आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने पूरी दुनिया में एक नई उम्मीद, एक नई हलचल पैदा कर दी है. ये एक ऐसी डिजिटल क्रांति का शंखनाद है. जिसमें सब कुछ बदलने की भविष्यवाणी की जा रही है . यूपी के सहारनपुर से अमेरिका की सिलिकन वैली तक, बिहार के मधेपुरा से ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न तक, एमपी के बैतूल से जर्मनी के बर्लिन तक, बहस चल रही है कि क्या जेनरेटिव एआई का एडवांस वर्जन इंसान की जगह ले लेगा ? इंसान की तरह गलत-सही के बीच फैसला करने लगेगा? ऐसी बहस के बीच मेरे जेहन में अक्सर सवाल आता रहता है कि क्या हेल्थ सेक्टर में भी AI का इस्तेमाल एक क्रांति की तरह होगा? क्या AI की मदद से गरीबों को सस्ता इलाज मिल जाएगा? क्या कैंसर जैसी बीमारियों के इलाज में एआई मददगार साबित होगा? क्या डायबिटीज और ब्लड प्रेशर जैसी अदृश्य बीमारियों को खत्म करने में एआई एक मेडिकल आर्मी की तरह काम करेगा ? क्या एआई की मदद से इंसान की जिंदगी के दिन लंबे किए जा सकते हैं ? क्या 65-70 साल की उम्र में भी किसी इंसान के शरीर में 25-30 साल के युवा जैसी ताकत बरकरार रखी जा सकती है. आज ऐसे ही सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश करेंगे.
आठ अरब से अधिक आबादी वाली इस दुनिया में ज्यादातर इंसान चाहते हैं कि वो धरती पर ज्यादा से ज्यादा दिनों तक जिंदा रहें . हमेशा के लिए अजर-अमर हो जाएं. इसी साल सितंबर महीने की बात है . चाइना की राजधानी बीजिंग में आर्मी परेड का मौका था. चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और उत्तर कोरिया के किम जोन उन एक साथ मौजूद थे. इस मुलाकात की एक हॉट-माइक बातचीत सोशल मीडिया पर बहुत वायरल हुई. ये तीनों नेता दुनिया की किसी गंभीर समस्या, कूटनीति या राजनीति पर बातचीत नहीं कर रहे थे . ये सभी बात कर रहे थे इंसान की उम्र को लेकर . व्लादिमीर पुतिन का कहना था कि अगर ऑर्गन ट्रांसप्लांट बार-बार किया जाए…तो इंसान न सिर्फ बुढ़ापे को टाल सकता है बल्कि 150 साल तक जिंदा भी रह सकता है. अब सवाल उठता है कि 150 साल जिंदा रहना हकीकत है या फिर एक फसाना? क्या AI की मदद से इंसान की उम्र को बढ़ाया जा सकता है . एक स्टडी में दावा किया गया है कि एआई की मदद से इंसान की जिंदगी के दिन डबल किए जा सकते हैं . 60 से 70 साल की उम्र में भी इंसान का शरीर और दिमाग किसी युवा की तरह काम करेगा?
हर कोई चाहता है कि उसकी जिंदगी के दिन लंबे हों… उम्र के हर पड़ाव उसका शरीर और दिमाग किसी युवा की तरह काम करे…जिससे वो अपने सभी सपनों को जिंदगी में पूरा कर सके. हजारों साल से जिंदगी के दिन बढ़ाने वाली बूटी और दवा की खोज जारी है. आर्युवेद से एलोपैथी तक..योग से अंग प्रत्यर्पण तक के जरिए जिंदगी के दिन लंबे करने का प्रयोग चलता रहा है . एक नई स्टडी के मुताबिक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से आने वाले दिनों में इंसान की जिंदगी के दिन दोगुना किया जा सकता है .
