हिंदी न्यूज़/भारत एक सोच/दर्द ए बिहार: क्या बिहार में अपराधियों को कानून और पुलिस का डर नहीं रहा, क्यों बढ़ रहा क्राइम?
भारत एक सोच
दर्द-ए-बिहार: क्या बिहार में अपराधियों को कानून और पुलिस का डर नहीं रहा, क्यों बढ़ रहा क्राइम?
बिहार, जहां से बुद्ध ने ज्ञान और गांधी ने सत्याग्रह शुरू किया, आज अपराध की मार झेल रहा है। 2015 से 2024 तक अपराध के मामलों में 80% की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। हर महीने औसतन 229 हत्याएं हो रही हैं। यह आंकड़े बताने के लिए काफी हैं कि राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति चिंताजनक हो गई है। 2005 में जंगलराज हटाने के वादे के साथ सत्ता में आए नीतीश कुमार को 20 साल हो गए हैं, लेकिन अब फिर से अपराधियों की बहार दिख रही है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या 20 साल का समय किसी सूबे की कानून -व्यवस्था को ठीक करने के लिए कम होता है? क्या नीतीश कुमार की पुलिस का इकबाल खत्म हो गया है?
क्या बिहार में अपराधियों को कानून और पुलिस का डर नहीं रहा?
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बिहार की धरती पर भगवान बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ। बिहार की ही धरती से चक्रवर्ती अशोक ने दुनिया को युद्ध की जगह शांति का संदेश दिया। बिहार के नालंदा और विक्रमशिला विश्वविद्यालय ने दुनिया के ज्ञान से रोशन किया। इसी बिहार की धरती से महात्मा गांधी ने अंग्रेजों के खिलाफ देश में सत्याग्रह और अहिंसा का सफल प्रयोग किया। इसी बिहार की धरती से जयप्रकाश नारायण ने संपूर्ण क्रांति का नारा दिया। आज उसी बिहार को कोई भारत की क्राइम कैपिटल बता रहा है तो कोई महाजंगलराज कह रहा है।
बिहार में हर महीने औसतन 229 मर्डर
आंकड़ों के हिसाब से देखा जाए तो साल 2015 से 2024 तक बिहार में अपराध के मामलों में 80.2% की बढ़ोतरी हुई है। जबकी, इस दौरान राष्ट्रीय औसत 23.7% रहा। पूरा देश तब सन्न रह गया जब जुलाई महीने में 5 अपराधी हथियार लहराते हुए पटना के पारस अस्पताल में घुसे और इलाज के लिए लाए गए सजायाफ्ता कैदी चंदन मिश्रा को गोलियों से भून दिया। पटना में बालू कारोबारी रमाकांत यादव की गोली मारकर हत्या कर दी गई। जुलाई के पहले हफ्ते में बिजनेसमैन गोपाल खेमका की भी पटना में हत्या कर दी गई। ये तो हुए कुछ चर्चित मर्डर केस, जो टीवी और न्यूज पेपर में हेडलाइन बने लेकिन जनवरी से जून तक के आंकड़े बताते हैं कि बिहार में हर महीने औसतन 229 मर्डर हो रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या 20 साल का समय किसी सूबे की कानून -व्यवस्था को ठीक करने के लिए कम होता है? क्या नीतीश कुमार की पुलिस का इकबाल खत्म हो गया है? क्या बिहार के अपराधियों को कानून का डर नहीं रहा? जब लोगों के जान-माल की नहीं होगी गारंटी तो फिर आगे कैसे बढ़ेगा बिहार? 2005 में सत्ता में आने के बाद नीतीश कुमार कैसे बने सुशासन बाबू? उन्होंने कैसे सुधारी बिहार की जंगलराज वाली छवि? कैसा था बिहार में जंगलराज का दौर? तब क्या कर रहे पुलिस के तेज-तर्रार अफसर? दर्द-ए-बिहार में ऐसे ही कुछ गंभीर सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश करेंगे कि बिहार में इतना क्राइम क्यों?
