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क्या आप जानते हैं भारत में क्यों करते हैं राइट-हैंड-ड्राइव? चौंकाने वाली है वजह
जिस ड्राइविंग सिस्टम को हम रोजमर्रा की आदत मानते हैं, वही भारत के लिए अरबों का मौका बन चुका है. दुनिया के करीब 75 देश राइट-हैंड-ड्राइव अपनाते हैं, लेकिन इसके पीछे की वजह चौंकाने वाली है.
RHD Reason: दुनिया के ज्यादातर देशों में गाड़ियां बाईं तरफ से चलती हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि करीब 75 देश ऐसे हैं जहां भारत की तरह राइट-हैंड-ड्राइव गाड़ियां दौड़ती हैं? जिसे हम रोजमर्रा की सामान्य व्यवस्था मानते हैं, वही भारत के लिए आज एक बड़ी वैश्विक ताकत बन चुकी है. राइट-हैंड-ड्राइव सिस्टम न सिर्फ भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर से पूरी तरह मेल खाता है, बल्कि ऑटोमोबाइल एक्सपोर्ट में भी देश को सीधा फायदा दिला रहा है.
क्या है राइट-हैंड-ड्राइव सिस्टम
राइट-हैंड-ड्राइव यानी RHD सिस्टम में गाड़ी का स्टीयरिंग दाईं ओर होता है और ट्रैफिक सड़क के बाईं तरफ चलता है. दुनिया की लगभग 30 प्रतिशत आबादी इसी सिस्टम के तहत सफर करती है. भारत के अलावा यूनाइटेड किंगडम, जापान, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, दक्षिण अफ्रीका और पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल व श्रीलंका जैसे कई देश इस व्यवस्था को अपनाते हैं.
भारत में RHD की शुरुआत
भारत में राइट-हैंड-ड्राइव व्यवस्था की नींव ब्रिटिश शासन के दौरान पड़ी. 19वीं सदी के आखिर में जब देश में मोटर वाहन आए, तब ब्रिटेन में पहले से ही बाईं ओर चलने की परंपरा थी. यह परंपरा मध्यकालीन यूरोप से जुड़ी थी, जहां घुड़सवार सुरक्षा के लिहाज से बाईं ओर चलते थे ताकि दायां हाथ हथियार के लिए खाली रहे.
औपनिवेशिक दौर से मॉर्डन व्यवस्था तक
ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार के साथ यही ट्रैफिक सिस्टम उसके उपनिवेशों में भी लागू हुआ. भारत में सड़क डिजाइन, ट्रैफिक नियम और वाहनों की बनावट उसी ढांचे पर तैयार हुई. आजादी से पहले ही यह व्यवस्था देश की परिवहन प्रणाली में इतनी गहराई से जुड़ चुकी थी कि इसे बदलना आसान नहीं था.
आजादी के बाद सिस्टम क्यों नहीं बदला
1947 में स्वतंत्रता के बाद भारत के पास विकल्प था कि वह अमेरिका और यूरोप की तरह लेफ्ट-हैंड-ड्राइव सिस्टम अपना सकता है. लेकिन सरकार ने मौजूदा व्यवस्था को ही जारी रखने का फैसला किया. वजह साफ थी देश की सड़कें, नियम, ड्राइवर ट्रेनिंग और वाहन उत्पादन पहले से RHD के मुताबिक ढले हुए थे. पूरे सिस्टम को बदलना महंगा, जटिल और जोखिम भरा होता.
Photo-Freepik
सड़क सुरक्षा और निरंतरता का फैसला
अगर सिस्टम बदला जाता तो आम लोगों को दोबारा ट्रेनिंग देनी पड़ती और सड़क दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ सकता था. ऐसे में निरंतरता बनाए रखना ज्यादा सुरक्षित और व्यावहारिक विकल्प माना गया. यही फैसला आगे चलकर भारत के लिए फायदेमंद साबित हुआ.
ऑटो उद्योग में भारत की रणनीतिक बढ़त
समय के साथ भारत का यही निर्णय उसकी औद्योगिक ताकत बन गया. आज भारत राइट-हैंड-ड्राइव वाहनों के सबसे बड़े मैन्युफैक्चरिंग हब्स में गिना जाता है. चूंकि करीब 75 देश RHD वाहनों की मांग करते हैं, भारत इन बाजारों के लिए एक भरोसेमंद उत्पादन केंद्र बन चुका है.
एक ही स्टैंडर्ड से आसान एक्सपोर्ट
भारतीय और विदेशी ऑटो कंपनियां भारत से यूके, ऑस्ट्रेलिया, जापान, दक्षिण अफ्रीका और कई एशियाई व अफ्रीकी देशों में गाड़ियां निर्यात करती हैं. एक ही स्टीयरिंग स्टैंडर्ड पर काम करने से डिजाइन सरल रहता है, उत्पादन तेज होता है और लागत भी कम होती है.
कम लागत, ज्यादा प्रतिस्पर्धा
RHD आधारित इकोसिस्टम में कंपनियों को बार-बार स्टीयरिंग लेआउट या डैशबोर्ड बदलने की जरूरत नहीं पड़ती. इससे मैन्युफैक्चरिंग खर्च घटता है और भारतीय वाहन अंतरराष्ट्रीय बाजार में किफायती दाम पर उपलब्ध हो पाते हैं. इसके साथ ही भारत में RHD-केंद्रित कुशल वर्कफोर्स और मजबूत सप्लायर नेटवर्क भी तैयार हो चुका है.
