मानव सभ्यता के हर कालखंड में अयोध्या का जिक्र एक ऐसी कालजयी नगरी के रूप में हुआ है, जो समाज को मुश्किलों से लड़ने और बेहतरी का रास्ता दिखाती रही है . महर्षि वाल्मीकि ने रामायण में अयोध्या की तुलना स्वर्ग से की,उनकी अयोध्या न्याय और समानता की प्रतीक है. महाकवि कालिदास रघुवंशम में अयोध्या को दुनिया की पहली लोक प्रसिद्ध राजधानी बताते हैं . गोस्वामी तुलसीदास रामचरितमानस में अयोध्या को भक्ति और अध्यात्म का सबसे बड़ा केंद्र मानते हैं. वहीं, कबीर जैसे सूफी संत अयोध्या को प्रेम और सर्वधर्म संभाव के प्रतीक के तौर पर देखते हैं. हिंदी साहित्य के पुरोधा मैथिलीशरण गुप्त अपनी रचनाओं में अयोध्या को त्याग, प्रेम और पारिवारिक मूल्यों का आइना बताते हैं .

इसी अयोध्या की मिट्टी में पैदा हुए श्रीराम को मशहूर शायर अल्लामा इकबाल इमाम-ए-हिंद करते हैं. वो अपनी एक नज़्म में कहते हैं -

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है राम के वजूद पे हिंदोस्तां को नाज़
अहल-ए-नज़र समझते हैं इसको को इमाम-ए-हिंद

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6 दिसंबर, 1992 के बाद अयोध्या की तासीर बदल गयी . अयोध्या को आस्था के केंद्र के साथ-साथ वोट बैंक बढ़ाने वाले मुद्दे के तौर पर देखा जाने लगा . एक ओर अयोध्या में भव्य राम मंदिर का सपना और दूसरी ओर अयोध्या के नाम पर राजनीति दोनों साथ-साथ आगे बढ़ रहे थे, अयोध्या वोट बैंक पॉलिटिक्स का नए रनवे में तब्दील हो चुकी थी . अब आगे की कहानी. आखिर कैसे पूरा हुआ अयोध्या में राम मंदिर का सपना?

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अयोध्या 6 दिसंबर, 1992 की घटना को हमेशा अलग-अलग चश्मे से देखने की कोशिश होती रही है. बाबरी ढांचा जब गिराया जा रहा था – तब केंद्र की नरसिम्हा राव सरकार और यूपी की कल्याण सिंह सरकार की भूमिका को भी अलग-अलग लेंस से देखने और समझने की कोशिश होती है. बतौर मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने पुलिस अफसरों को साफ-साफ निर्देश दिया था कि कारसेवकों पर गोली नहीं चलानी है. उन्होंने 6 दिसंबर, 1992 की घटना की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए शाम में ही मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया , ऐसे में बाबरी ढांचा गिरने के बाद केंद्र की नरसिम्हा राव सरकार के सामने दो बड़ी चुनौतियां थी.

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पहली, विवादित स्थल के पास यथास्थिति बहाल रखना. दूसरी,ये तय करना कि क्या मस्जिद से पहले वहां कोई मंदिर था? यूपी में राष्ट्रपति शासन लगा हुआ था. ऐसे में सारी जिम्मेदारी केंद्र सरकार की थी. राव सरकार ने एक अध्यादेश के जरिए रामलला की सुरक्षा के नाम पर आसपास की करीब 67.7 एकड़ जमीन Acquire यानि अधिग्रहीत की. यह अध्यादेश संसद ने 7 जनवरी, 1993 को एक कानून के जरिए पारित किया . इसी दौर में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉक्टर शंकर दयाल शर्मा ने संविधान की धारा 143 के तहत सुप्रीम कोर्ट को एक सवाल रेफर किया . सवाल था- क्या जिस स्थान पर ढांचा खड़ा था वहां बाबरी मस्जिद के निर्माण से पहले कोई हिन्दू मंदिर या हिन्दू धार्मिक इमारत थी?

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अयोध्या में जमीन अधिग्रहण को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती

अयोध्या में विवादित स्थल के आसपास जमीन अधिग्रहण और प्रेसीडेंसियल रेफरेंस दोनों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गयी . सितंबर 1993 में पांच जजों की स्पेशल बेंच ने इस पर सुनवाई शुरू की , सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में जमीन अधिग्रहण को सही ठहराया. लेकिन, प्रेसीडेंसियल रेफरेंस पर राय देने से मना कर दिया, साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने दूसरे ममलों को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच को सौंप दिया .