डेटा सोसाइटी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इंसान का शरीर कोशिकाओं से बना है . एक वयस्क इंसान के शरीर में 30 से 40 लाख करोड़ कोशिकाएं होती हैं. कोशिकाओं की सेहत पर ही इंसान की सेहत और जिंदगी निर्भर करती है . किसी इंसान का शरीर इसलिए बूढ़ा होता है. क्योंकि, कोशिकाओं के भीतर मौजूद DNA धीरे-धीरे खराब होने लगता है. लेकिन, शरीर को जब पूरा खाना-पानी और आराम मिलता है तो नई कोशिकाएं बनने में ज्यादा समय लगता है . ऐसे में खराब कोशिकाओं की रिपेयरिंग यानी मरम्मत का काम पीछे छूट जाता है . वैज्ञानिकों ने एक ऐसा तरीका खोज निकाला है – जिसमें शरीर को हल्का झटका दिया जाता है . इससे कोशिकाएं खुद को तेजी से ठीक यानी रिपेयर करने लगती हैं … इसके लिए एक दवा विकसित करने की बात भी सामने आ रही है-जिसका ट्रायल चल रहा है.
AI की मदद यानी नई तकनीक के जरिए इंसानी DNA को पहले से ज्यादा मजबूत और टिकाऊ बनाने की कोशिश हो रही है…दरअसल, परिस्थितियों के मुताबिक जीन के व्यवहार में भी लगातार बदलाव होता रहता है . पहले DNA के व्यवहार पर लगातार एकसाथ नजर रखना संभव नहीं था . लेकिन, AI की मदद से जीन की गतिविधियों को लगातार ट्रैक किया जा सकता है. जिससे ये तय करने में आसानी होती है कि शरीर को किस समय किस तरह की दवा और इलाज की जरूरत है… AI की मदद से मरीज के हिसाब से बिल्कुल सटीक और व्यक्तिगत इलाज मुहैया कराया जा सकता है.
डॉक्टरों की सोच है कि व्यक्ति विशेष के हिसाब से तय इलाज के साइड इफेक्ट कम होते हैं . समय पर बीमारी की पहचान और बीमार कोशिकाओं की इलाज के जरिए इंसान के दिमाग और शरीर की कार्यक्षमता को लंबे समय तक युवा शरीर जैसा बरकरार रखा जा सकता है…लोग सिर्फ लंबा जीवन ही नहीं, बल्कि स्वस्थ और खुशहाल जीवन भी जिएंगे .
डॉक्टरों की सोच है कि आनेवाले दिनों में एआई की मदद से इंसान की औसत उम्र डबल किया जा सकता है यानी इंसान 150 साल की उम्र तक जिंदा रह सकता है. भारत में हमेशा से अच्छी सेहत और लंबी उम्र के फलसफे को आगे बढ़ाया गया, मृत्यु को जीवन का अंत नहीं . जीवन चक्र की पूर्णता बताया गया . आयुर्वेद और आधुनिक विज्ञान भी अमरत्व का मतलब इंसान की औसत उम्र बढ़ाने के तौर पर ही देख रहा है .
अभी दुनिया में औसत LIFE Expectancy करीब 73 साल है. दुनिया के कई हिस्सों में वैज्ञानिक इस नजरिए से काम कर रहे हैं कि लंबी उम्र से अधिक जरूरी है कि बढ़ती उम्र के साथ शरीर में आनेवाली बीमारियों को किस तरह रोका जाए. ऐसा रास्ता निकाला जाए-जिससे लोगों को बढ़ती उम्र के साथ होने वाली डायबिटीज, ब्लडप्रेशर, हार्ट अटैक, कैंसर, पार्किंसंस, अल्जाइमर जैसी बीमारियों से बचाया जा सके…डॉक्टरों की दलील है कि अगर इन बीमारियों से होने वाली असमय मौत से बचाने का रास्ता निकाल लिया गया तो लोगों का औसत जीवन काल अपने आप बढ़ जाएगा .
