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कयामत के करीब पहुंची दुनिया! बचे सिर्फ 85 सेकंड, जानें क्या है ‘डूम्सडे क्लॉक’ का खौफनाक सच

दुनिया के विनाश की प्रतीक 'डूम्सडे क्लॉक' के समय ने पूरी मानवता की चिंता बढ़ा दी है. आइए जानते हैं क्या है यह रहस्यमयी घड़ी और क्यों इसकी सुइयां कयामत के करीब पहुंच गई हैं.

Author Written By: Raja Alam Updated: Jan 29, 2026 23:01

एटॉमिक साइंटिस्ट्स ने ‘डूम्सडे क्लॉक’ के समय को अपडेट करते हुए दुनिया की धड़कनें बढ़ा दी हैं. 27 जनवरी 2026 को इस घड़ी को रात के 12 बजने से महज 85 सेकंड पहले सेट किया गया है, जो अब तक का सबसे डरावना स्तर है. इस घड़ी में 12 बजने का प्रतीकात्मक मतलब पूरी मानवता का अंत और महाप्रलय है. वैज्ञानिकों का कहना है कि परमाणु हथियारों की होड़, जलवायु परिवर्तन और एआई (AI) के बढ़ते खतरों की वजह से दुनिया अब तबाही के मुहाने पर खड़ी है. शक्तिशाली देशों के बीच बढ़ता टकराव और आपसी समझ का खत्म होना हमें विनाश की ओर धकेल रहा है.

कैसे काम करती है डूम्सडे घड़ी?

डूम्सडे क्लॉक कोई आम घड़ी नहीं है जो समय बताए, बल्कि यह एक चेतावनी देने वाला टाइमर है. इसे 1945 में मशहूर वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन और रॉबर्ट ओपनहाइमर ने मिलकर बनाया था ताकि दुनिया को परमाणु खतरों से आगाह किया जा सके. यह घड़ी ‘टाइमर’ की तरह उलटी चलती है और इसकी सुइयों का 12 बजे की ओर बढ़ना इस बात का संकेत है कि मानवता के लिए खतरा बढ़ गया है. अगर सुइयां पीछे की ओर खिसकती हैं, तो माना जाता है कि दुनिया पहले के मुकाबले थोड़ी सुरक्षित हुई है. साल 1947 में जब यह बनी थी, तब प्रलय में 7 मिनट बाकी थे.

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कितनी बार बदला जा चुका है ‘डूम्सडे क्लॉक’ का समय?

इतिहास पर नजर डालें तो डूम्सडे क्लॉक में अब तक 25 बार समय बदला जा चुका है. 1991 में जब शीत युद्ध खत्म हुआ था, तब दुनिया सबसे सुरक्षित महसूस कर रही थी और घड़ी में 17 मिनट का समय बाकी था. भारत के 1974 और 1998 के परमाणु परीक्षणों के बाद भी इस घड़ी की सुइयां आगे बढ़ाई गई थीं. साल 2020 के बाद से हालात इतने बिगड़ गए कि वैज्ञानिकों को समय मिनटों के बजाय सेकंडों में गिनना पड़ रहा है. यूक्रेन युद्ध और वैश्विक तनाव के कारण 2023 में यह 90 सेकंड पर थी, जो अब सिमटकर सिर्फ 85 सेकंड रह गई है.

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दुनिया को सुधारने की आखिरी चेतावनी

डूम्सडे क्लॉक का असली मकसद लोगों को डराना नहीं, बल्कि सरकारों और नीति निर्माताओं को यह बताना है कि वे गलत रास्ते पर हैं. शुरुआत में यह सिर्फ परमाणु बमों के खतरे पर आधारित थी, लेकिन 2007 से इसमें जलवायु परिवर्तन और बाद में साइबर हमलों व बायोटेक खतरों को भी शामिल किया गया. हर साल जनवरी में वैज्ञानिक ग्लोबल रिस्क रिपोर्ट जारी करते हुए समय का निर्धारण करते हैं. आज 85 सेकंड का समय यह चिल्ला-चिल्लाकर कह रहा है कि अगर अब भी परमाणु संयम और पर्यावरण रक्षा पर ध्यान नहीं दिया गया, तो कयामत को रोकना नामुमकिन होगा.

First published on: Jan 29, 2026 11:01 PM

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