कॉकरोच जनता पार्टी नेता अभिजीत दीपके ने दिल्ली के कनॉट प्लेस स्थित सेंट्रल पार्क में ‘लहरा दो तिरंगा’ मार्च से पहले कहा कि कारोबार को नुकसान ‘शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों’ की वजह से नहीं, बल्कि तब होता है जब सरकार पूरे शहर को बंद कर देती है. दीपके का यह बयान तब आया है जब ‘न्यू दिल्ली ट्रेडर्स एसोसिएशन’ ने पार्टियों और प्रदर्शनकारियों से कनॉट प्लेस से दूर विरोध प्रदर्शन करने की अपील की है.
एसोसिएशन का कहना है कि पिछले तीन हफ्तों में हुए विरोध प्रदर्शनों से कारोबार पर बुरा असर पड़ा है. उन्होंने कहा कि इससे कारोबारियों की कमाई पर असर पड़ा है. व्यापारियों के इस संगठन ने शुक्रवार शाम 5 बजे होने वाले प्रस्तावित मार्च को लेकर सुप्रीम कोर्ट का भी दरवाजा खटखटाया है. उन्होंने इलाके में विरोध प्रदर्शनों के चलते कारोबार पर पड़ने वाले असर को लेकर राहत की मांग की है. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका पर तुरंत सुनवाई से इनकार कर दिया. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उम्मीद है कि सभी लोग समझदारी से काम लेंगे.
दीपके ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा है, ‘कारोबार को नुकसान शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों से नहीं होता. नुकसान तब होता है जब सरकार पूरे शहर को बंद करने, इंटरनेट सेवाएं बंद करने, अपने ही नागरिकों के आने-जाने पर रोक लगाने और शहर को वार जोन में बदलाने का फैसला लेती है.’
दीपके ने लंबी पोस्ट में कहा है, ‘अपनी शुरुआत से ही ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ का यह मानना रहा है कि हम हमेशा गांधीजी के शांति और अहिंसा के रास्ते पर चलेंगे और हम अपने इस वादे पर कायम रहे हैं. हमने मुंबई, पुणे, जयपुर, लखनऊ, बेंगलुरु और नागपुर में विरोध प्रदर्शन किए हैं और ये सभी पूरी तरह से शांतिपूर्ण रहे हैं. जयपुर में मुझ पर खुद हमला किया गया था, लेकिन फिर भी मैंने पलटवार नहीं किया क्योंकि हिंसा का जवाब हिंसा से देना हमारे सिद्धांतों के खिलाफ है. हम शारीरिक बल का इस्तेमाल करने के बजाय बीआर अंबेडकर के नेतृत्व में तैयार किए गए संविधान द्वारा दिए गए अधिकारों का उपयोग करना बेहतर समझते हैं. हमारी ताकत संवैधानिक मूल्यों के प्रति हमारी प्रतिबद्धता से आती है और चाहे कितना भी उकसाया जाए हम इन मूल्यों को कभी नहीं छोड़ेंगे.’
साथ ही उन्होंने कहा, ‘इसके बावजूद हमें लगातार ‘अराजकतावादी’ बताने की कोशिश की जाती है, सिर्फ इसलिए क्योंकि हम चुप रहने से इनकार करते हैं. लेकिन सरकार से जवाब मांगना अराजकता नहीं है, सड़कों पर अन्याय के खिलाफ विरोध करना अराजकता नहीं है और सत्ता में बैठे लोगों से सवाल पूछना तो बिल्कुल भी अराजकता नहीं है. ये लोकतंत्र के सबसे बुनियादी रूप हैं.’
इसके अलावा उन्होंने कहा, ‘आज जो पार्टी सत्ता में है उसने विपक्ष में रहते हुए दशकों तक विरोध प्रदर्शन किए, सड़कों पर उतरी और तत्कालीन सरकारों से सवाल पूछे. अगर उस समय उनके खिलाफ भी वैसी ही पाबंदियां लगाई जातीं, उन्हें डराया-धमकाया जाता या पुलिस की सख्ती का सामना करना पड़ता, तो आज सत्ता के पदों पर बैठे कई लोग शायद वहां तक कभी नहीं पहुंच पाते. यह बहुत बड़ा पाखंड है कि जब आप विपक्ष में हों तो विरोध प्रदर्शन को ‘लोकतांत्रिक अधिकार’ मानकर उसका समर्थन करें और जब आप सत्ता में आ जाएं तो उसी काम को ‘सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा’ बताने लगें.
साथ ही दीपके ने कहा, जनता द्वारा चुनी गई सरकार का यह फर्ज है कि वह लोगों की बात सुने, न कि उन्हें चुप कराए.लोकतंत्र सिर्फ वोट की गिनती पूरी होने के साथ खत्म नहीं हो जाता.