उम्र बढ़ने की रफ्तार कम करने की दिशा में मेडिकल साइंस में लगातार नए-नए प्रयोग हो रहे हैं . कुछ यहां तक भविष्यवाणी कर चुके हैं कि आनेवाले वर्षों में मेडिकल साइंस, एआई यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस इतना एडवांस हो जाएगा – जिसमें इंसान की औसत उम्र डबल करना असंभव जैसा नहीं होगा .
AI की मदद से इंसान के जीन के व्यवहार पर आसानी से नजर रखी जा सकेगी और हर व्यक्ति के हिसाब से इलाज की व्यवस्था होगी. ऐसे में शरीर को कमजोर करने वाले जीन को ठीक करने में सहूलियत होगी . अगर वैज्ञानिकों का प्रयोग पूरी तरह सफल रहा तो वो दिन दूर नहीं. जब 100 साल की उम्र में भी लोग फुटबॉल और क्रिकेट खेलते दिख सकते हैं. ब्रिटेन के एक मशहूर भविष्यवक्ता यानी Futurologist है–डॉक्टर इयान पियर्सन. इनका आंकलन है कि अगले 25 साल में लोग मरेंगे नहीं . लोग अपना दिमाग कंप्यूटर या फिर रोबोटिक शरीर में अपलोड कर अमर हो जाएंगे . इसी तरह अमेरिका के एक मशहूर कंप्यूटर साइंटिस्ट, कारोबारी, लेखक और भविष्यदृष्टा हैं– Reymond Kurzewil…इनका दावा है कि 2030 तक यानी अगले पांच-छह वर्षों में इंसान अमर हो जाएगा. कर्जबेल का दावा है कि एज-रिवर्सिंग नैनोबोट्स की मदद से इंसान अपनी कोशिकाओं को नष्ट होने से बचा सकेगा… इसे भी अमर होने का नाम दिया जा रहा है . ऐसे में समझते हैं कि वैज्ञानिक और डॉक्टर किसी इंसान के अमर होने की सोच को किस तरह से देखते हैं?
आज की तारीख में अगर किसी को दिल की बीमारी होती है – तो स्टेंट या पेसमेकर लगा दिया जाता है. हार्ट, लीवर, किडनी ट्रांसप्लांट के जरिए लोगों की जिंदगी बचाई जा रही है…किसी इंसान के शरीर में खराब होने वाले अहम अंगों की जगह अब कृत्रिम अंग लगाकर लोगों की उम्र बढ़ाई जा रही है . नैनो बॉट्स की मदद से गंभीर बीमारियों के इलाज की कोशिश चल रही है. दरअसल, नैनो बॉट्स एक बहुत छोटे रोबोट की तरह हैं-जो किसी भी इंसान के शरीर के भीतर गंभीर बीमारियों को ठीक करने में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं .
बढ़ती उम्र के साथ कोशिकाएं थकने लगती हैं. कमजोर होने लगती है…जिससे बढ़ती उम्र के साथ शरीर में कई तरह की बीमारियां घर करने लगती हैं . कई बार संतुलित जीवन शैली के बाद भी जेनेटिक कमियों की वजह से समय से पहले मौत हो जाती है . जेनेटिक यानी आनुवंशिक बीमारियों का इलाज जीन थेरेपी में खोजा जा रहा है. इस थेरेपी में किसी भी व्यक्ति के खराब जीन की बदली या हेरफेर किया जाता है . इसमें तीन बातों पर खास जोर रहता है, पहला- खराब जीन को बदलना, दूसरा- बीमारी का कारण बनने वाले जीन को निष्क्रिय करना, तीसरा- नए जीन को शामिल करना, जिससे शरीर को बीमारी से लड़ने में मदद मिल सके .
