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ईरान और इजराइल आज एक-दूसरे के खून के प्यासे हैं, लेकिन इस तनाव के बावजूद हजारों यहूदी ईरान छोड़कर नहीं जा रहे. 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद लाखों यहूदियों ने देश छोड़ दिया, मगर करीब 10 हजार यहूदी आज भी ईरान को ही अपना घर मानते हैं.
सांस्कृतिक जुड़ाव

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ईरानी यहूदियों के लिए उनकी राष्ट्रीय पहचान और सांस्कृतिक गौरव किसी भी दूसरे देश से कहीं ज्यादा बढ़कर है. पूर्व इजरायली खुफिया अधिकारी डेविड निसान के अनुसार, इन यहूदियों की जड़ें ईरान की मिट्टी में इतनी गहरी हैं कि वे इसे छोड़ना नहीं चाहते.
धार्मिक आजादी

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ईरान में आज भी लगभग 30 यहूदी प्रार्थनास्थल और विशेष स्कूल सक्रिय रूप से चल रहे हैं. यहां यहूदियों को अपनी जीवनशैली और परंपराओं को निभाने की पूरी आजादी है, जिसके कारण वे खुद को समाज का हिस्सा मानते हैं.
संवैधानिक सुरक्षा

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ईरान के संविधान में यहूदियों को आधिकारिक धार्मिक अल्पसंख्यक का दर्जा मिला हुआ है और उनके अधिकार सुरक्षित हैं. खास बात यह है कि ईरान की संसद में यहूदी समुदाय का अपना एक प्रतिनिधि भी बैठता है, जो उनकी आवाज उठाता है.
इजराइल जाने में नहीं दिखता फायदा

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ईरान में रहने वाले यहूदी इजराइल को आर्थिक या सामाजिक रूप से कोई बहुत बेहतर विकल्प नहीं मानते. अपनी जमी-जमाई संपत्ति और कारोबार को छोड़कर किसी नए देश में शून्य से शुरुआत करना उन्हें रास नहीं आता.
सुरक्षा की चिंता

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बेशक जंग के हालातों और इजराइल से दुश्मनी के कारण इन यहूदियों के मन में सुरक्षा को लेकर थोड़ा डर बना रहता है. इसके बावजूद, वे इजराइल के 'इमिग्रेशन' ऑफर्स को ठुकरा कर अपने पूर्वजों की इसी जमीन पर रहना पसंद कर रहे हैं.