जो व्यवस्था कभी औपनिवेशिक मजबूरी के तौर पर शुरू हुई थी, वही आज भारत की ऑटोमोबाइल रणनीति की मजबूत नींव बन गई है. राइट-हैंड-ड्राइव सिस्टम भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ स्वाभाविक रूप से फिट बैठता है और सड़क सुरक्षा के साथ-साथ वैश्विक ऑटो एक्सपोर्ट में देश को साफ बढ़त दिलाता है.
RHD Reason: दुनिया के ज्यादातर देशों में गाड़ियां बाईं तरफ से चलती हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि करीब 75 देश ऐसे हैं जहां भारत की तरह राइट-हैंड-ड्राइव गाड़ियां दौड़ती हैं? जिसे हम रोजमर्रा की सामान्य व्यवस्था मानते हैं, वही भारत के लिए आज एक बड़ी वैश्विक ताकत बन चुकी है. राइट-हैंड-ड्राइव सिस्टम न सिर्फ भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर से पूरी तरह मेल खाता है, बल्कि ऑटोमोबाइल एक्सपोर्ट में भी देश को सीधा फायदा दिला रहा है.
क्या है राइट-हैंड-ड्राइव सिस्टम
राइट-हैंड-ड्राइव यानी RHD सिस्टम में गाड़ी का स्टीयरिंग दाईं ओर होता है और ट्रैफिक सड़क के बाईं तरफ चलता है. दुनिया की लगभग 30 प्रतिशत आबादी इसी सिस्टम के तहत सफर करती है. भारत के अलावा यूनाइटेड किंगडम, जापान, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, दक्षिण अफ्रीका और पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल व श्रीलंका जैसे कई देश इस व्यवस्था को अपनाते हैं.
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भारत में RHD की शुरुआत
भारत में राइट-हैंड-ड्राइव व्यवस्था की नींव ब्रिटिश शासन के दौरान पड़ी. 19वीं सदी के आखिर में जब देश में मोटर वाहन आए, तब ब्रिटेन में पहले से ही बाईं ओर चलने की परंपरा थी. यह परंपरा मध्यकालीन यूरोप से जुड़ी थी, जहां घुड़सवार सुरक्षा के लिहाज से बाईं ओर चलते थे ताकि दायां हाथ हथियार के लिए खाली रहे.
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औपनिवेशिक दौर से मॉर्डन व्यवस्था तक
ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार के साथ यही ट्रैफिक सिस्टम उसके उपनिवेशों में भी लागू हुआ. भारत में सड़क डिजाइन, ट्रैफिक नियम और वाहनों की बनावट उसी ढांचे पर तैयार हुई. आजादी से पहले ही यह व्यवस्था देश की परिवहन प्रणाली में इतनी गहराई से जुड़ चुकी थी कि इसे बदलना आसान नहीं था.
आजादी के बाद सिस्टम क्यों नहीं बदला
1947 में स्वतंत्रता के बाद भारत के पास विकल्प था कि वह अमेरिका और यूरोप की तरह लेफ्ट-हैंड-ड्राइव सिस्टम अपना सकता है. लेकिन सरकार ने मौजूदा व्यवस्था को ही जारी रखने का फैसला किया. वजह साफ थी देश की सड़कें, नियम, ड्राइवर ट्रेनिंग और वाहन उत्पादन पहले से RHD के मुताबिक ढले हुए थे. पूरे सिस्टम को बदलना महंगा, जटिल और जोखिम भरा होता.
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सड़क सुरक्षा और निरंतरता का फैसला
अगर सिस्टम बदला जाता तो आम लोगों को दोबारा ट्रेनिंग देनी पड़ती और सड़क दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ सकता था. ऐसे में निरंतरता बनाए रखना ज्यादा सुरक्षित और व्यावहारिक विकल्प माना गया. यही फैसला आगे चलकर भारत के लिए फायदेमंद साबित हुआ.
ऑटो उद्योग में भारत की रणनीतिक बढ़त
समय के साथ भारत का यही निर्णय उसकी औद्योगिक ताकत बन गया. आज भारत राइट-हैंड-ड्राइव वाहनों के सबसे बड़े मैन्युफैक्चरिंग हब्स में गिना जाता है. चूंकि करीब 75 देश RHD वाहनों की मांग करते हैं, भारत इन बाजारों के लिए एक भरोसेमंद उत्पादन केंद्र बन चुका है.
एक ही स्टैंडर्ड से आसान एक्सपोर्ट
भारतीय और विदेशी ऑटो कंपनियां भारत से यूके, ऑस्ट्रेलिया, जापान, दक्षिण अफ्रीका और कई एशियाई व अफ्रीकी देशों में गाड़ियां निर्यात करती हैं. एक ही स्टीयरिंग स्टैंडर्ड पर काम करने से डिजाइन सरल रहता है, उत्पादन तेज होता है और लागत भी कम होती है.
कम लागत, ज्यादा प्रतिस्पर्धा
RHD आधारित इकोसिस्टम में कंपनियों को बार-बार स्टीयरिंग लेआउट या डैशबोर्ड बदलने की जरूरत नहीं पड़ती. इससे मैन्युफैक्चरिंग खर्च घटता है और भारतीय वाहन अंतरराष्ट्रीय बाजार में किफायती दाम पर उपलब्ध हो पाते हैं. इसके साथ ही भारत में RHD-केंद्रित कुशल वर्कफोर्स और मजबूत सप्लायर नेटवर्क भी तैयार हो चुका है.
जो व्यवस्था कभी औपनिवेशिक मजबूरी के तौर पर शुरू हुई थी, वही आज भारत की ऑटोमोबाइल रणनीति की मजबूत नींव बन गई है. राइट-हैंड-ड्राइव सिस्टम भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ स्वाभाविक रूप से फिट बैठता है और सड़क सुरक्षा के साथ-साथ वैश्विक ऑटो एक्सपोर्ट में देश को साफ बढ़त दिलाता है.