डॉक्टरों की सोच है कि जीन थेरेपी उम्र बढ़ने की रफ्तार को धीमा कर सकती है . इंसान के शरीर के भीतर कई ऐसे नैनो बॉट्स लगाए जा सकते हैं – जो शरीर के भीतर बढ़ती एंट्रोपी को रोक दें…इस प्रक्रिय के जरिए इंसान की औसत उम्र जरूर बढ़ाई जा सकती है . दुनिया के जाने माने लेखक मैक्स टैगमार्क की एक किताब है – Life 3.0: Being Human in the Age of Artificial Intelligence इस किताब में टैगमार्क जीवन को तीन हिस्सों में बांटते है. पहला , बैक्टीरियल लाइफ, जिसमें विकसित होते प्राणियों को रखते हैं. दूसरे हिस्से में विकसित इंसानों की बात करते हैं . तीसरे हिस्से में इंसान को बायोलॉजिकल से अधिक टेक्निकल बताते हैं . जिसमें लोग मशीनों को अपने शरीर के अंगों की तरह इस्तेमाल करेंगे . फिलहाल, इंसान जीवन के विकास के तीसरे चरण से गुजर रहा है . मसलन, अगर दिल काम नहीं कर रहा है – तो आर्टिफिशियल हार्ट यानी पेसमेकर के जरिए जिंदगी चल रही है. आने वाले दिनों में इंसान के शरीर में ऐसे नैनो बोट्स सेट किए जा सकते हैं–जो शरीर को बुड्ढा बनाने वाली प्रक्रिया रोक दे या कुछ समय के लिए टाल दे ? लेकिन, लंबी उम्र को साथ-साथ स्वस्थ जीवन भी बहुत जरूरी है. ऐसे में ये समझना भी जरूरी है कि एक अरब चालीस करोड़ आबादी वाले भारत की बड़ी आबादी को सस्ता इलाज मुहैया कराने में AI किस तरह मददगार साबित हो सकता है? आज की तारीख में भारत की गिनती दुनिया की कैंसर कैपिटल के तौर पर हो रह है . कैंसर के मरीज तेजी से बढ़ रहे हैं . ऐसे में सवाल उठता है कि एआई की मदद से कैंसर मरीजों के इलाज में किस तरह मदद मिल सकती है? हाल में भारत में एक ऐसा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस फ्रेमवर्क तैयार किया गया है, जो कैंसर ट्यूमर के भीतर छिपे बायोलॉजिकल प्रोग्राम को एक साथ पढ़ सकता है..जिससे डॉक्टर आसानी से पता लगा सकेंगे कि एक ही स्टेज के दो मरीजों में किसका कैंसर ज्यादा खतरनाक है? कैंसर मरीज को लिए कौन सा इलाज बेहतर रहेगा?
भारत में कैंसर के मरीज सालाना ढाई फीसदी की रफ्तार से बढ़ रहे हैं . विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, भारत में 2022 में कैंसर के कुल 14.1 लाख नए मामले सामने आए…तो कुल 9 लाख से अधिक की मौत हुई . एक लाख लोगों की जांच के दौरान 100 में कैंसर की बीमारी मिल रही है . ऐसे में लोगों को कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से बचाने के लिए एआई की मदद ली जा रही है .
हमारे देश में ब्रेस्ट कैंसर से सालाना 90 हजार महिलाओं की मौत हो रही है… हर 8 मिनट में एक महिला सर्वाइकल कैंसर की वजह से दम तोड़ देती है … लंग कैंसर से भी हर साल 70 हजार भारतीयों की मौत हो रही है . इंसान का शरीर 30 लाख करोड़ से अधिक कोशिकाओं से बना है…सभी कोशिकाएं एक निश्चित पैटर्न से नियंत्रित होकर आगे बढ़ती हैं और अपनी उम्र पूरी कर नष्ट हो जाती हैं… Cells का बनना, बढ़ना और खत्म होना सब अनुशासन के दायरे में होता है . जब ये अनुशासन टूटता है तो शरीर में कैंसर जैसी बीमारी घर बनाने लगती है..200 से अधिक तरह का कैंसर होता है जो शरीर के अलग-अलग अंगों पर अटैक करता है. शरीर में कैंसर की पहचान से लेकर उपचार तक में एआई बहुत कारगर साबित हो रहा है .
