महाराष्ट्र में मुंबई से करीब 100 किलोमीटर दूर रायगढ़ जिले के करजत इलाके में एक बड़े बिजली प्रोजेक्ट के लिए जंगल काटे जा रहे हैं. अब तक करीब 1,100 पेड़ काटे जा चुके हैं. हालांकि, गांववालों के विरोध के बाद फिलहाल पेड़ों की कटाई रोक दी गई है. वैज्ञानिकों का कहना है कि पश्चिमी घाट के जंगलों में इतनी बड़ी कटाई का असर दूर-दराज के इलाकों में बारिश पर भी पड़ सकता है. इसका असर तमिलनाडु तक देखने को मिल सकता है.
यहां टोरेंट पावर कंपनी 3,000 मेगावाट क्षमता का पंप्ड स्टोरेज हाइड्रोपावर प्लांट बना रही है. इस परियोजना पर करीब 13,505 करोड़ रुपये खर्च होंगे और इसे 2029 तक शुरू करने का लक्ष्य है. इसके लिए रायगढ़ के पश्चिमी घाट क्षेत्र में 377 हेक्टेयर जमीन की जरूरत है। इस इलाके में 32 हजार से ज्यादा पेड़ काटे जाने हैं.
जंगल पर निर्भर हैं करीब 150 आदिवासी परिवार
सैदोंगर पहाड़ी के आसपास छह छोटी बस्तियां हैं. यहां करीब 150 परिवार रहते हैं, जिनमें ज्यादातर कटकरी आदिवासी समुदाय के हैं. इन परिवारों की रोजी-रोटी लंबे समय से जंगल पर निर्भर है. गांव के लोग जंगल से लकड़ियां, शहद, महुआ, जामुन और अमरूद इकट्ठा करते हैं. लकड़ियां बेचकर उन्हें रोजाना करीब 150 से 200 रुपये की कमाई होती है. जंगल में मिलने वाली नीम, गिलोय और अडूसा जैसी जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल वे इलाज के लिए भी करते हैं. अब जंगल में जाने पर रोक लगने से इन परिवारों की कमाई पर असर पड़ रहा है. गांववालों का कहना है कि जंगल खत्म हुआ तो उनकी रोजी-रोटी और जीवन जीने का तरीका भी प्रभावित होगा.
मुआवजे का मामला भी उठा
वन अधिकार कानून, 2006 के तहत जंगल पर सदियों से निर्भर रहने वाले समुदाय अपने अधिकारों का दावा कर सकते हैं. इसके लिए ग्राम सभा को परिवारों और उनके जंगल पर निर्भर रहने से जुड़े रिकॉर्ड तैयार करने होते हैं. वन विभाग के अधिकारियों के मुताबिक, पाली गांव की ग्राम सभा ने ऐसे रिकॉर्ड और मुआवजे से जुड़ी सिफारिशें जमा नहीं की थीं. इसलिए विभाग के पास इन परिवारों के वन अधिकार और मुआवजे की प्रक्रिया आगे बढ़ाने के लिए जरूरी दस्तावेज नहीं थे.
परियोजना को मिली पर्यावरण मंजूरी में भी किसी परिवार के पुनर्वास की जरूरत नहीं बताई गई है. इसी वजह से करीब 150 परिवारों को जंगल तक पहुंच और उससे होने वाली कमाई खोने के बदले मुआवजा मिलने का मामला अटक गया है. वन विभाग के अनुसार, पेड़ों की कटाई फिलहाल कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए रोकी गई है. इसे दोबारा कब शुरू किया जाएगा, इस पर अभी फैसला नहीं हुआ है.
