Aaj ka Suvichar: भारत के पूर्व राष्ट्रपति, शिक्षाविद और थिंकर डॉ एपीजे अब्दुल कलाम ने अपने वक्तव्यों में कई बार कहा है कि गलतियों से घबराना नहीं चाहिए. गलतियां केवल असफलता नहीं बल्कि सीखने और इनोवेशन की नींव है. यह सीखने और सफलता की राह में पहली सीढ़ी है, जिससे हमें अपनी कमजोरियों, खामियों और कमियों का पता चलता है. दूसरी सीढ़ी है सुधार, जो गलतियों की उस सीख को अमल में लाकर हम सफलता पाते हैं.

हार की गोद में है जीत

डॉ कलाम ने अपनी विश्व प्रसिद्ध पुस्तक में लिखा है कि जब वे इसरो में SLV-3 परियोजना के निदेशक थे, तो 1979 में इस रॉकेट का पहला प्रक्षेपण नाकामयाब रहा था और रॉकेट समुद्र में गिर गया था. इससे सबको निराशा हुई, लेकिन डॉ कलाम ने इसे हार नहीं मानी.

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पहली सीढ़ी है गलती से सीख

उन्होंने इस गलती से सीख ली और इसे अपनी पहली सीढ़ी बनाया. उन्होंने अपनी कमियों का गहराई से विश्लेषण किया और अपनी टीम के साथ मिलकर हर छोटी-बड़ी खामी को पहचाना.

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दूसरी सीढ़ी है सुधार

इतिहास गवाह है कि डॉ कलाम ने उन गलतियों से सीख लिया. जिसका जिक्र उन्होंने कई बार किया है. वे कहते हैं कि उनकी टीम ने उन गलतियों से सीखे गए लेशन और नोट्स को लागू किया और रॉकेट की तकनीक में जरूरी किए गए. परिणाम यह रहा कि एक साल बाद 1980 में SLV-3 का सफल प्रक्षेपण किया गया.

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गलतियों को छिपाएं नहीं

डॉ कलाम का जीवन और काम हम सभी के लिए प्रेरणा है, क्योंकि उनका जीवन हार और जीत का सिलसिला रहा है. वे प्रबुद्ध वैज्ञानिक थे. लेकिन वे मानते थे कि कोइ व्यक्ति हो या ऑर्गनाइजेशन, उन्हें अपनी गलतियों को छिपाने के बजाय उसे स्वीकार कर सुधार करना चाहिए. ऐसे ही लोग दुनिया में एक मिसाल बनते हैं और एक नया इतिहास रचते हैं.

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