Team India: भारतीय क्रिकेट में इन दिनों एक अजीब सी बैचेनी है. एक तरफ वर्ल्ड क्रिकेट में हमारा रुतबा ऐसा है कि बीसीसीआई के बिना कोई पत्ता भी नहीं हिलता. लेकिन दूसरी तरफ हमारी ही टीम के खिलाड़ी फिटनेस के मोर्चे पर बुरी तरह संघर्ष करते नजर आ रहे हैं. साल 2026 में आयरलैंड और इंग्लैंड दौरे पर टीम इंडिया के खराब प्रदर्शन ने मैनेजमेंट को सोचने पर मजबूर कर दिया.

नतीजा अब ये है कि बीसीसीआई ने फिटनेस पैरामीटर्स को इतना चैलेंजिंग बना दिया है कि खिलाड़ियों के पसीने छूटने तय हैं. ताज़ा मीडिया रिपोर्ट्स में सामने आए नए नियमों के मुताबिक अब ब्रोंको टेस्ट का समय 6 मिनट से घटाकर 5.15 से 5.20 मिनट कर दिया गया है. सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि इसके तुरंत बाद खिलाड़ियों को 9 से 10 मिनट के अंदर 2 किलोमीटर की दौड़ भी पूरी करनी होगी.

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मैनेजमेंट की जल्दबाजी और खिलाड़ियों से खिलवाड़!

आम नज़रिए से देखा जाए तो इस फैसले में गलत कुछ भी नहीं दिखता. अलबत्ता बीसीसीआई का ये फैसला खिलाड़ियों की फिटनेस को और दुरूस्त करने की ओर सही कदम भी माना जा सकता है. लेकिन एक सच्चाई ये है कि इस रिपोर्ट को पढ़ने के बाद एक खेल पत्रकार के तौर पर मुझे थोड़ी निराशा भी हुई है. आप ही सोचिए.. इंग्लैंड दौरे पर भेजे गए हर्षित राणा को सिर्फ इसलिए वापस भेज दिया गया क्योंकि उनका वजन 97 किलो था.

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दूसरी तरफ ऐसी भी रिपोर्ट्स हैं कि हर्षित राणा के अलावा नीतीश कुमार रेड्डी जैसे खिलाड़ियों को पूरी तरह फिट ना होने के बावजूद बीसीसीआई की सेंटर ऑफ एक्सिलेंस ने क्लियरेंस सर्टिफिकेट दे दिया था. खास बात ये है कि मीडिया में आ रही रिपोर्ट ऐसा दावा कर रही हैं कि ऐसा टीम मैनेजमेंट की मांग पर किया गया. मेरी राय में यह एक बहुत बड़ा सवाल है. जब कोई खिलाड़ी पूरी तरह से फिट ही नहीं है या उसे सही पैमानों पर परखा नहीं गया है, तो उसे खिलाने की ये जल्दबाजी किस रणनीति का हिस्सा है?

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कोच गंभीर और चीफ सिलेक्टर से जवाबदेही क्यों नहीं?

यहां सबसे बड़ा सवाल टीम इंडिया के हेड कोच गौतम गंभीर और चीफ सिलेक्टर की सोच पर उठता है. अगर आप एक अधूरी फिटनेस वाले खिलाड़ी को टीम में चुन लेते हैं और मैदान पर वो उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर पाता तो इसका जिम्मेदार कौन है? अगर जल्दबाजी में शामिल किया गया खिलाड़ी प्लेइंग-11 में खेलने के लिए उपलब्ध ही नहीं है, तो इसके लिए क्या महज़ बीसीसीआई का फिटनेस नियम सख्त कर देना काफी है?

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मेरी राय में जो सिलेक्टर्स ऐसी टीम चुनते हैं या जो कप्तान और कोच किसी अनफिट खिलाड़ी की मांग करते हैं, उनसे भी कड़े सवाल पूछे जाने चाहिए. आपकी जिद की वजह से अगर टीम इंडिया हारती है, तो जवाबदेही भी आपको ही लेनी होगी. महज़ भविष्य में ऐसा ना हो इसलिए कुछ नियमों को सख्त बना देना अधूरा फैसला नहीं तो और क्या है.

रोहित-विराट के लिए भी होंगे यही पैमाने?

