देश में इस साल मॉनसून की शुरुआत तो दमदार रही और महज 15 दिनों के भीतर यह 19 राज्यों तक पहुंच भी गया, लेकिन इसके बाद मॉनसून की रफ्तार को मानो किसी की नजर लग गई है. सम विभाग के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, मॉनसून पिछले 11 दिनों से तेलंगाना में ही अटका हुआ है और 8 जून के बाद से एक इंच भी आगे नहीं बढ़ा है.
इस अभूतपूर्व गतिरोध के कारण उत्तर-मध्य भारत के 7 राज्य बारिश के लिए तरस रहे हैं और इन इलाकों में सामान्य के मुकाबले 60% तक कम बारिश रिकॉर्ड की गई है.
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आंकड़ों में समझें सूखे का संकट
1 जून से 18 जून के बीच के देशव्यापी आंकड़े बेहद डराने वाले हैं. इस अवधि में पूरे देश में सामान्य से 38% कम बारिश दर्ज की गई है. राज्यों की बात करें तो मॉनसून की बेरुखी से सबसे खराब स्थिति गुजरात की रही, जहां सामान्य से 79% कम बारिश हुई है. वहीं, महाराष्ट्र में भी हालात बेहद चिंताजनक हैं, यहां सामान्य से 78% कम वर्षा दर्ज की गई है.
हालांकि, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, छत्तीसगढ़, हरियाणा और दिल्ली में रुक-रुक कर प्री-मॉनसून बारिश हो रही है, लेकिन यह भीषण गर्मी को शांत करने के लिए काफी नहीं है. यूपी और राजस्थान समेत इन 7 राज्यों में पारा अभी भी 40 डिग्री सेल्सियस के पार बना हुआ है.
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वो 5 सिस्टम, जिन्होंने रोका मॉनसून का रास्ता
मौसम वैज्ञानिकों के मुताबिक, अमूमन मॉनसून को रोकने के लिए कोई एक फैक्टर जिम्मेदार होता है, लेकिन इस बार एक ही समय पर 5 अलग-अलग सिस्टम ने मिलकर मॉनसून की राह में एक मजबूत दीवार खड़ी कर दी है.
अरब सागर में नमी वाली हवाओं का दम निकलना – भारत में अच्छी बारिश के लिए अरब सागर से आने वाली नम हवाएं मुख्य ईंधन होती हैं, लेकिन इस समय ये हवाएं बेहद कमजोर पड़ चुकी हैं और आगे नहीं बढ़ पा रही हैं.
दक्षिण-पश्चिमी हवाओं की सुस्ती – अरब सागर के ऊपर दक्षिण-पश्चिमी हवाओं की रफ्तार धीमी होने से महाराष्ट्र और उसके आसपास के तटीय इलाकों तक पर्याप्त नमी नहीं पहुंच पा रही है.
कमजोर ‘क्रॉस-इक्वेटोरियल फ्लो’ – भूमध्य रेखा को पार करके भारत की तरफ आने वाली मानसूनी हवाओं में इस बार नमी का स्तर बेहद कम है, जिससे मॉनसून का पूरा सिस्टम कमजोर पड़ गया है.
‘लो-प्रेशर सिस्टम’ का अकाल – मॉनसून को आगे खींचने के लिए अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में मजबूत कम दबाव के क्षेत्र का बनना अनिवार्य होता है, लेकिन दोनों ही समुद्रों में फिलहाल ऐसा कोई मजबूत सिस्टम नहीं बन पा रहा है.
मैडेन-जूलियन ऑसिलेशन (MJO) की बेरुखी – बादलों को आगे बढ़ाने वाला वैश्विक सिस्टम यानी MJO इस समय बेहद कमजोर है. इसका मुख्य काम दक्षिण भारत के समुद्रों से बादलों को उत्तर भारत की ओर धकेलना होता है, लेकिन इसके शांत होने से बादलों का मार्च रुक गया है.
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आगे क्या?
मौसम विभाग को उम्मीद है कि जून के आखिरी हफ्ते में इन प्रणालियों में बदलाव होगा और बंगाल की खाड़ी में नई हलचल शुरू होते ही मॉनसून का यह चक्रव्यूह टूटेगा.
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