माउंट एवरेस्ट का 'डेथ जोन', ऊंची चोटी पर एक जगह ऐसी जहां कैसे ठप हो जाता है पूरा शरीर?

Mount Everest Death Zone: दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट के 'डेथ जोन' में कदम रखते ही इंसानी शरीर एक 'स्लो-मोशन मेडिकल इमरजेंसी' बन जाता है. ऑक्सीजन की भारी कमी के कारण यहां दिमाग सूजने लगता है, खून गाढ़ा हो जाता है और कोशिकाएं दम तोड़ने लगती हैं. जानिए मौत के इस खौफनाक इलाके का पूरा सच.

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Mount Everest Death Zone: निया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट (8,849 मीटर) को फतह करना हर पर्वतारोही का सपना होता है, लेकिन इस सफलता की डगर मौत के सबसे खौफनाक रास्ते से होकर गुजरती है. एवरेस्ट की चढ़ाई में समुद्र तल से 8,000 मीटर (26,247 फीट) से ऊपर के हिस्से को 'डेथ जोन' (Death Zone) कहा जाता है. यह एक ऐसा इलाका है जहां पहुंचते ही इंसानी शरीर धीरे-धीरे और पल-पल मरने लगता है.

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हवा में एक तिहाई रह जाती ऑक्सीजन

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वैज्ञानिकों और डॉक्टरों के अनुसार, डेथ जोन में वायुमंडलीय दबाव इतना कम हो जाता है कि हवा में ऑक्सीजन की मात्रा समुद्र तल के मुकाबले सिर्फ एक-तिहाई (33%) रह जाती है. बिना सप्लीमेंट्री ऑक्सीजन के कोई भी इंसान यहां 24 घंटे से ज्यादा जीवित नहीं रह सकता. इस ऊंचाई पर शरीर ऑक्सीजन का उतना इस्तेमाल नहीं कर पाता जितनी तेजी से वह खत्म होती है.

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दिमाग पर होता है जानलेवा हमला

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ऑक्सीजन की भयंकर कमी के कारण शरीर के मुख्य अंग काम करना बंद करने लगते हैं. इसे 'हाइपोक्सिया' कहा जाता है. ऑक्सीजन न मिलने पर दिमाग में सूजन आने लगती है, जिसे मेडिकल भाषा में 'हाई एल्टीट्यूड सेरेब्रल एडिमा' (HACE) कहते हैं. इसके कारण पर्वतारोही की सोचने-समझने की क्षमता खत्म हो जाती है.

फेफड़ों में भरने लगता है पानी

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पर्वतारोही को चक्कर आने लगते हैं और वे मतिभ्रम के शिकार हो जाते हैं. कई बार लोग भूल जाते हैं कि वे कहां हैं. ऑक्सीजन की कमी से फेफड़ों में पानी भरने लगता है, जिसे 'हाई एल्टीट्यूड पल्मोनरी एडिमा' (HAPE) कहा जाता है. इसके कारण सांस लेना बेहद दर्दनाक हो जाता है, लगातार खांसी आती है और दम घुटने से इंसान की मौत हो जाती है.

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गाढ़ा खून और दिल का दौरा

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हाइपोक्सिया से लड़ने के लिए मानव शरीर तेजी से हीमोग्लोबिन (लाल रक्त कोशिकाएं) बनाना शुरू कर देता है ताकि अंगों तक ऑक्सीजन पहुंचाई जा सके. लेकिन डेथ जोन में लंबे समय तक रहने से खून इतना गाढ़ा हो जाता है कि दिल के लिए उसे पंप करना मुश्किल हो जाता है. इससे पर्वतारोहियों में स्ट्रोक और हार्ट अटैक का खतरा कई गुना बढ़ जाता है. साथ ही, माइनस 30 डिग्री से कम के तापमान में उंगलियों और पैरों में फ्रॉस्टबाइट (अंगों का जम जाना) होना आम बात है.

वापसी का रास्ता है सबसे खतरनाक

वापसी का रास्ता है सबसे खतरनाक6 / 6

हाल ही में एवरेस्ट फतह कर लौट रहे दो भारतीय पर्वतारोहियों की मौत ने एक बार फिर इस सच को उजागर किया है कि एवरेस्ट पर चढ़ने से ज्यादा खतरनाक वहां से उतरना है. डेथ जोन में ज्यादा समय बिताने या ट्रैफिक जाम में फंसने से ऑक्सीजन खत्म हो जाती है. थका हुआ शरीर, जमा देने वाली ठंड और भ्रमित दिमाग के कारण वापसी में जरा सी चूक सीधे मौत के मुंह में ले जाती है. विशेषज्ञ कहते हैं कि डेथ जोन में टिके रहने का मतलब है- घड़ी की सुइयों के साथ अपनी मौत को दावत देना.

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लेखक के बारे में

Vijay Jain

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विजय कुमार न्यूज 24 में बतौर सीनियर न्यूज एडिटर कार्यरत हैं. विजय कुमार ने अपने पत्रकारिता के सफर की शुरुआत प्रिंट मीडिया के साथ की. अपने 23 साल के करियर में वह दैनिक जागरण, अमर उजाला और दैनिक भास्कर जैसे संस्थानों के साथ जुड़े रहे हैं. विजय कुमार राजनीति, चुनाव, क्राइम और करंट अफेयर्स जैसे विषयों पर तथ्यपरक पत्रकारिता के लिए जाने जाते हैं. विजय कुमार ने दैनिक भास्कर में रिपोर्टिंग के दौरान स्टिंग ऑपरेशन भी किए. 23 साल के अनुभव के दौरान विजय कुमार ने करियर के शुरुआती दौर में डेस्क जर्नलिस्ट रहते हुए की. विजय कुमार को 2019 और 2024 के लोकसभा चुनाव के अलावा बिहार, यूपी, बंगाल, राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों के विधानसभा चुनाव की ग्राउंड कवरेज का अनुभव है. ग्रामीण उद्योगीकरण में स्नातक की डिग्री होने के कारण विजय कुमार को ग्रामीण इलाकों की समस्याओं और उनसे जुड़ी कवरेज का खासा अनुभव है. अपने लेख के माध्यम से उन्होंने ग्रामीण इलाकों की समस्याओं को प्रमुखता से उठाया है. पत्रकारिता में अनुभव: 23 साल योग्यता, डिग्री / अन्य उपलब्धियां: शैक्षणिक योग्यता की बात करें तो उन्होंने कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से ग्रामीण उद्योगीकरण विषय में बीए की डिग्री प्राप्त की है. विजय कुमार को पत्रकारिता के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए 2017 में 'श्रीफल जर्नलिज्म नेशनल अवॉर्ड' से सम्मानित किया गया.
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