बिना AC-कूलर छत्तीसगढ़ के आदिवासी कैसे देते हैं भीषण गर्मी को मात, जुगाड़ देख हो जाएंगे हैरान

भीषण गर्मी में जब शहरों के लोग एयर कंडीशनर, कूलर और फ्रिज का सहारा ले रहे हैं, वहीं छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र के आदिवासी अपनी पारंपरिक जीवन शैली और प्राकृतिक संसाधनों के जरिए इस चुनौती का सामना कर रहे हैं. बीजापुर जिले में एक आदिवासी व्यक्ति अपने 'तुंबा' नामक देसी फ्रिज को लेकर घूम रहा है, जो ठंडा पानी रखने का प्राकृतिक साधन है.

Aadiwasi
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भीषण गर्मी में जब शहरों के लोग एयर कंडीशनर, कूलर और फ्रिज का सहारा ले रहे हैं, वहीं छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र के आदिवासी अपनी पारंपरिक जीवन शैली और प्राकृतिक संसाधनों के जरिए इस चुनौती का सामना कर रहे हैं. बीजापुर जिले में एक आदिवासी व्यक्ति अपने 'तुंबा' नामक देसी फ्रिज को लेकर घूम रहा है, जो ठंडा पानी रखने का प्राकृतिक साधन है.

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गर्मी से निपटने का अनोखा देसी तरीका

गर्मी से निपटने का अनोखा देसी तरीका2 / 7

बीजापुर जिले के एक आदिवासी पुरुष ने गर्मी के मौसम में ठंडा पानी पीने के लिए 'तुंबा' का इस्तेमाल किया है. यह पारंपरिक मिट्टी का बना देसी फ्रिज आदिवासियों की सरल लेकिन प्रभावी जीवन शैली को दर्शाता है. जबकि शहरी लोग आधुनिक उपकरणों पर निर्भर हैं, आदिवासी प्रकृति के सहारे अपनी जरूरतें पूरी कर रहे हैं.

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जंगलों से फल और उपज की तलाश

जंगलों से फल और उपज की तलाश3 / 7

बस्तर के घने जंगलों में आदिवासी महिलाएं ऊंचे पेड़ों पर चढ़कर फल और वन उपज तोड़ रही हैं. नीचे उनके बच्चे इंतजार कर रहे हैं. यह दृश्य उनकी जीवटता और जंगल पर निर्भरता को स्पष्ट रूप से दिखाता है. गर्मी के बावजूद वे अपने परिवार की आजीविका के लिए निरंतर प्रयास कर रही हैं.

वन उत्पादों पर आधारित आजीविका

वन उत्पादों पर आधारित आजीविका4 / 7

सूर्यास्त के समय मुस्कुराती हुई आदिवासी महिलाएं घने जंगलों से वन उत्पादों को इकट्ठा करके लौट रही हैं. ये उत्पाद उनके परिवार की मुख्य आय का साधन हैं. प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाकर वे अपनी दिनचर्या को जारी रखे हुए हैं.

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मानसून की तैयारी में मशक्कत

मानसून की तैयारी में मशक्कत5 / 7

मानसून का इंतजार कर रहे पूरे देश के बीच बस्तर की महिलाएं लकड़ी के लट्ठे सिर पर उठाकर घर ले जा रही हैं. ये लकड़ी छत को मजबूत बनाने और अन्य घरेलू कामों के लिए इस्तेमाल की जाएगी. यह उनके दूरदर्शी सोच और कठिन परिश्रम को उजागर करता है.

शहरी और आदिवासी जीवन की तुलना

शहरी और आदिवासी जीवन की तुलना6 / 7

शहरों में गर्मी से बचने के आधुनिक उपायों के विपरीत बस्तर के आदिवासी प्राचीन और पर्यावरण अनुकूल तरीकों का सहारा ले रहे हैं. 'तुंबा' जैसे उपकरण और जंगल से प्राप्त संसाधन उनकी कला का उदाहरण हैं.

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प्रकृति के साथ सामंजस्य

प्रकृति के साथ सामंजस्य7 / 7

बस्तर के आदिवासी गर्मी, जंगल और आने वाले मानसून के बीच संतुलन बनाते हुए अपनी दिनचर्या चला रहे हैं. उनकी मेहनत और सरलता आधुनिक दुनिया के लिए एक सबक भी है. ये तस्वीरें छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक समृद्धि और आदिवासी समुदाय की मजबूती को दिखाती हैं.

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लेखक के बारे में

Akarsh Shukla

Akarsh Shukla

आकर्ष शुक्ला न्यूज 24 के साथ बतौर चीफ सब एडिटर जुड़े हुए हैं. मूल रूप से नोएडा, उत्तर प्रदेश के रहने वाले आकर्ष ने पत्रकारिता का सफर 2016 में प्रिंट मीडिया से शुरू हुआ, बाद में उन्होंने डिजिटल मीडिया का रुख किया. आकर्ष शुक्ला ने गुरु जंभेश्वर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (GJUS&T) हिसार, हरियाणा से मास्टर ऑफ मास कम्युनिकेशन (MJMC) की डिग्री हासिल की. आकर्ष ने दिल्ली के अखबार वूमेन एक्सप्रेस में काम किया. इसके बाद नवोदय टाइम्स, ओपेरा न्यूज, वनइंडिया, इंडिया डॉट कॉम (जी मीडिया ग्रुप) में विभिन्न पदों पर कार्य किया. आकर्ष शुक्ला अक्टूबर, 2025 से न्यूज24 से जुड़े हुए हैं, जहां वो मुख्य रूप से राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय और राजनीति से जुड़ी खबरों को कवर करते हैं. इसके साथ ही आकर्ष शिफ्ट हेड के तौर पर टीम का नेतृत्व भी करते हैं. आकर्ष ने लोकसभा और विधानसभा चुनाव के अलावा संसद से जुड़ी खबरों को कवर किया है. उनकी राजनीति में गहरी रुचि है, इस कारण वह राजनीति से जुड़ी खबरों को आसान शब्दों में लिखने में माहिर हैं. डिग्री और डिप्लोमा: आकर्ष शुक्ला ने दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक (BA) की डिग्री के बाद गुरु जंभेश्वर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (GJUS&T) हिसार, हरियाणा से मास्टर ऑफ मास कम्युनिकेशन (MJMC) पोस्ट ग्रेजुएशन किया है. आकर्ष शुक्ला ने DICS इंस्टीट्यूट से कंप्यूटर सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर में 2 साल का डिप्लोमा भी किया है. पत्रकारिता में अनुभव: 10 वर्ष से अधिक
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