Science News in Hindi: वर्जीनिया टेक के एक जीवाश्म लैब में सालों से एक टूटी-फूटी और बेहद खराब हालत में पड़ी डायनासोर की खोपड़ी ने विज्ञान की दुनिया में हलचल मचा दी है. लंबे समय तक वैज्ञानिकों ने इस अवशेष को बेकार मानकर नजरअंदाज कर दिया था क्योंकि यह करोड़ों सालों के दबाव की वजह से पूरी तरह पिचक चुकी थी. हालांकि जियोसाइंस के छात्र सिंबा श्रीवास्तव ने इसे एक चुनौती के रूप में लिया और करीब दो साल की कड़ी मेहनत के बाद इसे डिजिटल रूप में दोबारा तैयार किया. इस खोपड़ी के विश्लेषण से पता चला कि यह मांस खाने वाले डायनासोर की एक बिल्कुल नई प्रजाति है, जो मशहूर टी-रेक्स (T. rex) से भी तीन गुना ज्यादा समय पहले धरती पर राज करती थी.
कौन है ट्रायसिक काल का खूंखार शिकारी?
वैज्ञानिकों ने इस नई प्रजाति को ‘टिकोथेरेट्स बुकुलेंटस’ (Ptychotherates bucculentus) नाम दिया है, जिसका लैटिन में मतलब ‘भरे हुए गालों वाला शिकारी’ होता है. अपनी अजीबोगरीब बनावट के कारण एक आर्टिस्ट ने इसे ‘मर्डर मपेट’ तक कह दिया है. यह जीव ट्रायसिक काल के अंत में पाया जाता था, जब डायनासोर अभी दुनिया पर हावी नहीं हुए थे और उन्हें शुरुआती मगरमच्छों के पूर्वजों से कड़ा मुकाबला करना पड़ता था. इस खोपड़ी की बनावट में उभरी हुई गाल की हड्डियां और एक गहरी थूथन देखी गई है, जो इशारा करती है कि उस दौर में भी डायनासोर खुद को अलग-अलग पारिस्थितिकी तंत्र के हिसाब से ढाल रहे थे.
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इतिहास की किताबों को बदलने वाली खोज
यह खोज इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह ‘हेरेरासौरिया’ (Herrerasauria) समूह से जुड़ी है, जिसे पहले काफी पहले ही विलुप्त मान लिया गया था. इस नए जीवाश्म से साबित होता है कि यह शिकारी प्रजाति अपनी अनुमानित उम्र से कहीं ज्यादा समय तक धरती पर बची रही. अमेरिका के दक्षिण-पश्चिमी हिस्से में मिले इस अवशेष से यह संकेत मिलता है कि यह क्षेत्र उन प्राचीन शिकारियों के लिए एक सुरक्षित ठिकाना रहा होगा, जब बाकी दुनिया से वे खत्म हो रहे थे. यह खोज दिखाती है कि कैसे आधुनिक सीटी स्कैन (CT Scan) तकनीक उन राजों को खोल सकती है जिन्हें पारंपरिक तरीकों से कभी नहीं जाना जा सकता था.
छात्र की मेहनत और विज्ञान का नया भविष्य
आमतौर पर इतने बड़े शोध का नेतृत्व अनुभवी वैज्ञानिक करते हैं, लेकिन वर्जीनिया टेक में इस पूरे प्रोजेक्ट की कमान एक अंडरग्रेजुएट छात्र सिंबा श्रीवास्तव को सौंपी गई थी. उनके मार्गदर्शक स्टर्लिंग नेस्बिट और मिशेल स्टॉकर ने उन्हें इस शोध को शुरू से अंत तक खुद पूरा करने के लिए प्रोत्साहित किया. ‘पेपर्स इन पेलियोन्टोलॉजी’ में छपी यह रिपोर्ट बताती है कि कैसे एक सिंगल जीवाश्म भी धरती के प्राचीन इतिहास को पूरी तरह से दोबारा लिखने की ताकत रखता है. अब वैज्ञानिक यह उम्मीद कर रहे हैं कि लैब में पड़े ऐसे ही कई और ‘बेकार’ जीवाश्म भविष्य में डायनासोर के विकास की नई कहानियाँ सुना सकते हैं.
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