दूसरी ओर, 6 दिसंबर 1992 को बाबरी ढांचा गिराए जाने के बाद राम जन्मभूमि थाने में दर्ज FIR नंबर 197 और 198 पर कार्रवाई जारी थी , FIR नंबर 197 में कारसेवक और FIR नंबर 198 में नामजद थे लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, विनय कटियार, उमा भारती, साध्वी ऋतंभरा समेत कई दूसरे नेता , केस की सुनवाई के लिए पहले ललितपुर में स्पेशल कोर्ट गठित की गई,बाद में यह रायबरेली ट्रांसफर कर दी गई , सभी केस सीबीआई को जांच के लिए दे दिए गए . बाद में यूपी सरकार ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की सलाह के बाद बाबरी ढांचे को गिराए जाने से जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए लखनऊ में स्पेशल कोर्ट का गठन किया . अयोध्या से जुड़े कई केस अदालतों में पड़े हुए थे . हर दिन अयोध्या मामले से जुड़ी ख़बरें अख़बारों में सुर्खियां बन रही थी,तो अयोध्या के नाम पर सियासी तवे को गर्म करने की कोशिशें भी जारी रहीं .

खुदाई में मस्जिद के नीचे मिले मंदिर से मिलते-जुलते अवशेष

अप्रैल 2002 में अयोध्या के विवादित स्थल पर मालिकाना हक को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट की तीन जजों की बेंच ने सुनवाई शुरू की . बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्देश पर ASI ने खुदाई की, जिसमें दावा किया गया कि मस्जिद के नीचे मंदिर से मिलते-जुलते अवशेष के प्रमाण मिले हैं. ASI की रिपोर्ट में कहा गया कि ध्वस्त ढांचे की दीवारों से 5 फीट लंबी और 2.25 फुट चौड़ी पत्थर की एक शिला मिली . जिस पर बारहवीं सदी में संस्कृत में लिखीं 20 पंक्तियां उकेरी गयी थीं,मलबे से हिंदू देवी-देवताओं की कई मूर्तियां भी बरामद हुईं . कई दूसरी चीजें भी मिलीं- जिसके बाद हिंदूवादी संगठनों की दलीलों को नई ताकत मिली.

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जुलाई 2005 में अयोध्या के विवादित स्थल पर हमला

वक्त का पहिया तेजी से आगे बढ़ रहा था . बात जुलाई 2005 की है.. पांच आतंकवादियों ने विस्फोटकों से भरी एक जीप का इस्तेमाल करते हुए विवादित स्थल पर हमला किया, जवाबी कार्रवाई में सभी आतंकी मारे गए,अयोध्या में विवादित स्थल के आसपास सुरक्षा घेरा और कड़ा कर दिया गया . जून 2009 में लिब्राहन कमीशन ने अपनी जांच रिपोर्ट सौंप दी. संसद में जमकर हंगामा हुआ,क्योंकि रिपोर्ट में बीजेपी, विश्व हिंदू परिषद् और बजरंग दल के नेताओं की भूमिका पर सवाल उठाए गए थे .

विवादित ढांचे के संबंध में ऐतिहासिक फैसला

30 सितम्बर, 2010 को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने विवादित ढांचे के संबंध में ऐतिहासिक फैसला सुनाया, जस्टिस धर्मवीर शर्मा, जस्टिस सुधीर अग्रवाल और जस्टिस एसयू खान ने एकमत से माना कि जहां रामलला विराजमान हैं, वही श्रीराम की जन्मभूमि है . इलाहाबाद हाईकोर्ट ने विवादित जमीन को तीन हिस्सों में बांटा,.इसमें एक हिस्सा रामलला, दूसरा सुन्नी वक्फ बोर्ड और तीसरा निर्मोही अखाड़े को मिला .

इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को मानने से इनकार

अयोध्या केस से जुड़े तीनों पक्ष यानी निर्मोही अखाड़ा, सुन्नी वक्फ बोर्ड और रामलला विराजमान ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को मानने से इनकार कर दिया . इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ पहुंच गए सुप्रीम कोर्ट, देश की सबसे बड़ी अदालत ने जमीन बंटवारे पर रोक लगा दी और यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया. वक्त तेजी से आगे बढ़ रहा. लेकिन,अयोध्या की गुत्थी सुलझ नहीं पा रही थी . न सुप्रीम कोर्ट के कहने पर मध्यस्थता से, न सियासी पहल से, न संत-समाज से

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मोदी के पीएम बनते ही अयोध्या फिर से सुर्खियों में

दिल्ली में सत्ता का मिजाज बदला. प्रचंड बहुमत से प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे नरेंद्र मोदी . हिंदुत्व के सबसे चमकदार पोस्टर ब्वॉय . विश्व हिंदू परिषद समेत दूसरे हिंदूवादी संगठनों ने नए सिरे से रामधुन तेज कर दी, अयोध्या फिर से सुर्खियों में आ गयी . सुप्रीम कोर्ट ने भी अयोध्या केस में तेज सुनवाई का फैसला किया, 40 दिनों तक इस केस से जुड़े पक्षों ने अपनी दलील रखी, 9 नवंबर, 2019 के देश की सबसे बड़ी अदालत ने अयोध्या केस में फैसला सुना दिया .

