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तालिबान का नया ‘क्रूर’ कानून… अफगान समाज को 4 कैटेगरी में बांटा, मुल्लाओं को मिला क्राइम करने का ‘लाइसेंस’?

तालिबान ने अफगानिस्तान में नया कानून लागू कर समाज को चार श्रेणियों में बांट दिया है. अब अपराध करने पर मौलवियों को केवल 'नसीहत' मिलेगी, जबकि गरीबों को जेल और कोड़ों की सजा दी जाएगी.

Author Written By: Raja Alam Updated: Jan 27, 2026 17:14

तालिबान ने अफगानिस्तान में एक नया ‘क्रिमिनल प्रोसीजर कोड’ लागू किया है जिसने पूरी दुनिया को हैरान कर दिया है. इस नए कानून के तहत अफगान समाज को चार अलग-अलग श्रेणियों में बांट दिया गया है जिसमें सबसे ऊपर धार्मिक विद्वानों यानी मौलवियों को रखा गया है. मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि यह कानून समानता के अधिकार को पूरी तरह खत्म करता है और देश को मध्यकाल से भी बदतर स्थिति में ले जा रहा है. तालिबान के सर्वोच्च नेता हिबतुल्लाह अखुंदजादा द्वारा मंजूर किए गए इस 119 लेखों वाले दस्तावेज ने न्याय प्रणाली को पूरी तरह से कट्टरपंथी रंग में रंग दिया है.

मौलवियों को माफी और गरीबों को कोड़े!

नए कानून की सबसे चौंकाने वाली बात सजा देने का तरीका है जो अपराध के बजाय अपराधी की हैसियत पर निर्भर करेगा. कानून के मुताबिक अगर कोई धार्मिक विद्वान (मौलवी) अपराध करता है तो उसे केवल ‘नसीहत’ देकर छोड़ दिया जाएगा. वहीं दूसरी श्रेणी के ‘अभिजात वर्ग’ को केवल समन और सलाह दी जाएगी. इसके विपरीत मध्यम वर्ग के लोगों को जेल की सजा काटनी होगी और सबसे निचली श्रेणी के गरीब लोगों को जेल के साथ-साथ कोड़े मारने जैसी शारीरिक प्रताड़ना भी झेलनी होगी. यह भेदभावपूर्ण ढांचा साफ तौर पर बताता है कि तालिबान की नजर में हर नागरिक बराबर नहीं है.

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यह भी पढ़ें: बांग्लादेश में हिंदुओं के हत्यारों को नहीं मिलेगी कोई सजा? यूनुस सरकार ने प्रदर्शनकारियों को दी कानूनी सुरक्षा

गुलामी और घरेलू हिंसा को कानूनी कवच

तालिबान के इस नए कोड में ‘गुलामी’ यानी ‘गुलामी प्रथा’ को फिर से कानूनी मान्यता दे दी गई है. कानून में ‘गुलाम’ शब्द का इस्तेमाल एक कानूनी वर्ग के रूप में किया गया है जो अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारों का खुला उल्लंघन है. इसके अलावा अब ‘मालिकों’ और ‘पतियों’ को अपने गुलामों या पत्नियों को सजा देने का अधिकार भी मिल गया है. जानकारों का मानना है कि इससे महिलाओं और बच्चों के खिलाफ होने वाली घरेलू हिंसा को कानूनी संरक्षण मिल जाएगा. तालिबान ने पहले ही महिलाओं की शिक्षा और उनके द्वारा लिखी गई किताबों पर पाबंदी लगा रखी है और अब यह नया कानून उनकी स्थिति को और भी ज्यादा दयनीय बना देगा.

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अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तीखा विरोध

दुनियाभर के मानवाधिकार संगठनों और पूर्व अफगान अधिकारियों ने इस कानून को मानवता के खिलाफ अपराध बताया है. संयुक्त राष्ट्र के विशेष दूत रिचर्ड बेनेट ने इसे ‘गहरा चिंताजनक’ बताया है और इसकी समीक्षा शुरू कर दी है. पूर्व अटार्नी जनरल मोहम्मद फरीद हमीदी का कहना है कि यह दस्तावेज सभी नागरिकों को अपराधी करार देने और उनकी गरिमा को चोट पहुंचाने जैसा है. दिसंबर 2025 में एक सार्वजनिक फांसी के बाद अब इस कानून का आना यह संकेत देता है कि तालिबान अपनी क्रूर नीतियों को कानूनी जामा पहनाकर डर का शासन और मजबूत करना चाहता है.

First published on: Jan 27, 2026 05:14 PM

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