जब भी आप किसी नए शहर या इलाके में किराये पर घर ढूंढने निकलते हैं, तो मकान मालिक अक्सर आपके सामने दस्तावेजों की एक लंबी लिस्ट रख देते हैं। पहचान पत्र के अलावा हालिया सैलरी स्लिप (Salary Slips), बैंक स्टेटमेंट और यहाँ तक कि क्रेडिट स्कोर तक की मांग की जाती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि कानूनन मकान मालिक आपसे क्या-क्या मांग सकता है? केंद्र सरकार के मॉडल टेनेंसी एक्ट (MTA) में रेंट अथॉरिटी के पास जमा किए जाने वाले जरूरी दस्तावेजों की एक स्पष्ट सूची दी गई है। आइए, आसान भाषा में समझते हैं कि किरायेदार के रूप में आपके क्या अधिकार हैं और कौन से डॉक्यूमेंट्स देना कानूनी रूप से अनिवार्य है।
मॉडल टेनेंसी एक्ट: सिर्फ ये बेसिक पहचान पत्र देना ही है कानूनी रूप से जरूरी

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केंद्र सरकार के मॉडल टेनेंसी एक्ट के फर्स्ट शेड्यूल के अनुसार, रेंट एग्रीमेंट और वेरिफिकेशन के लिए केवल बेसिक पहचान ही अनिवार्य है। किरायेदार के रूप में आपको केवल अपना नाम, स्थायी पता, फोन नंबर, ईमेल आईडी और खुद से साइन की हुई (Self-Attested) आधार कार्ड और पैन (PAN) कार्ड की कॉपियां देनी होती हैं। कानूनन आधार और पैन की मांग सिर्फ इसलिए की जाती है ताकि दोनों पक्षों (मकान मालिक और किरायेदार) की वास्तविक पहचान की पुष्टि (Verification) की जा सके।
समानता का नियम: जो दस्तावेज आपके लगेंगे, वही मकान मालिक को भी देने होंगे

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इस कानून की सबसे दिलचस्प और मजबूत बात यह है कि यह मकान मालिक और किरायेदार दोनों को एक ही तराजू में तौलता है। ऐसा नहीं है कि सिर्फ किरायेदार को ही अपनी निजी जानकारियां देनी होंगी। कानून के मुताबिक मकान मालिक को भी किरायेदार के सामने अपना पूरा नाम, पता, फोन नंबर, ईमेल और अपने आधार व पैन की डिटेल्स साझा करनी होगी। इससे दोनों पक्षों के बीच पूरी पारदर्शिता बनी रहती है और किरायेदार भी किसी संभावित फ्रॉड या गलत मकान मालिक के चंगुल में फंसने से बच जाता है।
सैलरी स्लिप और बैंक स्टेटमेंट मांगना कोई कानूनी नियम नहीं, यह सिर्फ निजी चॉइस है

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अक्सर मकान मालिक किरायेदारों से उनकी वित्तीय स्थिति जानने के लिए कई तरह के पेपर्स मांगते हैं, जिसे लेकर कानून बेहद साफ है। मॉडल टेनेंसी एक्ट में कहीं भी किरायेदार की फाइनेंशियल हिस्ट्री या कमाई का सबूत मांगने का जिक्र नहीं है। इसलिए अपनी सैलरी स्लिप, एम्प्लॉयमेंट लेटर, बैंक स्टेटमेंट, आईटीआर (ITR) फाइलिंग या क्रेडिट स्कोर देना आपके लिए बिल्कुल भी अनिवार्य नहीं है। अगर कोई मकान मालिक यह देखने के लिए बैंक स्टेटमेंट मांगता है कि आप किराया दे पाएंगे या नहीं, तो यह विशुद्ध रूप से उनका अपना निजी नियम (Private Vetting) है, कोई कानूनी अनिवार्यता नहीं. आप चाहें तो इसे दिखाने से मना भी कर सकते हैं।
आपके राज्य में यह कानून लागू है या नहीं? ऐसे समझें इसका नियम

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यह जानना भी बेहद जरूरी है कि मॉडल टेनेंसी एक्ट पूरे भारत में स्वचालित रूप से (Automatically) लागू नहीं होता है। भारत के संविधान के तहत टेनेंसी (किरायेदारी) एक राज्य का विषय (State Subject) है। इसलिए हर राज्य या केंद्र शासित प्रदेश को इस केंद्रीय ढांचे को अपने कानून में संशोधन करके लागू करना होता है। वर्तमान में उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh), तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और असम जैसे राज्यों ने इस मॉडल एक्ट के आधार पर अपने किरायेदारी कानूनों में संशोधन कर लिया है।
11 महीने से ज्यादा का एग्रीमेंट है? तो लगेंगे दो गवाह और रजिस्ट्रेशन

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अगर आप लंबे समय के लिए घर किराये पर ले रहे हैं, तो रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1908 (Registration Act) के तहत नियम बदल जाते हैं। यदि आपका रेंट एग्रीमेंट 11 महीने से अधिक की अवधि का है, तो कानूनन उसका सरकारी रजिस्ट्रेशन कराना अनिवार्य होता है। एग्रीमेंट को रजिस्टर्ड कराते समय किरायेदार और मकान मालिक के अलावा दो गवाहों (Witnesses) की भी जरूरत पड़ती है. इन दोनों गवाहों के भी पहचान पत्र (Identity Proof) और पते का सबूत (Address Proof) एग्रीमेंट के साथ अटैच करना कानूनी रूप से जरूरी होता है।