गुरूवार, 11 जून की तारीख बेहद नज़दीक है. दुनिया के कोने-कोने में फुटबॉल को चाहने वालों की धड़कनें तेज़ हो रही हैं. अमेरिका में फीफा वर्ल्ड कप या कहूं कि खेलों की दुनिया का एक ऐसा महाकुंभ शुरू होने जा रहा है, जिसकी दीवानगी के आगे हर पैमाना छोटा पड़ जाएगा. जहां दुनिया की टॉप 48 टीमें, 39 दिनों के रोमांच में उस सफर से गुज़रेंगी जो किसी को अर्श पर बिठाएगा तो किसी को आंसुओं के समंदर में डुबो देगा.
जश्न और उन्माद के इस सैलाब को अनुभव करने के लिए दुनिया भर से लाखों फैंस पहुंचेंगे, भारत से भी इस दीवानगी का गवाह बनने के लिए हज़ारों फैंस के पहुंचने की उम्मीद है. लेकिन इस पूरे उत्सव के बीच अगर हम अपने चारों ओर देखें, तो एक अजीब सी खामोशी और टीस महसूस होती है. वजह साफ है, इस 104 मैचों की फेहरिस्त में ‘भारत’ के नाम का कोई पन्ना नहीं है. 145 करोड़ की आबादी और 4.15 ट्रिलियन डॉलर की वैश्विक अर्थव्यवस्था वाला हमारा देश, दुनिया के सबसे बड़े खेल मंच पर महज़ एक दर्शक बनकर ताली बजाएगा.
मेसी के लिए दीवानगी, अपनों से बेरुखी क्यों?
हमारे देश की त्रासदी तो देखिए, यहां जब लियोनेल मेसी मैदान पर उतरते हैं, तो कोलकाता से लेकर दिल्ली और मुंबई से लेकर हैदराबाद तक फैंस की रातों की नींद उड़ जाती है. फीफा वर्ल्ड कप के दौरान अर्जेंटीना और ब्राज़ील के झंडे हमारी छतों पर लहराने लगते हैं. लेकिन अगर आज देश की राजधानी दिल्ली के सबसे व्यस्त बाज़ार में खड़े होकर भी लोगों से पूछ लिया जाए कि भारतीय फुटबॉल टीम के किन्हीं 5 खिलाड़ियों के नाम बता दीजिए, तो सन्नाटा पसर जाएगा. गिने-चुने लोग भी शायद ही नाम बता पाएं.
हम दूसरे देशों के नायकों की इबादत में इस कदर मसरूफ हैं कि अपनी ही मिट्टी के हुनर को पहचानना भूल गए. आज 3 जून 2026 है, जिन्हें नहीं मालूम उन्हें बता दूं कि फीफा की 211 राष्ट्रीय टीमों की आधिकारिक रैंकिंग लिस्ट को जब हम खोलते हैं, तो दिल बैठ जाता है. यहां भारतीय पुरुष फुटबॉल टीम 137वें पायदान पर खड़ी है. एक ऐसा देश जो 2030 के कॉमनवेल्थ गेम्स की मेज़बानी की तैयारी कर रहा है, जिसकी आँखें 2036 के ओलंपिक की मेज़बानी के हसीन सपने बुन रही हैं, वह फुटबॉल के नक्शे पर इतना पीछे क्यों है?
वर्ल्ड कप के सूनेपन में शर्मिंदगी क्यों नहीं?
अभी हाल ही में जब यह खबर आई कि भारत में फीफा वर्ल्ड कप के प्रसारण के लिए कोई सही ब्रॉडकास्टर नहीं मिल पा रहा है. स्टार से लेकर सोनी और फिर दूरदर्शन ने भी अपने हाथ पीछे खींच लिए हैं, तो देश के करोड़ों फुटबॉल फैंस की आंखों में मायूसी तैर गई. हर कोई इंटरनेट पर, सोशल मीडिया पर विकल्प तलाशने लगा कि मैच कहां देखें. गनीमत है कि ज़ी स्पोर्ट्स ने ये करार खरीद लिए और ये ब्लैकआउट टल गया. लेकिन हैरान करने और दिल को दुखाने वाली बात यह है कि भारतीय टीम कभी वर्ल्ड कप नहीं खेल पाई, इस बात को लेकर समाज में क्यों कोई सामूहिक मायूसी या गुस्सा नहीं दिखता ? हम इस बात से तो परेशान हैं कि टीवी पर मैच कैसे दिखेगा, पर इस बात से बेफ़िक्र हैं कि हमारी जर्सी मैदान पर क्यों नहीं दिखेगी?
