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Virat Kohli Imposter Syndrome: 19 मई 2026 को बेंगलुरु के सेंटर फॉर स्पोर्ट्स एक्सीलेंस में आयोजित आरसीबी इनोवेशन लैब इंडियन स्पोर्ट्स समिट में बोलते हुए, कोहली ने 2022 की शुरुआत में अपनी टेस्ट कप्तानी खत्म होने के बाद के मुश्किल दौर के बारे में बात की. ये भारतीय क्रिकेट के सबसे उथल-पुथल भरे दौर में से एक था, जब कोहली और तत्कालीन बीसीसीआई अध्यक्ष सौरव गांगुली के बीच अनबन चल रही थी; खबरों के मुताबिक, 2021 के आखिर में T20I कप्तानी छोड़ने के कुछ ही वक्त बाद उन्हें वनडे की कप्तानी से हटा दिया गया था.

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ये सब विराट कोहली के सभी फॉर्मेट में शतक न बना पाने के दौर में हुआ, जो 2020 से 2022 तक चला. 2021 में कार्यकाल खत्म होने के बाद भारत के पूर्व हेड कोच रवि शास्त्री भी अब उनके साथ नहीं थे. लेकिन द्रविड़ और राठौड़ के तौर पर कोहली को एक ऐसा सहारा मिला, जिसने उन्हें अपने करियर के सबसे मुश्किल दौर से निकलने में मदद की.

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कोहली ने कहा, 'मैंने राहुल भाई और विक्रम राठौड़ के बारे में ये बात कई बार कही है. टेस्ट क्रिकेट में मेरा दौर बहुत अच्छा रहा, और जब भी मैं उनसे मिलता हूं, तो दिल से उनका शुक्रिया अदा करता हूं, क्योंकि उन्होंने मेरा इस तरह से ख्याल रखा कि मुझे लगा कि मैं उनके लिए खेलना चाहता हूं.

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कोहली ने आगे कहा, 'मैं अच्छा प्रदर्शन करना चाहता था, डटे रहना चाहता था और कड़ी मेहनत करना चाहता था, क्योंकि वे बहुत ख्याल रखने वाले और हौसला बढ़ाने वाले थे. उन्होंने मुझे उन सभी चीजें की याद दिलाई जो मैंने अब तक की थीं - ऐसी चीजें जिनके बारे में एक खिलाड़ी के तौर पर आप कभी बैठकर सोचते नहीं हैं.'

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आखिरकार विराट कोहली ने 2022 एशिया कप में T20I शतक लगाकर अपने सेंचुरी के सूखे को खत्म किया, और फिर 2023 में 2 टेस्ट शतक बनाए. कुछ महीनों बाद, उन्होंने अपने देश में हुए वनडे वर्ल्ड कप में रिकॉर्ड तोड़ प्रदर्शन किया. कोहली ने कहा कि टॉप लेवल पर द्रविड़ के अपने तजुर्बे ने उन्हें उन डर और खुद पर शक की भावनाओं को समझने में मदद की, जिनसे सीनियर खिलाड़ी भी जूझते रहते हैं.

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कोहली ने कहा, 'एक खिलाड़ी के तौर पर, आप हमेशा सावधान रहने और इनसिक्योर महसूस करने के बीच एक बहुत पतली लाइन पर चलते हैं. आपको लगातार ऐसा लगता है कि आप कभी भी उतने अच्छे नहीं हैं - वो 'इम्पोस्टर सिंड्रोम' (खुद को कमतर समझने का अहसास) हमेशा बना रहता है. आज भी, जब मैं नेट्स में जाता हूं, तो मैं यही सोचता हूं: ये युवा खिलाड़ी मुझे देख रहे हैं. अगर मेरा सेशन खराब जाता है, तो शायद वो सोचेंगे, 'क्या यही वो खिलाड़ी है जो 20 सालों से खेल रहा है?' ये ख्याल हमेशा मेरे मन में रहता है.'

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राहुल भाई इस बात को समझते थे क्योंकि उन्होंने खुद भी उच्चतम स्तर पर इसका अनुभव किया था. विक्रम भी सालों से टीम के साथ थे. वो समझते थे कि मैं कैसा महसूस कर रहा हूं और उन्होंने सचमुच मानसिक रूप से मेरा ख्याल रखा. इससे मैं ऐसी स्थिति में पहुंच गया जहाँ मैं फिर से अपने क्रिकेट का लुत्फ ले सका.'

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कोहली ने कहा कि भारत की कप्तानी छोड़ने के बाद ही उन्होंने अपनी मानसिक परेशानियों के बारे में खुलकर बात करना शुरू किया. उन्होंने कहा, 'आपको लीडरशिप रोल इसलिए दी जाती है क्योंकि लोगों को भरोसा होता है कि आप ज़्यादा जिम्मेदारियां उठा सकते हैं और उन्हें बखूबी निभा भी सकते हैं. कई मायनों में, लीडरशिप कोचिंग से भी ज्यादा मैनेजमेंट के बारे में होता है. ये आपके साथ और आपके लिए खेलने वाले लोगों को समझने और ये पता लगाने के बारे में है कि उनसे बेस्ट परफॉर्मेस कैसे करवाई जाए.'

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कोहली ने ये माना कि अपनी कप्तानी के दौरान, वो टीम को लीड करने की जिम्मेदारी में इतने डूब गए थे कि उन्होंने अपनी खुद के जज्बात पर तवज्जो देना ही बंद कर दिया था. पीछे मुड़कर देखने पर उन्हें अहसास हुआ कि तकरीबन 9 सालों तक, किसी ने भी उनसे सचमुच ये नहीं पूछा था कि वो मेंटली कैसा महसूस कर रहे हैं.

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कोहली ने ये भी कहा, 'ऐसा करने के लिए, आपको लगातार ऐसी सिचुएशन में रहना पड़ता है जहां आपका ध्यान खुद पर नहीं होता. आप यह भी नहीं सोचते कि कोई आपसे यह पूछेगा या नहीं, 'क्या तुम ठीक हो?' ये ख्याल आपके मन में आता ही नहीं है. मैंने पीछे मुड़कर देखा और पाया कि लगभग नौ सालों तक किसी ने भी मुझसे सचमुच यह सवाल नहीं पूछा था - 'तुम कैसे हो?'