हर मरीज के शरीर में कैंसर की वजह और लक्षण एक जैसे नहीं होती..सभी मरीजों के शरीर की इम्युनिटी एक जैसी नहीं होती है. ऐसे में कैंसर के इलाज को अधिक पर्सनलाइज्ड बनाने की दिशा में भारतीय वैज्ञानिकों को बड़ी कामयाबी मिली है. एक ऐसा AI फ्रेमवर्क विकिसत किया गया है..जो कैंसर कोशिकाओं के भीतर की गतिविधियों को डिकोड कर बता सकता है कि ट्यूमर किस वजह से बढ़ रहा है. इससे कैंसर के मेटास्टेसिस, जीन अस्थिरता, थैरेपी रेसिस्टेंस की सटीक पहचान हो सकती है . AI की मदद से ये भी आसानी से समझा जा सकता है कि कौन सा ट्यूमर किन बायोलॉजिकल प्रक्रियाओं से प्रभावित और संचातित हो रहा है .
AI की मदद से कैंसर ट्यूमर की सही वजह पता चलने के बाद उस पर सटीक निशाना साधने वाली दवा या थेरेपी इस्तेमाल की जा सकेगी. कैंसर के ट्यूमर की अगर सही समय पर पहचान हो जाए तो अत्याधुनिक तकनीक के जरिए घंटे भर से भी कम समय में ब्रेन ट्यूमर का इलाज संभव है. साइबर नाइफ तकनीक कैंसर सेल्स पर सर्जिकल स्ट्राइक कर उन्हें खत्म कर देता है .
माना जा रहा है कि आनेवाले दिनों में कैंसर मरीजों के लिए पर्सनलाइज इलाज तय करने में AI बड़ी भूमिका निभा सकता है . इससे कैंसर का इलाज सस्ता होने की भी उम्मीद है . इसी तरह मानसिक बीमारियों के इलाज में भी दिल्ली एम्स में एआई की मदद ली जा रही है . एआई की मदद के मनोरोगियों की मानसिक और शारीरिक
स्थिति से जुड़े डाटा का कम समय में आसानी से विश्लेषण हो रहा है…जिससे हर मरीज के हिसाब से बेहतर इलाज तय करने में डॉक्टरों को सहूलियत हो रही है .
दिल्ली एम्स के डॉक्टरों का मानना है कि मानसिक बीमारियों के इलाज में AI बहुत कारगर साबित हो रहा है. मानसिक रोगियों के इलाज में AI के सभी Method इस्तेमाल किए जा रहे हैं… डॉक्टरों की सोच है कि मरीज शुरुआती दौर में ही अपनी समस्याएं बिना हिचकिचाहट के AI चैटबॉट को बता सकेंगे…इससे समय पर लोगों को इलाज मिल सकेगा . इसी तरह डायबिटीज जैसी बीमारियों के इलाज में भी AI का बहुत प्रभावी तरीके से इस्तेमाल हो रहा है. अब ये जानना-समझना भी जरूरी है कि मेडिकल क्षेत्र में एआई किस तरह के क्रांतिकारी बदलाव की ओर बढ़ रहा है. सवाल ये भी उठ रहा है कि क्या आने वाले दिनों में AI डॉक्टरों की जगह ले लेगा?
भारत में डायबिटीज मरीजों की संख्या करीब 10 करोड़ से अधिक है. ये एक ऐसी अदृश्य बीमारी है- जो धीरे-धीरे इंसानी शरीर को खोखला बना देती है. डायबिटीज मरीजों के इलाज में भी एआई का इस्तेमाल हो रहा है . इसी तरह हमारे देश में ब्लडप्रेशर के मरीजों की संख्या 21 करोड़ से अधिक है . ये भी शरीर में पलने वाली एक ऐसी बीमारी है – जो बढ़ने के साथ कई जानलेवा बीमारियों की वजह बनती है . ऐसे में मरीज के शरीर में ब्लडप्रेशर बढ़ने की वजह से लेकर उपचार तक डॉक्टरों ने एआई की मदद लेना शुरू कर दिया है . आज की तारीख में कई ऐसी बीमारियां है- जिनको किसी मरीज के शरीर में जड़ से खत्म करने के लिए AI का इस्तेमाल हो रहा है .