अब एक और बेहद अहम पहलू पर बात करते हैं. भारतीय टीम में आज कई ऐसे बड़े नाम हैं जिनकी उम्र 36 साल के पार जा चुकी है. विराट कोहली, रोहित शर्मा और रवींद्र जडेजा जैसे दिग्गज अलग-अलग फॉर्मेट में हमारी टीम की जान या फैंस के फेवरेट हैं. लेकिन क्या ब्रोंको और यो-यो टेस्ट के ये नए और सख्त पैमाने इन सीनियर्स के लिए भी सिलेक्शन की शर्त होंगे? बीसीसीआई ने टीम के फिजियो कमलेश जैन को साफ निर्देश दिए हैं कि स्टार स्टेटस की परवाह किए बिना फिटनेस रिपोर्ट दी जाए. लेकिन क्या असलियत में ऐसा होता है? बुमराह जैसे मैच विनर को श्रीलंका टेस्ट सीरीज तक फिट करने का वादा किया गया था लेकिन ऐसा नहीं हुआ. विराट कोहली की फिटनेस एक मिसाल है, रोहित और जडेजा भी अपनी फिटनेस पर लगातार मेहनत कर रहे हैं. लेकिन अगर सिलेक्शन के पैमाने पर पहली शर्त ही फिटनेस टेस्ट होगी तो कौन जाने कब क्या हो जाए?

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ओवर ट्रेनिंग से बर्नआउट की ज़िम्मेदारी किसकी?

क्रिकेट को आंकड़ों का खेल कहा जाता है इसीलिए यहां कुछ दिलचस्प आंकड़े आपके सामने रखता हूं. साल 2026 में टीम इंडिया के खिलाड़ियों की इंजरी की लिस्ट डराने वाली है. ऋषभ पंत से लेकर वाशिंगटन सुंदर, तिलक वर्मा, वरुण चक्रवर्ती और खुद जसप्रीत बुमराह जैसे खिलाड़ी लगातार चोटिल हुए हैं. हमने देखा कि इंग्लैंड के कमोवेश अनुकूल मौसम में भी खिलाड़ियों को क्रैम्प्स जैसी दिक्कतें आ रही थीं. मुझे याद है कि गौतम गंभीर के हेड कोच बनने से पहले के 3 साल यानी 2023 से 2025 के बीच भी टीम इंडिया के कई खिलाड़ी चोटिल हुए थे. लेकिन इसके बावजूद टीम में खिलाड़ियों का इंजरी मैनेजमेंट शानदार था. खिलाड़ियों के वर्कलोड को बेहतरीन तरीके से संभाला गया था.

टीम इंडिया भी टेस्ट से लेकर वन-डे और T20I तीनों फॉर्मेट में लगातार अच्छा कर रही थी. सभी तीन या दो फॉर्मेट खेलने वाले खिलाड़ियों के लिए तो ठीक है. लेकिन असली डर ये है कि अगर सिर्फ एक फॉर्मेट के लिए चुने जाने वाले खिलाड़ियों जैसे रोहित-विराट को हर टीम सिलेक्शन से पहले फिटनेस टेस्ट से गुज़रना होगा तो बात बिगड़ सकती है. मुमकिन है कि खिलाड़ी शारीरिक और मानसिक रूप से थक सकते हैं. इससे आने वाले समय में चोट का खतरा और भी ज्यादा बढ़ सकता है.

एशियन गेम्स और वर्ल्ड कप से पहले संभलना जरूरी

आने वाले 2 साल हमारे लिए बेहद अहम हैं. साल 2026 में ही अभी श्रीलंका दौरे के बाद एशियन गेम्स, न्यूज़ीलैंड दौरा बड़ी सीरीज़ रहेंगी. फिर अगले साल 2027 में ऑस्ट्रेलिया से होने वाली बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी के अलावा आईसीसी इवेंट्स भी हमारे सामने हैं. मेरा व्यक्तिगत रूप से मानना है कि अगर हम अपने खिलाड़ियों को मशीन समझकर उन्हें ओवर-ट्रेन करेंगे तो हम बड़े टूर्नामेंट्स में बिना हथियारों के लड़ने जाएंगे.

फिटनेस किसी भी खेल की पहली और सबसे जरूरी शर्त है. लेकिन सिस्टम को सुधारने के नाम पर सिर्फ नियम कड़े कर देना नाकाफी है. बीसीसीआई को खिलाड़ियों की फिटनेस के साथ-साथ कोच, चीफ सिलेक्टर और टीम मैनेजमेंट की खराब प्रदर्शन पर भी जवाबदेही तय करनी चाहिए. महज़ 10 मिनट में 2 किलोमीटर दौड़ने का फरमान हमें चैंपियन नहीं बनाएगा. बदलाव की शुरुआत ड्रेसिंग रूम के लीडर्स और मैनेजमेंट की सोच से ही होनी चाहिए.

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