1950 में भारत की मुट्ठी में था ‘इतिहास’
भारत की युवा पीढ़ी, आईपीएल के चौके-छक्कों की चकाचौंध में बड़ी हो रही है. उसके लिए विराट कोहली और वैभव सूर्यवंशी जैसे सितारों की चर्चा में शामिल होना आम बात है. लेकिन उसे शायद ही मालूम होगा कि इतिहास ने कभी भारत का भी दरवाज़ा खटखटाया था. आज से करीब 76 साल पहले, दूसरा विश्व युद्ध झेलने के बाद दुनिया 12 साल के लंबे इंतज़ार के बाद साल 1950 में ब्राजील में फुटबॉल का जश्न मनाने जा रही थी. सिर्फ 33 देशों ने क्वालिफाइंग राउंड में दिलचस्पी दिखाई थी. तब भारत को ग्रुप में बर्मा और फिलीपींस के साथ रखा गया था.
किस्मत देखिए, उन दोनों देशों ने अपने नाम वापस ले लिए और भारत बिना एक भी मैच खेले सीधे फीफा वर्ल्ड कप के लिए क्वालिफाई कर गया था. वह पल भारत को फुटबॉल की महाशक्ति बनाने का लांचपैड हो सकता था. लेकिन भारत में फुटबॉल की सुप्रीम बॉडी एआईएफएफ ने टीम को ब्राजील नहीं भेजा. बाद में तर्क दिए गए कि टीम चयन में असहमति थी और अभ्यास का समय नहीं था. इतिहास गवाह है कि वह कोई साधारण चूक नहीं थी, वह भारतीय खेल इतिहास की सबसे बड़ी भूल थी. जिसने आने वाली पीढ़ियों को एक गहरे मलाल के साए में जीने के लिए छोड़ दिया.
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मैदान पर फिसड्डी, कोर्ट में उलझा फुटबॉल
वैसे एक सच्चाई ये भी है कि मौजूदा वक्त में तो हमारी हालत वर्ल्ड कप में ताली बजाने लायक भी नहीं बची. वर्ल्ड कप 2026 क्वालिफायर के दूसरे राउंड में अफगानिस्तान जैसी टीम से घर में 1-2 से हारकर हमारा सफर खत्म हो गया था. इससे पहले एशिया कप 2023 में ग्रुप स्टेज में तीनों मैच हारकर हम बिना एक भी गोल किए बाहर हो गए थे. दुखद ये है कि समस्या सिर्फ मैदान पर नहीं है.
देश में फुटबॉल को नई दिशा और रफ्तार देने की बड़ी उम्मीद हमारी घरेलू लीग ISL भी कानूनी पचड़ों में फंसी है. लीग का ढांचा, प्रमोशन-रेलेगेशन का झगड़ा और क्लबों की आर्थिक हालत, सब कुछ अधर में है. लीग के मास्टर राइट्स एग्रीमेंट को लेकर सुप्रीम कोर्ट में लड़ाई चल रही है. अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि जब देश की टॉप लीग ही कोर्ट-कचहरी के चक्कर काट रही हो, तो वर्ल्ड कप का सपना कैसे पूरा होगा?
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कब जागेगा 145 करोड़ का गौरव?
ऐसा नहीं है कि हमारे पास प्रतिभा नहीं थी. फरवरी 1996 में वो दौर भी आया था जब भारत के दिग्गज कप्तान बाइचुंग भूटिया के नेतृत्व में भारतीय फुटबॉल टीम ने अपनी ऑलटाइम बेस्ट 94वीं फीफा रैंकिंग हासिल की थी. उस दौर ने दिखाया था कि अगर सही दिशा मिलती तो हम भी आगे बढ़ सकते थे. लेकिन हम वहीं ठहर गए, और दुनिया हमसे कोसों आगे निकल गई. मेरा ये लेख कोई आलोचना नहीं, बल्कि सिर्फ एक दर्द का इज़हार है. जब हम अपनी आर्थिक ताकत का लोहा पूरी दुनिया में मनवा रहे हैं, जब हमारे स्टार्टअप्स और हमारी तकनीक का डंका बज रहा है, तो फिर फुटबॉल के मैदान पर हमारे पैर क्यों डगमगा रहे हैं? क्या हम सिर्फ क्रिकेट के दीवाने बनकर ही संतुष्ट रहेंगे?
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आगामी फीफा वर्ल्ड कप की चमचमाती ट्रॉफी और हरे मैदान हमें फिर चिढ़ाएंगे. लेकिन उम्मीद की एक हल्की लौ हमेशा जलती रहनी चाहिए. हमें एक ऐसा तंत्र बनाना होगा जहां गलियों और गांवों से उठने वाले पैरों को सही मैदान मिल सकें. जिससे आने वाले समय में, जब फीफा वर्ल्ड कप का बिगुल फूंके, तो 145 करोड़ भारतीय सिर्फ टीवी स्क्रीन के सामने बैठकर दूसरों के लिए न चिल्लाएं. तब हर भारतीय गर्व से सीना चौड़ा करके कहें- ‘देखो, वो नीली जर्सी में हमारी टीम आ रही है, वो भारत की टीम है!’
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