भीषण गर्मी में जब शहरों के लोग एयर कंडीशनर, कूलर और फ्रिज का सहारा ले रहे हैं, वहीं छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र के आदिवासी अपनी पारंपरिक जीवन शैली और प्राकृतिक संसाधनों के जरिए इस चुनौती का सामना कर रहे हैं. बीजापुर जिले में एक आदिवासी व्यक्ति अपने 'तुंबा' नामक देसी फ्रिज को लेकर घूम रहा है, जो ठंडा पानी रखने का प्राकृतिक साधन है.
गर्मी से निपटने का अनोखा देसी तरीका

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बीजापुर जिले के एक आदिवासी पुरुष ने गर्मी के मौसम में ठंडा पानी पीने के लिए 'तुंबा' का इस्तेमाल किया है. यह पारंपरिक मिट्टी का बना देसी फ्रिज आदिवासियों की सरल लेकिन प्रभावी जीवन शैली को दर्शाता है. जबकि शहरी लोग आधुनिक उपकरणों पर निर्भर हैं, आदिवासी प्रकृति के सहारे अपनी जरूरतें पूरी कर रहे हैं.
जंगलों से फल और उपज की तलाश

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बस्तर के घने जंगलों में आदिवासी महिलाएं ऊंचे पेड़ों पर चढ़कर फल और वन उपज तोड़ रही हैं. नीचे उनके बच्चे इंतजार कर रहे हैं. यह दृश्य उनकी जीवटता और जंगल पर निर्भरता को स्पष्ट रूप से दिखाता है. गर्मी के बावजूद वे अपने परिवार की आजीविका के लिए निरंतर प्रयास कर रही हैं.
वन उत्पादों पर आधारित आजीविका

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सूर्यास्त के समय मुस्कुराती हुई आदिवासी महिलाएं घने जंगलों से वन उत्पादों को इकट्ठा करके लौट रही हैं. ये उत्पाद उनके परिवार की मुख्य आय का साधन हैं. प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाकर वे अपनी दिनचर्या को जारी रखे हुए हैं.
मानसून की तैयारी में मशक्कत

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मानसून का इंतजार कर रहे पूरे देश के बीच बस्तर की महिलाएं लकड़ी के लट्ठे सिर पर उठाकर घर ले जा रही हैं. ये लकड़ी छत को मजबूत बनाने और अन्य घरेलू कामों के लिए इस्तेमाल की जाएगी. यह उनके दूरदर्शी सोच और कठिन परिश्रम को उजागर करता है.
शहरी और आदिवासी जीवन की तुलना

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शहरों में गर्मी से बचने के आधुनिक उपायों के विपरीत बस्तर के आदिवासी प्राचीन और पर्यावरण अनुकूल तरीकों का सहारा ले रहे हैं. 'तुंबा' जैसे उपकरण और जंगल से प्राप्त संसाधन उनकी कला का उदाहरण हैं.
प्रकृति के साथ सामंजस्य

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बस्तर के आदिवासी गर्मी, जंगल और आने वाले मानसून के बीच संतुलन बनाते हुए अपनी दिनचर्या चला रहे हैं. उनकी मेहनत और सरलता आधुनिक दुनिया के लिए एक सबक भी है. ये तस्वीरें छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक समृद्धि और आदिवासी समुदाय की मजबूती को दिखाती हैं.