नेहरू के निधन के दिन पूरे देश में छा गया था मातम, कैसे हुई थी लोगों की शादियां?

27 मई 1964 के दिन तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के निधन की खबर पूरे देश में आग की तरह फैल गई थी. उस दिन पूरे देश में शादियों बड़ा साया था. दोपहर के समय जब नेहरू जी के निधन की खबर आई तो पूरे देश में मातम पसर गया. शादी वाले घरों में स्तब्धता छा गई. तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के निधन देशभर में जैसे ही फैली, हर कोई स्तब्ध रह गया. बहुत से लोग तो रोने भी लगे थे. वो ना केवल देश के सबसे बड़े बल्कि सबसे लोकप्रिय नेता भी थे.

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कई जगह बारात जनवासे में आ चुकी थी

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कई जगहों पर बारात आकर जनवासे में ठहर चुकी थी. पहले जिस धर्मशाला या बड़े मकानों में बारात को ठहराया जाता था, उसको जनवासा कहते थे. शादी वाले घरों की समस्या वाकई अजीब हो गई. उन्होंने तब जिला प्रशासन संपर्क साधा. अफसरों का रुख था कि शादी तो बेशक कराइए लेकिन सादगी से.

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एक किस्सा जो आज भी फेमस है

एक किस्सा जो आज भी फेमस है3 / 6

यूपी के जौनपुर में एक शादी थी. बारात बनारस से आनी थी जो जौनपुर पहुंच चुकी थी. पहले के समय में शादियां सिर्फ कुछ घंटों में नहीं बल्कि उसमें दो-तीन दिन तक भी लग जाते थे. पहले दिन आमतौर पर बारात का स्वागत भोज, तिलक वगैरह होता था. शादी की असली रस्में दूसरे दिन संपन्न होती थीं. उस दौर में सूचना का एकमात्र जरिया ऑल इंडिया रेडियो था. दोपहर को जैसे ही समाचार वाचक देवकी नंदन पांडे की गंभीर आवाज में नेहरू जी के निधन की खबर आई, वैसे ही शादी वाले घरों में सन्नाटा छा गया.

बिल्कुल खामोशी में हुईं थीं शादियां

बिल्कुल खामोशी में हुईं थीं शादियां4 / 6

नेहरू जी के निधन की खबर मिलते ही सबसे पहला काम यह किया गया कि शादियों में बज रहे लाउडस्पीकर, फिल्मी गाने और बैंड-बाजे तुरंत बंद कर दिए गए. शहनाई बजाने वालों ने अपनी शहनाइयां रख दीं. माहौल ऐसा हो गया था जैसे किसी के अपने घर में कोई अनहोनी हो गई हो. शादी तो हुई लेकिन बिल्कुल खामोशी के साथ.

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बाजार बंद, सड़कों पर परस गया था सन्नाटा

बाजार बंद, सड़कों पर परस गया था सन्नाटा5 / 6

नेहरू के निधन की खबर के बाद बाजार देखते ही देखते बंद हो गए. सड़के सूनी हो गईं. सड़कों पर सन्नाटा छा गया. तमाम लोगों ने घरों में चूल्हे नहीं जलाए. कुछ लोग रोते भी नजर आए. रात में घरों की लाइट्स नहीं जलीं. हर कोई दुखी था.

शादी के फेरों में नेहरू के जाने का था दुख

शादी के फेरों में नेहरू के जाने का था दुख6 / 6

कई शादियों के मंडप में पंडितों ने मंत्रोच्चार की आवाज बहुत धीमी कर दी गई. कुछ जगहों से ऐसे भी किस्से सुनने को मिले कि फेरों के समय दूल्हा-दुल्हन और घराती-बाराती, सभी की आंखें नम थीं. लोग फेरे लेते हुए भी आपस में फुसफुसा रहे थे, “नेहरू जी चले गए, अब देश का क्या होगा?” विदाई के समय जो आंसू बहे, उनमें सिर्फ बेटी के बिछड़ने का गम नहीं था, बल्कि देश के लोकप्रिय नेता को खोने का सामूहिक दुख भी शामिल था.

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लेखक के बारे में

Versha Singh

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वर्षा स‍िंह News 24 ड‍िजिटल में बतौर सीन‍ियर सब एड‍िटर के पद पर कार्यरत हैं. वर्षा को ड‍िजिटल मीड‍िया में 6 साल से अधि‍क का अनुभव है. राष्‍ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय और समसमाय‍िक व‍िषयों पर वर्षा की अच्‍छी पकड़ है. इसके अलावा राजनीत‍िक, क्राइम और ट्रेंडिंग खबरें भी ल‍िखती हैं. वर्षा ने मास्टर इन न्यू मीडिया टेक्नोलॉजी की पढ़ाई माखन लाल चतुर्वेदी यूनिवर्सिटी, भोपाल से की है और जर्नलिज्म एवं मास कम्युनिकेशन में स्नातक की डिग्री लखनऊ विश्वविद्यालय से प्राप्त की है. वर्षा अपने करियर में Jagran New Media, Asia News International (ANI) और ETV Bharat जैसे प्रमुख मीडिया संस्थानों के साथ काम कर चुकी हैं. उन्हें हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में लेखन और समसामयिक घटनाओं, राजनीति, हाइपरलोकल खबरों और मानवीय रुचि से जुड़ी कहानियों को डिजिटल दर्शकों तक प्रभावी ढंग से पहुंचाने का अनुभव है.
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