बिहार में क्राइम पर बनीं कई फिल्में
बिहार में ना कल-कारखानों की बहार है, ना नौकरियों की बहार है। ना अच्छे प्राइवेट कॉलेज और यूनिवर्सिटी की, ना अच्छे प्राइवेट अस्पतालों की। क्योंकि, पिछले कई दशकों से बिहार जिस मिजाज के साथ आगे बढ़ा, उसमें देश के दूसरे हिस्सों के कारोबारी घरानों ने सूबे में पूंजी लगाने से पहले बहुत हिसाब लगाया होगा। इसकी एक वजह, बिहार में क्राइम के ग्राफ को भी माना जाता है। वहां की खराब कानून-व्यवस्था को माना जाता है। कभी बिहार के अलग-अलग हिस्सों में बाहुबलियों की अघोषित हुकूमत चला करती थी। अपहरण, फिरौती, हत्या और डकैती सामान्य बात थी। राजनीति और अपराधियों के बीच गठजोड़ की भी कई कहानियां है। उस दौर के बिहार की तस्वीर बॉलीवुड फिल्मकारों ने शूल, अपहरण, मृत्युदंड, गंगाजल जैसी फिल्मों के जरिए पेश करने की कोशिश की।
बिहार में 20 साल नीतीशे कुमार तो फिर कैसे बदमाशों की बहार
बिहार में लालू यादव और राबड़ी देवी के शासनकाल में जंगलराज का मुद्दा आगे कर नीतीश कुमार 2005 में सत्ता में आए। उन्होंने अपनी पहली पारी में सूबे में क्राइम कंट्रोल करने के लिए कई कदम उठाए। उसका असर भी जमीन पर दिखा। इससे सूबे में नीतीश कुमार की एक नई पहचान बनी–सुशासन बाबू की। हाल में जिस तरह से ताबड़तोड़ हत्याएं हो रही हैं, उससे कहा जाने लगा है कि बिहार में अपराधियों की बहार आ गई है। अपराधी दिन-दहाड़े हत्या कर रहे हैं। हाल की कुछ चर्चित घटनाओं के जरिए समझने की कोशिश करते हैं कि बिहार में 20 साल नीतीशे कुमार हैं तो फिर कैसे बदमाशों की बहार है।
बिहार पुलिस के मुखिया यानी डीजीपी विनय कुमार दलील देते हैं कि आज की तारीख में Nature of Crime जिस तरह का है, उनमें से ज्यादातर अपराध को रोकना पुलिस के असंभव है। हत्या की बढ़ती घटनाओं की एक वजह इंटरकास्ट मैरिज और प्रॉपर्टी विवाद भी है। पुलिस का दावा है कि अपहरण, डकैती और नक्सली हिंसा पूरी तरह से कंट्रोल में है लेकिन, State Crime Records Bureau के आंकड़ों के मुताबिक, साल 2015 से 2024 बिहार में अपराध के मामलों में 80.2% की वृद्धि दर्ज की गई जबकि इस दौरान राष्ट्रीय औसत केवल 23.7% बढ़ा। डीजीपी विनय कुमार का तर्क है कि बिहार में शराबबंदी कानून की वजह आंकड़ों में क्राइम की संख्या बढ़ी है। ऐसे में आंकड़ों के जरिए समझने की कोशिश करते हैं बिहार में क्राइम कंट्रोल में है या आउट ऑफ कंट्रोल है? राज्य में अपराधियों को काबू में करने के लिए पुलिस की ओर से किस तरह के कदम उठाए जा रहे हैं?
