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नई दिल्ली, पुरानी दिल्ली, आनंद विहार और हजरत निजामुद्दिन समेत दिल्ली में करीब 46 रेलवे स्टेशन (railway stations) हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि दिल्ली का सबसे पुराना रेलवे स्टेशन कौन सा है. दिल्ली के इस स्टेशन पर होली दिवाली के समय पैर रखने की जगह भी नहीं मिलती है. लेकिन कभी ऐसा वक्त था, जब वो भूतों का डेरा लगता था.

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1911 में जब अंग्रेजों ने राजधानी को कलकत्ता से दिल्ली शिफ्ट किया, तब नई दिल्ली को बसाने की योजना बनी. नई दिल्ली रेलवे स्टेशन की शुरुआत 1926 में केवल एक प्लेटफॉर्म के साथ हुई थी. उस समय 'पुरानी दिल्ली स्टेशन' (Delhi Junction) ही मुख्य स्टेशन था. नई दिल्ली स्टेशन को तो वायसराय और ब्रिटिश अधिकारियों के लिए एक गेटवे के तौर पर विकसित किया गया था.

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इसे आज के भव्य स्वरूप में आने में समय लगा. 1956 में आधिकारिक तौर पर इसका आधुनिक स्वरूप जनता के लिए खोला गया. यह स्टेशन 1 प्लेटफॉर्म से शुरू होकर आज 16 प्लेटफॉर्म तक पहुंच चुका है और हर दिन लगभग 5 लाख यात्रियों को संभालता है. शुरुआत में दिल्ली के इस रेलवे स्टेशन पर सिर्फ एक ही पटरी डाली गई थी. लिहाजा यहां ट्रेनों का आना जाना कम था. खासतौर से शाम के समय में यहां ट्रेनों की आवा जाही न के बराबर थी और इसलिए यहां सन्नाटा पसरा रहता था.

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इसे आज के भव्य स्वरूप में आने में समय लगा. 1956 में आधिकारिक तौर पर इसका आधुनिक स्वरूप जनता के लिए खोला गया. यह स्टेशन 1 प्लेटफॉर्म से शुरू होकर आज 16 प्लेटफॉर्म तक पहुंच चुका है और हर दिन लगभग 5 लाख यात्रियों को संभालता है. शुरुआत में दिल्ली के इस रेलवे स्टेशन पर सिर्फ एक ही पटरी डाली गई थी. लिहाजा यहां ट्रेनों का आना जाना कम था. खासतौर से शाम के समय में यहां ट्रेनों की आवा जाही न के बराबर थी और इसलिए यहां सन्नाटा पसरा रहता था.

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इतिहास और पुराने दिल्लीवासियों की कहानियों में इस जगह को लेकर एक अलग ही छवि थी. जहां आज लोगों को पैर रखने की जगह नहीं मिलती, वह कभी भयानक डरावना हुआ करता था.

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साल 1920 और 30 के दशक में, जहां आज अजमेरी गेट और पहाड़गंज की भीड़ है, वहां घना जंगल और झाड़ियां हुआ करती थीं. रात के समय यह इलाका बेहद सुनसान और अंधेरा होता था, जिससे लोग यहां जाने से कतराते थे.

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नई दिल्ली स्टेशन को रायसीना हिल्स और पुराने खंडहरों के पास बसाया गया था. ब्रिटिश निर्माण के दौरान कई पुरानी कब्रों और संरचनाओं को हटाया गया था, जिससे स्थानीय लोगों के मन में कई भूतिया किस्से (Folklore) बन गए थे.

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डरावना होने का मतलब केवल भूत-प्रेत नहीं था. पुराने समय में पहाड़गंज की गलियां और स्टेशन के पीछे का इलाका ठगों और लुटेरों के लिए बदनाम था, इसलिए रात में यात्रियों के लिए यह किसी डरावने अनुभव से कम नहीं था.