जंगल में तेंदुए और दूसरे वन्यजीव भी
यह इलाका पश्चिमी घाट का हिस्सा है. साल 2011 में माधव गाडगिल की अध्यक्षता वाली विशेषज्ञ समिति ने इस क्षेत्र के कुछ हिस्सों को सबसे ज्यादा पर्यावरण सुरक्षा वाले जोन यानी ESZ-1 में रखने की सिफारिश की थी. इस जोन में बड़े बांध और बड़े निर्माण कार्यों पर रोक लगाने की सलाह दी गई थी. हालांकि, ये सिफारिशें लागू नहीं हो सकीं. परियोजना की पर्यावरण रिपोर्ट में आसपास के बड़े इलाके की जांच में वन्यजीवों को बचाने वाले कानून के तहत सबसे सुरक्षित श्रेणी में शामिल 26 प्रजातियों का जिक्र है. इनमें तेंदुआ, स्लॉथ भालू, सांभर, जंगली बिल्ली, भारतीय भेड़िया, अजगर और कोबरा जैसे जीव शामिल हैं. हालांकि, रिपोर्ट यह नहीं बताती कि ये सभी प्रजातियां परियोजना के लिए तय 377 हेक्टेयर जमीन पर ही मौजूद हैं.
जंगल कटने से तमिलनाडु की बारिश पर असर क्यों?
वैज्ञानिकों के मुताबिक, पश्चिमी घाट के जंगल हवा में नमी पहुंचाने में अहम भूमिका निभाते हैं. पेड़ मिट्टी और अपने पत्तों से पानी को भाप के रूप में हवा में छोड़ते हैं. इस प्रक्रिया को वाष्पोत्सर्जन कहा जाता है. हवा इस नमी को दूर के इलाकों तक ले जाती है, जिससे वहां बारिश होने में मदद मिलती है. IIT बॉम्बे और CSIR के चार वैज्ञानिकों की 2018 की एक स्टडी में पाया गया था कि पश्चिमी घाट के जंगलों से मिलने वाली नमी तमिलनाडु और कावेरी नदी के बेसिन तक पहुंचती है.
स्टडी के अनुसार, अगस्त और सितंबर में इन इलाकों में जंगलों से रोजाना करीब 3 मिलीमीटर बारिश में योगदान हो सकता है. वैज्ञानिकों का कहना है कि जंगलों की कटाई से तमिलनाडु में बारिश और पानी की मात्रा घट सकती है. इसका असर सूखे के समय ज्यादा गंभीर हो सकता है. वन क्षेत्र घटने से तमिलनाडु का औसत सतही तापमान करीब 0.25 डिग्री सेल्सियस बढ़ने की आशंका भी स्टडी में जताई गई है.
बिजली की जरूरत के लिए जरूरी बताया जा रहा प्रोजेक्ट
महाराष्ट्र सरकार का कहना है कि यह परियोजना राज्य की कोयले से बनने वाली बिजली पर निर्भरता कम करने में मदद करेगी. नीति आयोग के इंडिया क्लाइमेट एंड एनर्जी डैशबोर्ड के मुताबिक, महाराष्ट्र की करीब 74.19 प्रतिशत बिजली कोयले से चलने वाले प्लांट्स से आती है. पंप्ड स्टोरेज प्लांट में दो जलाशय बनाए जाते हैं. एक पहाड़ी के ऊपर और दूसरा नीचे. जब बिजली की मांग कम होती है, तब अतिरिक्त बिजली से पानी को नीचे वाले जलाशय से ऊपर भेजा जाता है. जब बिजली की मांग बढ़ती है, तो ऊपर जमा पानी टर्बाइन से होकर नीचे आता है और बिजली बनाता है. इस तरह जरूरत के समय बिजली का इस्तेमाल किया जा सकता है.
टोरेंट पावर ने बताया है कि जलाशयों में मुख्य रूप से बारिश का पानी इस्तेमाल किया जाएगा. कंपनी के मुताबिक, परियोजना के तहत आदिवासी समुदाय के लिए 50 बिस्तरों वाला अस्पताल बनाया जाएगा, जहां मुफ्त इलाज मिलेगा. इसके अलावा स्कूल और कौशल विकास केंद्र भी बनाए जाएंगे. कंपनी ने निर्माण के दौरान करीब 2,000 लोगों को रोजगार देने का वादा किया है.