयाबी नहीं मिली. राजनीतिक गलियारों में ऐसी चर्चा है कि सरकार महिला आरक्षण और परिसीमन बिल पारित कराने के लिए संसद का विशेष सत्र बुला सकती है.

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भले ही चुनाव में महिलायें खुल कर अपनी राजनीतिक पसंद और नापसंद का इजहार कर रही हैं. किसी को सत्ता में लाने और सत्ता से बाहर करने में निर्णायक भूमिका निभा रही हैं. लेकिन, देशभर में खड़ी विधानसभाओं के भीतर महिलाओं की हिस्सेदारी करीब 10 फीसदी है . वहीं, साल 2024 में सिर्फ 74 महिलाएं हीं चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंच पाईं.ऐसे में अगर महिलाओं के लिए संसद और विधानसभाओं के भीतर एक तिहाई आरक्षण लागू करने वाली राह में खड़े स्पीडब्रेकर्स हट जाते हैं – तो महिला सांसद और विधायकों की संख्या में एकाएक बढ़ोत्तरी होनी तय है. कानून बनाने से सरकार चलाने तक में महिलाओं की आवाज को मजबूती मिलेगी.

प्रधानमंत्री मोदी ने 2047 तक भारत को विकसित देश बनाने का टारगेट सेट किया है. महिलाएं खुलकर अपनी राजनीतिक पसंद-नापसंद का इजहार EVM पर बटन दबाकर कर रही हैं. लेकिन, संसद और विधानसभाओं के भीतर में उन्हें अपने हक का इंतजार है. सामान्य परिवारों की महिलायें भी राजनीति में आकर कुछ करना चाहती है – उनके सपनों को परवाज दी है – संसद से पास नारी शक्ति वंदन अधिनियम ने. भले ही ये अभी लागू नहीं हुआ है. लेकिन, देर-सबेर नारी शक्ति वंदन अधिनियम का लागू होना तय है. मतलब, वो दिन दूर नहीं – जब संसद और विधानसभाओं की एक-तिहाई सीटों पर महिला प्रतिनिधि दिखेंगी. आधी आबादी चाहती है कि नीति-निर्माण और फैसलों में उनकी आवाज गंभीरता से सुनी है. महिलाएं जिस तरह से राजनीति में दिलचस्पी दिखा रही है – वैसे में 2047 तक संसद और विधानसभा के भीतर आधी आबादी की संख्या आधी से अधिक हो जाये – तो कोई हैरानी की बात नहीं होगी. लेकिन, क्या महिलाओं को लेकर समाज की सोच बदलेगी ? दरअसल, समाज की सोच और परिवार के भीतर के फैसले अर्थोपार्जन करने वाले शख्स से प्रभावित होते हैं. हमेशा कमाई करने वाले की बात ध्यान से सुनी जाती है. ऐसे में भारत में जिस रफ्तार के साथ बेटियां Wealth Creator बनने की राह पर आगे बढ़ रही हैं – उसमें महिलाओं की आवाज घर से भीतर और बाहर दोनों मोर्चों पर गंभीरता सुनी जानी तय दिख रही है. ऐसे में समाज भी इस सोच को भारी मन और मजबूरी में ही सही.स्वीकार करता दिख सकता है कि अगर बहू कमाने वाली मिली है तो बेटा घर संभाल लेगा? ये विकसित भारत में समाज के भीतर मंथन का विषय होगा कि महिला और पुरुष किस किरदार में अपनी जिंदगी की गाड़ी बेहतर तरीके से आगे बढ़ते देखते हैं. लेकिन, एक बात तय है कि बेटियां आधी आबादी का हिस्सा भर नहीं रहना चाहिए वो विकसित भारत की विकास गाथा में आधी शक्ति की भूमिका निभाना चाहती है. कभी दुर्गा बन कर.कभी लक्ष्मी बन कर.कभी सरस्वती बन कर.कभी महिषासुर मर्दिनी बन कर.

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लेखक के बारे में

Anurradha Prasad

अनुराधा प्रसाद के लिए पत्रकारिता सिर्फ पेशा नहीं...मिशन है। अपनी साढ़े तीन दशक की टेलीविजन पत्रकारिता में हर तरह का प्रयोग देखा...हर बदलाव की साक्षी रहीं... एक तेज-तर्रार रिपोर्टर से सफल मीडिया उद्यमी बनीं....अपनी तेज नज़र, दूरदर्शी सोच और कलम के दम पर मीडिया जगत में एक दमदार हस्ताक्षर हैं। अनुराधा प्रसाद जी न्यूज़ 24 की एडिटर-इन-चीफ और बीएजी नेटवर्क की सीएमडी हैं  । बतौर टेलीविजन पत्रकार हर भारतीय की आवाज बुलंद करने की ईमानदार कोशिश किया और हमेशा Think First के फलसफे पर आगे बढ़ने में यकीन करती हैं। न्यूज़ 24 पर इतिहास गवाह है...सीरीज के जरिए दर्शकों को अतीत के पन्नों से रू-ब-रू करवाती रही हैं.. तो भारत भाग्य विधाता जैसी सीरिज के जरिए उन संस्थाओं और व्यक्तियों से दर्शकों का परिचय कराया- जो आजाद भारत में लोकतंत्र को  मजबूत और गणतंत्र को बुलंद बनाने में खामोशी से कर्मयोगी की भूमिका में हैं। इसी तरह भारत एक सोच के जरिए वक्त से आगे की सोच से भी दर्शकों का साक्षात्कार कराती रही हैं । ये अनुराधा प्रसाद की मुखर और प्रखर सोच का ही नतीजा है कि न्यूज़ 24 पर माहौल क्या है-कार्यक्रम में आम आदमी की आवाज को  पूरी तवज्जो मिलती है...तो India’s Tiger जैसी टेली सीरीज के जरिए उन गुमनाम जासूसों के योगदान से भी दर्शकों तो मिलवाने का भगीरथ प्रयास हो रहा है, जो खामोशी से अपना काम कर नेपथ्य में चले गए । मंथन का मंच सजा कर समाज और सिस्टम के असरदार लोगों की सोच से दर्शकों का साक्षात्कार कराती रही हैं । 1990 के दशक में प्रसारित आपके The horse's mouth और Let’s Talk शो ने भारतीय टेलीविजन को चर्चित शख्सियतों के इंटरव्यू का नया अंदाज दिया...तो आमने-सामने में आपके तीखे सवालों का देश के ज्यादातर सियासतदानों ने सामना किया। आपकी अगुवाई में बीएजी नेटवर्क ने सामाजिक सरोकार और जागरूकता के संदेश वाले कई कार्यक्रम बनाए तो चुनावी मौसम में नेताओं के चाल, चरित्र और चेहरे को भी रोचक अंदाज में दर्शकों के सामने रखने का सफल प्रयोग किया । अनुराधा प्रसाद भारत में टेलीविजन पत्रकारिता में पहली पीढ़ी की पत्रकार हैं...जिन्होंने अपनी बुलंद सोच और नए-नए शोज से भारतीय टेलीविजन न्यूज़ का चेहरा बदला । अनुराधा प्रसाद भारत को समर्पित एक ऐसी शख्सियत हैं... जो पत्रकारिता के जरिए हमेशा समाज को कुछ नया देने के मिशन में पूरी शिद्दत से जुटी रहती हैं...जुटी हुई हैं और जुटी रहेंगी।
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