करीब 1500 वर्ग गज जमीन के मालिकाना हक के लिए लंबी लड़ाई जारी थी , अब मामला देश की सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट में था. धर्म, इतिहास, आस्था और राजनीति के घालमेल ने अयोध्या झगड़े को बहुत उलझा दिया था,

मामले को मध्यस्थता के जरिए सुलझाने की कोशिश

कई बार अदालत के बाहर यानी मध्यस्थता के जरिए अयोध्या केस को सुलझाने की कोशिशें हुईं . लेकिन, कोई खास नतीजा नहीं निकला . सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मामले को मध्यस्थता के जरिए सुलझाने की कोशिश की..तीन मध्यस्थों वाले पैनल का गठन कर दिया . मध्यस्थता पैनल को 8 हफ्ते का वक्त दिया गया . लेकिन, जब बात नहीं बनी तो सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में रोजाना सुनवाई का फैसला लिया .

तत्कालीन चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली 5 सदस्यीय संविधान पीठ ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के सितंबर, 2010 के फैसले के खिलाफ दायर अपीलों पर 6 अगस्त से रोजाना 40 दिन तक सुनवाई की, इस दौरान सभी पक्षों ने अपनी-अपनी दलील रखी . 40 दिन तक सुनवाई के दौरान सभी पक्षों की दलील सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की संविधान पीठ जब अयोध्या विवाद का फ़ैसला लिख रही थी तो उसके सामने चंद सवाल थे

  • विवादित 2.77 एकड़ ज़मीन पर किसका मालिकाना हक़ है?
  • क्या विवादित ज़मीन पर मुस्लिम पक्षकारों का दावा पुख्ता है या फिर
  • विवादित ज़मीन पर हिंदू पक्षकारों का मालिकाना हक है?

सुप्रीम कोर्ट ने मालिकाना हक पर सुनाया फैसला

सुप्रीम कोर्ट में चल रही कानूनी लड़ाई जमीन पर मालिकाना हक को लेकर थी . विवादित जमीन पर मालिकाना हक उसी को मिलता- जिसके पास विवादित जमीन पर कब्जा साबित होता . सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की बेंच के सामने सब कुछ शीशे की तरह साफ था- तीन गुंबदों वाली आकृति यानी बाबरी मस्जिद के अहाते पर मुस्लिमों का अधिकार था, जबकि इस अहाते से बाहर बने राम चबूतरे, सीता रसोई और दूसरे हिस्से पर हिंदुओं का, ज़मीन का ये पूरा हिस्सा 2.77 एकड़ का था. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में कहा कि विवादित जगह के बाहरी हिस्से पर हिंदू पक्ष का निर्विवाद कब्ज़ा था..अंदरूनी भाग-जिसमें बाबरी मस्ज़िद बनी थी,उसे लेकर मुस्लिम और हिंदू पक्ष में विवाद था..आख़िरकार सबूतों, गवाहों, ऐतिहासिक तथ्यों और ASI की रिपोर्ट के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने रामलला को विवादित ज़मीन का मालिकाना हक़ सौंप दिया .

मुस्लिम पक्ष को भी मस्जिद के लिए पांच एकड़ जमीन

मुस्लिम पक्षकार ये साबित करने में असफल रहे कि विवादित ढांचे पर उनका मालिकाना हक़ है. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में मुस्लिम पक्ष को भी मस्जिद के लिए पांच एकड़ जमीन देने का फैसला सुनाया . अयोध्या केस में फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कई तीखी टिप्पणी भी की, कोर्ट ने साफ़ कहा कि 1949 में विवादित ढांचे के अंदर रामलला की मूर्ति रखा जाना गलत और अपवित्र काम था, इसी तरह, 1992 में बाबरी ढांचे का ढहाया जाना सीधे-सीधे कानून का उल्लंघन था . सुप्रीम कोर्ट से भारत का सबसे उलझा मामला सुलझ गया. देश की सबसे बड़ी अदालत ने अयोध्या में श्रीराम मंदिर के लिए ट्रस्ट बनाने का आदेश दिया तो मुस्लिम पक्ष को मस्जिद के लिए पांच एकड़ जमीन देने का फैसला हुआ .