सवाल ये भी उठ रहा है कि अगर एआई ही मरीजों का इलाज करने लगेगा ? मरीज को बीमारी के हिसाब से दवाईयां बताने लगेगा तो फिर डॉक्टरों की क्या जरुरत है ? क्या भविष्य में AI आधारित रोबोट डॉक्टरों की जगह ले लेगा? डॉक्टरों के एक बड़े वर्ग की सोच है कि एआई बीमारी की पहचान में मददगार की भूमिका में रहेगा. इलाज को आसान बनाने की प्रकिया में रहेगा. मरीजों के लिए बेहतर इलाज के चुनाव में मददगार की भूमिका में रहेगा . लेकिन, एआई खुद डॉक्टर नहीं बन जाएगा. एआई की मदद से डॉक्टर और बेहतर इलाज कर सकेंगे .
डॉक्टरों के एक वर्ग का मानना है कि अभी मेडिकल क्षेत्र में AI का इस्तेमाल शुरू ही हुआ है. अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है . जो भी इनपुट या डाटा एआई में फीड किया जाएगा, जवाब उसी के आधार पर आएगा . ऐसे में डॉक्टरों की सोच हैं कि जब किसी इंसान की जिंदगी का सवाल हो तो सिर्फ एआई के आधार पर फैसला लेना आसान नहीं होगा. हालांकि,ये दलील भी दी जा रही है कि AI की मदद से दवा बनाने में आसानी होगी और क्लिनिकल ट्रायल में वर्षों नहीं लगेंगे . एक अनुमान के मुताबिक, किसी बीमारी की एक दवा विकसित करने में 10 से 15 साल का समय लगता है. किसी नई दवा के रिसर्च एंड डेवलपमेंट में बहुत मोटा खर्च करना पड़ता है. एआई के इस्तेमाल के जरिए दवा बनाने की प्रक्रिया को कम समय और कम खर्च में पूरा किए जाने की संभावना बढ़ी है .
हाल में IIT मद्रास ने एक नया AI फ्रेमवर्क PURE विकसित किया है. दावा किया जा रहा है कि ये दवा बनाने की शुरुआती प्रक्रिया को बहुत तेज और कम खर्चीला बना सकता है. मौजूदा समय में एक नई दवा विकसित करने में अरबों रूपये और 10 से 15 साल का वक्त लगता है. नया AI फ्रेमवर्क ठीक उसी तरह काम करता है – जैसे कैमिकल वैज्ञानिक सोचता है . ऐसे में अनुमान लगाया जा रहा है कि नई तकनीक कैंसर और दूसरी संक्रामक बीमारियों के लिए नई दवा विकसित करने में मददगार साबित हो सकता है . माना जा रहा है कि AI फ्रेमवर्क PURE तकनीक फर्मा इंडस्ट्री में नई क्रांति ला सकती है .
Google DeepMind की एक कंपनी Isomorphic Labs AI की मदद से दवा की खोज की प्रक्रिया को आसान, सस्ता और तेज बनाने की मुहिम में जुटी है . कंपनी फिलहाल, कैंसर और इम्यूनोलॉजी जैसी गंभीर बीमारियों को फोकस कर दवा विकसित करने के मिशन में जुटी है .
