डॉ. महेश चंद्र धाकड़
Former FM Manmohan Singh Memoir: भारतीय राजनीति जिस ओर करवट ले चुकी है उसमें शायद ही अब कोई दूसरा मनमोहन हो! मैं शब्दों में ही उनके नाम के अर्थ भी समझाने की कोशिश कर रहा हूं। अब कोई भी मनमोहन नहीं होगा, क्योंकि जिन गुणों को उनके अवगुण करार दिया जाता रहा, वही उनकी खासियत रहे। एक ऐसे शख्स जो राजनीति के ओछे तौर-तरीके तो सीखे ही न थे। उल्टे हमें ये सिखा गए कि राजनीति में भी सौम्य, शालीन और शांतचित्त रहकर भी देश और समाज के लिए अपना अतुलनीय योगदान दिया जा सकता है। ऐसे डॉ. मनमोहन सिंह जी को भारतीय राजनीति और अर्थशास्त्र के ग्रंथों के श्वेत पन्नों में बेहद सम्मानजनक जगह मिलेगी। क्योंकि जिस दौर में उन्होंने प्रधानमंत्री का पदभार संभाला, उस दौर में दुनिया आर्थिक मंदी के झोंकों को झेल रही थी। भारतीय राजनीति मंडल और कमंडल से हल्कान होकर अपना विद्रूप चेहरा लेकर सामने थी। इससे पूर्व पीवी नरसिम्हा राव जी की सरकार में वित्त मंत्री का पदभार संभाला था तो देश को आर्थिक संकट के दौर से गुजरना पड़ रहा था और अपना सोना भी अपना नहीं रहा था, ऐसे हालात को महसूस हम सब कर सकते हैं जब घर के सोने को ही हम नहीं बचा पा रहे हों तो उसको बहुत गंभीर स्थिति माना जाता है, तो देश किस मुश्किल में होगा ये सहज अनुमान लगाया जा सकता है। उस दौर में महत्वपूर्ण मंत्रालय की कुर्सी संभालना किसी कांटों सजे ताज से कम न था। लेकिन योग्यता और सूझबूझ से डॉ. मनमोहन सिंह जी ने देश को मुश्किल दौर से उबार लिया, जब दुनिया आर्थिक मंदी से जूझ रही थी उस जोखिम से बचा लिया, ये क्या कोई कम उपलब्धि नहीं रही उनकी!
हितकारी योजना के मास्टरमाइंड
हम तो उस पीढ़ी के सौभाग्यशाली लोग हैं, जिन्होंने कि नेताओं को अथाह सम्मान पाते हुए देखा है और उतने ही दुर्भाग्यशाली भी, जिन्होंने नेताओं के लिए अपमानजनक शब्द कहते हुए लोगों को देखा है। हम कह सकते हैं हमने गांधी जी और नेहरू जी के दौर को तो नहीं देखा, लेकिन हमने डॉ. मनमोहन सिंह जी के सुखद दौर को जरूर देखा है। हमने राजनीति के ऐसे हस्ताक्षर के दौर में जीवन जिया है, जिसके कि न सिर्फ हमारी मुद्रा पर हस्ताक्षर थे, बल्कि हमारे दिल-ओ-दिमाग पर भी अमिट हस्ताक्षर हैं। जब देश में वो प्रधानमंत्री थे, आसपास काम-कारोबार में समृद्धि देखी है, तो उसके लिए किसी उधार के उदाहरण की जरूरत ही नहीं। क्या आसानी से भूल जायेंगे उन्हें जब पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव साहब देश में आर्थिक सुधारों के अगुआ बने तो वित्तमंत्री के रूप में डॉ. मनमोहन सिंह जी ही उस देश हितकारी योजना के मास्टरमाइंड थे।
उच्चस्तर के अर्थशास्त्री
उनको मौनी बाबा भी कहकर आज के ओछे राजनेताओं ने अपमानित करने का प्रयास किया, लेकिन क्या उनके बौद्धिक स्तर का कोई नेता था उनके सामने जिससे वे जिरह करते, आज राजनेता संसद से लेकर आम सभाओं तक में अपनी भाषा पर नियंत्रण नहीं रख पा रहे हैं क्या कोई डॉ. मनमोहन सिंह जी की जुबान से ऐसे शब्दों का कोई ऑडियो या वीडियो क्लिप तलाश सकेगा? ये ही सच है कि वो आज की राजनीतिज्ञ की परिभाषा में कहें तो वो राजनेता नहीं थे। लेकिन वो उच्चस्तर के अर्थशास्त्री जरूर थे, जिनकी उस चुनौतीभरे दौर में जरूरत थी, कांग्रेस नीत गठबंधन का उनको नेता इसीलिए चुना गया था। वर्ना नेता तो कांग्रेस के पास तब भी कम न थे। उस जिम्मेदारी को उन्होंने शांत भाव से अपने कामों को अंजाम देकर निभाया और देश के लिए वो कर दिखाया, जो दूसरे नहीं कर सके। आज आधुनिक भारत की जो तस्वीर हमें आर्थिक सुधारों के बाद दिखाई देती है उसमें रंग भरे थे पीवी नरसिम्हा राव जी और डॉ. मनमोहन सिंह ने अपने-अपने स्तर से। भारत का आज जो बदला सा स्वरूप दिखाई देता है, उसके लिए योजनाबद्ध तरीके से काम किया, तो परिणाम सुखद रहा।
असल जवाबदेही जनता के प्रति
उनको इस बात के लिए भी अपमानित किया गया कि वे यसमैन बनकर रहे, इसको भी गलत तरीके से प्रचारित किया जाता रहा, क्या कोई भी सत्तासीन राजनेता ये भूल जाए कि अपनी जिस पार्टी की नुमाइंदगी वह संसद एवं प्रधानमंत्री के रूप में देश का शासन संभालते हुए कर रहा है, उसकी उस पार्टी का कोई अध्यक्ष भी है, उसकी असल जवाबदेही जितनी जनता के प्रति है, उतनी ही अपनी पार्टी और उसके मुखिया के प्रति भी है। इसको यसमैन कहकर कोई खोट निकाले तो निकालता रहे, लेकिन उनसे वो बेहतर है जो अपने अध्यक्ष को महज कठपुतली भर समझ कर सत्ता के दंभ में चूर होकर राजनीति और सत्ता में काम करते रहे। देश के किसी भी संवैधानिक पद की गरिमा क्या होती है और उसको कैसे पावर में रहकर कायम रखा जा सकता है, वह भी तो डॉ. मनमोहन सिंह जी सिखा गए हैं। इतिहास सबको याद रखता है दस्तावेज बनाकर जिन्होंने कुछ किया उनको भी और जिन्होंने कुछ न किया उनको भी। वर्ष 2004 से 2014 तक के प्रधानमंत्री के रूप में दो कार्यकाल में उन्होंने वो सब किया था, जो उस वक्त देश के लिए जरूरी था। एक महान शख्सियत को शत-शत नमन!
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