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मिडिल ईस्ट में जारी भीषण जंग की वजह से भारत समेत पूरी दुनिया में एलपीजी की किल्लत और मारामारी शुरू हो गई है. आइए जानते हैं कि रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुकी इस रसोई गैस की शुरुआत आखिर कब और कैसे हुई थी.
एक रहस्यमय शिकायत और वैज्ञानिक की खोज

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20वीं सदी की शुरुआत में अमेरिका में एक कार मालिक ने शिकायत की कि उसके टैंक से पेट्रोल बिना किसी रिसाव के गायब हो रहा है. अमेरिकी रसायन वैज्ञानिक डॉ. वाल्टर ओ. स्नेलिंग ने इस गुत्थी को सुलझाने के लिए पेट्रोल के रासायनिक गुणों पर शोध शुरू किया.
गायब होते पेट्रोल का वैज्ञानिक सच

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स्नेलिंग ने अपनी जांच में पाया कि पेट्रोल में प्रोपेन और ब्यूटेन जैसी हल्की गैसें मौजूद होती हैं जो तापमान मिलते ही वाष्प बनकर उड़ जाती हैं. उन्होंने साबित किया कि यही गैसें पेट्रोल से अलग होकर हवा में मिल रही थीं जिससे ऐसा लगता था जैसे ईंधन चोरी हो रहा हो.
गैस को तरल बनाने का सफल प्रयोग

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डॉ. स्नेलिंग ने इन गैसों को बेकार समझने के बजाय उन्हें भारी दबाव में रखकर तरल रूप में बदलने में सफलता हासिल की. इसी प्रक्रिया से लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस यानी एलपीजी का जन्म हुआ जिसे सुरक्षित रखने के लिए मजबूत सिलेंडर विकसित किए गए.
उद्योगों से निकलकर रसोई का बना आधार

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शुरुआत में एलपीजी का इस्तेमाल केवल भारी उद्योगों में हुआ लेकिन इसकी स्वच्छता और क्षमता देखकर इसे घरों तक पहुंचाया गया. लकड़ी और कोयले के धुएं से मुक्ति दिलाकर इस ईंधन ने महिलाओं के स्वास्थ्य और रसोई की सूरत पूरी तरह बदल दी.
खोजकर्ता डॉ. स्नेलिंग का महान योगदान

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वॉल्टर ओ. स्नेलिंग ने साल 1910 के आसपास यह अद्भुत खोज की थी जिसने भविष्य में ऊर्जा के क्षेत्र में क्रांति ला दी. आज जब हम गैस चूल्हा जलाते हैं तो वह उसी जिज्ञासु वैज्ञानिक की देन है जिसने एक साधारण सी शिकायत को असाधारण आविष्कार में बदल दिया.