राम मंदिर तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का गठन

केंद्र की मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट की ओर से तय डेडलाइन के हिसाब से राम मंदिर तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का गठन कर दिया, यूपी की सत्ता में आने के बाद से ही योगी सरकार ने अयोध्या पर खासतौर से ध्यान देना शुरू कर दिया था, समय चक्र आगे बढ़ा कोरोना महामारी ने पूरी दुनिया की रफ्तार पर ब्रेक लगा दिया. लेकिन, अयोध्या में राम मंदिर निर्माण की प्रक्रिया आगे बढ़ती रही, इसके बाद शिलान्यास की तारीख तय हुई 5 अगस्त, 2020, प्रधानमंत्री मोदी ने भूमि पूजन कर मंदिर की आधारशिला रखी.

भव्य-राममंदिर का मॉडल फाइनल

कलियुग में अयोध्या का त्रेताय़ुग वाला वैभव लौटाने के लिए तूफानी रफ्तार से काम शुरू हुआ,सरयू के घाट को इस तरह सजाने-संवारने का काम शुरू हुआ-जैसे अयोध्या में बदलाव के कई रंग देखने वाली सरयू के घाटों का स्वर्ण युग शुरू हो रहा हो, राम मंदिर तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने अयोध्या में बनने वाले भव्य-राममंदिर का मॉडल फाइनल कर दिया .

नृपेंद्र मिश्रा कहते हैं कि जब ट्रस्ट बन गया और उच्चतम न्यायालय के निर्णय से कंस्ट्रक्शन कमेटी का अध्यक्ष बनाया जाना था और मुझे बनाया गया जी उस समय भी जो नक्शा था मंदिर का उसमें प्रथम तल और दूसरा तल नहीं था, उस समय भी जो नक्शा था उसमें शिखर की ऊंचाई 161 फीट नहीं थी. उस समय जो नक्शा था उसमें पांच मंडप नहीं थे, एक छोटे सा मंदिर की कल्पना की गई थी, लेकिन जनवरी 2020 में तय हुआ कि भव्य मंदिर बनना है. जनवरी 2020 में जब ट्रस्ट को यह जिम्मेदारी मिली और हमें भी वह जिम्मेदारी सौंपी गई चेयरमैन ऑफ कंस्ट्रक्शन कमेटी तो हम लोगों की कई बैठकें हुई इसी कमरे में कम से कम मुझे याद पड़ता है पांच से सात बैठकें हुई थी .

भव्य राम मंदिर निर्माण के लिए भूमिपूजन

राम मंदिर तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की देखरेख में मंदिर निर्माण की प्रक्रिया आगे बढ़ी और समयचक्र के साथ शिलान्यास की तारीख तय हुई 5 अगस्त, 2020. प्रधानमंत्री मोदी ने अभिजीत मुहूर्त में श्रीराम जन्मभूमि में भव्य राम मंदिर निर्माण के लिए पूरे विधि-विधान के साथ भूमि पूजन किया और आधार शिला भी रखी . ये वो दौर था जब कोरोना महामारी के खौफ में पूरी दुनिया थी, कोरोना वायरस ने लोगों की सांसों पर संकट पैदा कर दिया था . लेकिन, राम मंदिर निर्माण की दिशा में कदम तेजी से आगे बढ़ रहा था . भूमिपूजन के मौके पर प्रधानमंत्री मोदी का संदेश साफ था . राममंदिर के बाद देश का आम आदमी की ख्वाहिश क्या है? ये बात भी प्रधानमंत्री मोदी अच्छी तरह समझ रहे थे . संभवत: इसीलिए पीएम मोदी ने राममंदिर निर्माण की प्रक्रिया को राष्ट्र को जोड़ने वाला उपक्रम बताया .

भूमि पूजन के बाद क्या बोले पीएम मोदी?

