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आपने अक्सर देखा होगा कि जब हम अपनों के साथ बैठते हैं तब भी हम अपने फोन में ही लगे रहते हैं. कभी लंच के बीच बेवजह ईमेल या वॉट्सएप चेक करना, तो कभी तो कभी किसी दोस्त से फोन पर बात करते हुए बीच में ही किसी और को मैसेज टाइप करना- यह हममें से ज्यादातर लोगों की रोजमर्रा की आदत बन चुकी है.
रिसर्च में हुआ खुलासा

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एक रिसर्च के अनुसार, हम दिन भर में 200 से ज्यादा बार अपना फोन चेक करते हैं. अनजाने में ही, इन स्क्रीन्स ने हमारे हर खाली पल और कीमती समय पर पूरी तरह से अपना कब्जा जमा लिया है.
हर रोज 8 घंटे से ज्यादा समय बीत रहा स्क्रीन पर

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जब इंटरनेट की शुरुआत हुई थी, तब इसके निर्माताओं ने सोचा था कि यह तकनीक हमारी जिंदगी को और भी बेहतर बनाएगी. उस दौर में लोग हफ्ते में बमुश्किल एक घंटा ही ऑनलाइन बिताते थे, लेकिन 'नीलसन' की मौजूदा रिपोर्ट की सच्चाई चौंकाने वाली है. इस रिसर्च में बताया गया है कि आज लोग हर दिन 8 घंटे से भी ज्यादा समय स्क्रीन को घूरते हुए बिता देते हैं. यह हमारे सोने या काम करने के कुल समय से भी ज्यादा है. हम इतिहास की शायद पहली ऐसी पीढ़ी हैं, जो खूबसूरत प्राकृतिक नजारों के बजाय अपने हाथों में मौजूद कांच की छोटी-सी स्क्रीन को ज्यादा अहमियत देती है.
हर पल नोटिफिकेशन का रहता है इंतजार

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इस डिजिटल लत का सीधा असर हमारी मेंटल हेल्थ पर भी पड़ सकता है. नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ के शोध बताते हैं कि बचपन में ज्यादा स्क्रीन देखने वाले बच्चों में किशोरावस्था तक आते-आते डिप्रेशन के लक्षण बढ़ने लगते है. वहीं, वयस्कों में भी इसकी वजह से तनाव, नींद की कमी, अकेलापन और घबराहट तेजी से बढ़ रही है.
प्रकृति के 20 मिनट करेंगे ये काम

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राहत की बात यह है कि इस गंभीर समस्या का इलाज बहुत ही सरल है और इसके लिए किसी महंगी थेरेपी की जरूरत नहीं है. 'स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी' द्वारा 449 अलग-अलग स्टडीज के एक मेगा-एनालिसिस से यह साबित हुआ है कि प्रकृति के बीच महज 10 से 20 मिनट बिताने से मानसिक सेहत में जादुई सुधार होता है.
घर से बाहर निकलने पर तनाव बढ़ाने वाला कॉर्टिसोल हार्मोन कम होता है, हार्ट रेट में सुधार होता है और इंसान का मूड तुरंत बेहतर हो जाता है और इन बदलावों को बाकायदा खून और लार की जांच में मापा जा सकता है.
'मिशिगन यूनिवर्सिटी' की एक रिसर्च तो यहां तक कहती है कि प्रकृति के बीच थोड़ी देर टहलने से हमारी याददाश्त और फोकस में 20% तक का इजाफा होता है, जो कोई भी महंगा 'प्रोडक्टिविटी ऐप' आपको नहीं दे सकता.
हफ्ते में 2 घंटे की 'ग्रीन थेरेपी' से क्या होगा?

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आंकड़े बताते हैं कि जो लोग हफ्ते भर में कम से कम दो घंटे प्रकृति के बीच बिताते हैं, उनकी मेंटल और फिजिकल हेल्थ ऐसा न करने वालों की तुलना में बहुत बेहतर होती है. इसके लिए आपको किसी घने जंगल या पहाड़ों पर जाने की बिल्कुल जरूरत नहीं है. आपके शहर का कोई भी आम पार्क, हरियाली वाली कोई सड़क भी आपके लिए उतनी ही असरदार काम कर सकती है.