तेजी से बदलती दुनिया और बढ़ती उम्र के साथ नई बीमारियां भी सामने आ रही हैं. ऐसे में दुनिया की बड़ी आबादी को फिट रखने के लिए नई दवाओं की जरूरत होगी . एक अनुमान के मुताबिक, 2027 तक दवाओं पर दुनिया भर में 1.9 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा खर्च होने का अनुमान है . ऐसे में नई दवाओं को विकसित करने की प्रक्रिया में तेजी समय की मांग है . माना ये भी जा रहा है कि दवा विकसित करने में AI के इस्तेमाल से लोगों के इलाज के लिए सस्ती दवा मिलने का रास्ता भी साफ होगा.
वैज्ञानिकों की सोच है कि दवा के गुणों का पूर्वानुमान लगाने, क्लिनिकल ट्रायल के असर का प्रभावी उपयोग और विश्लेषण, पर्सनलाइज दवा विकसित करने में एआई मददगार साबित हो सकता है . कोरोना महामारी के दौरान mRNA वैक्सीन रिसर्च में AI के इस्तेमाल की बात सामने आई थी . दुनिया की पहली जनरेटिव एआई आधारित दवा रेंटोसर्टिब इंसिलिको मेडिसिन द्वारा विकसित की गई थी. एस्ट्राजेनेका ने बेनेवोलेंट एआई की मदद से दवा विकसित करने की समयसीमा को कम किया. नई दवा के लिए डाटा जुटाने से रिसर्च के काम तक में AI मददगार की भूमिका में है . पड़ोसी मुल्क चीन ने AI की मदद से अपने यहां कम समय में नई दवा विकसित कर रहा है . अमेरिका में भी इस क्षेत्र में बहुत तेजी से काम चल रहा है . भारत में सस्ती और बेहतरीन दवा तैयार करने के लिए सभी संभावनाएं मौजूद हैं . एआई की मदद से नई दवाएं विकसित करने की मुहिम तेज कर भारत अपने फार्मास्युटिकल सेक्टर को बड़ा विस्तार दे सकता है .
भारत में दुनिया की फार्मेसी बनने की पूरी संभावना है . भारत सबसे सस्ती दवा बना कर पूरी दुनिया की सेहत दुरुस्त करने में अहम भूमिका निभाने की दहलीज पर खड़ा है . संभावना, ये भी जताई जा रही है कि बीमारियों की पहचान और उपचार में एआई चैटबॉट नए जमाने के डॉक्टर की तरह लोगों के बीच होगा . लेकिन, सवाल ये भी है कि अगर किसी मरीज की मेडिकल हिस्ट्री का गलत डाटा फीड हो गया और AI ने गलत या अधूरे डाटा के आधार पर उपचार बता दिया. गलत दवा या फिर इलाज की वजह से मरीज की जान चली गई तो जिम्मेदारी किसकी होगी? हमारे देश में नकली दवाओं के पकड़े जाने की ख़बरें भी अक्सर आती रहती हैं. आम आदमी के लिए फर्क करना बहुत मुश्किल है कि कौन सी दवा असली है और कौन नकली ? ऐसे में सवाल ये भी है क्या AI की मदद से बाजार में नकली दवाओं की एंट्री रोकने में मदद मिलेगी ? लंबी जिंदगी हमेशा से इंसान का सपना रही है . कुदरत के बनाए हांड-मांस के शरीर की कमियों को मशीनों के जरिए ठीक कर जिंदगी को लंबी करने के लिए नए-नए प्रयोग जारी है. कोशिकाओं में छिपे उन रहस्यों को भी खोजने की कोशिश हो रही है, जो किसी इंसान के शरीर को समय के साथ कमजोर यानी बुढ़ा बनाते हैं… इस रिसर्च की रफ्तार बढ़ाने में AI नई भूमिका में है. आजादी के समय हमारे देश में Life Expectancy 32 साल थी. जो पिछले 78 वर्षों में बढ़कर 73 साल पर आ गई है यानी डबल से भी अधिक. ऐसे में अगर AI की मदद से बेहतर इलाज की सुविधाओं के दम पर इंसान की जिंदगी के दिन डबल हो जाएं तो बहुत हैरानी की बात नहीं है.