अयोध्या में भूमिपूजन कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कहा कि राम मंदिर अनंतकाल तक पूरी मानवता को प्रेरणा देगा…उस मौके पर पीएम मोदी ने श्रीराम को परिवर्तन और आधुनिकता का पक्षधर बताया . ऐसे में अयोध्या में एक भव्य-दिव्य राम मंदिर का निर्माण शुरू हो गया , अयोध्या को इस तरह सजाने-संवारने का काम शुरू हुआ-जिसमें आधुनिकता और परंपरा का संगम साफ-साफ दिख रहा था. नागर शैली में बने श्रीराम के मंदिर में लोहे का बिल्कुल इस्तेमाल नहीं हुआ. सूर्य किरणों द्वारा रामलला के अभिषेक का रास्ता निकाला गया, राम मंदिर के उद्घाटन और प्राण प्रतिष्ठा के लिए तारीख तय हुई – 22 जनवरी, 2024

अयोध्या में श्रीरामलला के भव्य मंदिर का इंतजार खत्म

पूरी दुनिया की नजरें अयोध्या पर टिकी हुई थीं . अयोध्या का अलौकिक और आधुनिक अवतार दुनिया के सामने था..श्रीराम की नगरी चमक-दमक रही थी, करोड़ों रामभक्तों का अयोध्या में श्रीरामलला के भव्य मंदिर का इंतजार खत्म हुआ - ये परंपरा और आधुनिकता का मेल था. नागर शैली में राम मंदिर का इस तरह निर्माण हुआ- जिससे हजार साल तक मंदिर अपने मौजूदा स्वरुप में खड़ा रहे . अयोध्या में बना राममंदिर तीन मंजिला है - जिसमें 392 सुंदर नक्काशीदार पत्थरों के स्तंभ और 44 भव्य द्वार बनाए गए,हर स्तंभ खास है. मंदिर की ऊंचाई 161 फीट है और मुख्य गर्भगृह में 5 साल के श्रीरामलला विराजमान हैं .

रामलला के प्राण प्रतिष्ठा समारोह में मुख्य यजमान बने पीएम मोदी

मंदिर के उद्घाटन और रामलला के प्राण प्रतिष्ठा समारोह में मुख्य यजमान की भूमिका में थे - प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी . ये इतिहास का वो लम्हा था - जब अयोध्या की धरती पर हर क्षेत्र से ताल्लुक रखने वाली प्रभावशाली हस्तियां मौजूद थी , श्रीराम मंदिर के उद्घाटन की साक्षी बनीं . इस खास मौके पर प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि आज हमारे राम आए हैं . श्रीराम आग नहीं ऊर्जा हैं . हज़ारों साल से श्रीराम हमारे समाज को चुनौतियों से लड़ने का रास्ता दिखाते रहे हैं , हाशिए पर खड़े लोगों को मुख्यधारा में लाने का फलसफा सिखाते रहे हैं . लेकिन, श्रीराम की अयोध्या हमेशा चर्चा में रही है . चर्चा में बने रहना संभवत: अयोध्या की नियति रही है .

अब श्रीराम की अयोध्या चढ़ावे में चोरी को लेकर चर्चा में

जब श्रीराम मंदिर के उद्घाटन की तारीख तय हुई, तब न्यौता और अधूरे मंदिर के उद्घाटन को लेकर चर्चा हुई . कहा गया कि चुनावी फायदा लेने के लिए अधूरे राम मंदिर का जल्दबाजी में उद्घाटन हुआ , अयोध्या की तस्वीर बदलने लगी . अयोध्या में राम मंदिर का इंतजार खत्म हुआ . उसके बाद बारी थी – लोकसभा चुनाव की . चुनावी रैलियों और सभाओं में एक सुर बहुत जोर-शोर से सुनाई देने लगा. .. जो राम को लाए हैं, हम उनको लाएंगे . अयोध्या के नाम पर प्रचंड बहुमत हासिल करने की एक बार फिर कोशिश हुई. इसमें किसे और कितनी कामयाबी मिली–इसका विश्लेषण सभी अपने-अपने हिसाब से करते हैं. तीर्थ क्षेत्र अयोध्या को टेंपल टूरिज्म के नजरिए से भी देखा जाने लगा, अब श्रीराम की अयोध्या चढ़ावे में चोरी को लेकर चर्चा में है .

चर्चा में बने रहना शायद श्रीराम की अयोध्या की नियति

एक सच ये भी है कि भारत के आम आदमी ने अपने लिए श्रीराम के दौर जैसी अयोध्या का सपना देखा था– रामराज्य का सपना देखा था- जिसमें किसी को भी दैहिक, दैविक या भौतिक परेशानी न हो, लेकिन, आम आदमी का रामराज्य का सपना अभी अधूरा है . ऐसे लगा जैसे राम मंदिर बनने के बाद अयोध्या का विवादों से नाता खत्म हो गया , लेकिन, हमेशा चर्चा में बने रहना शायद श्रीराम की अयोध्या की नियति रही है,जो बदस्तूर जारी है . मैं अयोध्या हूं में बस इतना हीं, फिर मिलेंगे किसी ऐसे मुद्दे के साथ, जिसे जानना और समझना हम सबके लिए जरूरी होगा .