बिहार चुनाव में अब 100 दिन से भी कम का समय बचा है । ऐसे में सवाल ये भी उठ रहा है कि क्या चुनाव की वजह से जान-बूझकर विपक्षी पार्टियां सूबे में कानून-व्यवस्था के मुद्दे को उठा रही हैं।
बिहार में हत्याओं से जुड़े आंकड़े
2015 में 3,178 2016 में 2,581 2017 में 2,803 2018 में 2,934 2019 में 3,138 2020 में 3,150 2021 में 2,799 2022 में 2,930
बिहार में क्राइम ग्राफ
2018 में 1,96,911 2019 में 1,97,935 2020 में 1,94,698 2021 में 1,86,006 2022 में 2,11,079
किसी भी समाज में क्राइम की मौजूदगी की मुकम्मल तस्वीर आंकड़े नहीं बयां कर सकते। अगर केस ही दर्ज नहीं होगा तो आंकड़ों में कहां से आएगा? बिहार में एक दौर ऐसा भी था – जब FIR दर्ज होना बड़ी बात मानी जाती थी। आज की तारीख में ऐसा नहीं है। पुलिस तक क्राइम की शिकायत पहुंचाने के कई रास्ते निकले हैं। मीडिया और सोशल मीडिया के जरिए भी क्राइम की घटनाएं पुलिस तक पहुंच रही हैं और उन पर एक्शन लेना पुलिस की जिम्मेदारी बनती है। ऐसे में Number of Crime का बढ़ना स्वाभाविक है। बिहार में साल 2005 में जहां 1,04,778 Cognizable Crimes के केस दर्ज हुए तो साल 2020 में ये संख्या बढ़कर 2,57,306 हो गई। इस साल यानी 2025 मई तक क्राइम का आंकड़ा 95,942 के निशान तक पहुंच गया लेकिन, ये समझना भी जरूरी है कि 2005 में सत्ता में आने के बाद नीतीश कुमार ने ऐसा क्या किया जिससे सूबे में अपराधियों की कमर टूटने लगी। बेखौफ अपराधियों में कानून का डर पैदा होने लगा।
बिहार से जंगलराज का खात्मा थी एक चुनौती
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपनी पहली पारी में एडीजी मुख्यालय की जिम्मेदारी सौंपी अभयानंद को, जो बाद में बिहार के डीजीपी भी बने। नीतीश कुमार के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी–बिहार से जंगलराज का खात्मा। IPS अभयानंद के दिमाग में एक बात साफ थी कि इकबाल कभी भी पुलिस का नहीं कानून का होना चाहिए क्योंकि, पुलिस का रुतबा और वर्दी की गुंडागर्दी में कोई फर्क नहीं होता है। ऐसे में एक प्लान पर आगे बढ़ा गया जिसमें अपराधियों की गिरफ्तारी से लेकर सजा दिलाने तक का काम तेजी से हुआ। ट्रायल कैसे कराना है इसकी भी ट्रेनिंग पुलिस को दी गई ।
बिहार पुलिस के बड़े अधिकारी दावा कर रहे हैं कि पिछले 20 वर्षों में पुलिस इंफ्रास्ट्रचर में बहुत बढ़ोत्तरी हुई है। बिहार पुलिस को हाईटेक हथियारों से लैस किया गया है। ऐसा Infrastructure और Training मैकेनिज्म तैयार किया गया है, जिससे सूबे की पुलिस Prevention, detection and conviction का काम पूरी तत्परता से कर सके। आज की तारीख में बिहार पुलिस के सामने सबसे बड़ी चुनौती साइबर क्राइम से निपटने की है। इसके लिए हर जिले में साइबर थाने बनाए गए हैं, जिसकी कमान डीएसपी रैंक के अफसर को सौंपी गई है लेकिन एक कड़वा ये भी है कि बिहार पुलिस में स्वीकृत आधे पद खाली हैं। पुलिस बल में कमी की वजह से पेट्रोलिंग और जांच प्रभावित होती है लेकिन, साल 2005 से पहले का बिहार कैसा था? आखिर, बिहार में जंगलराज की बात कहां से आई? उसमें क्या होता था? आज पुलिस में जो लोग ऊंचे पदों पर बैठे हैं वो तब कहां थे, क्या कर रहे थे? इसे भी जानना-समझना जरूरी है।
जब बिहार की कुर्सी पर बैठे लालू प्रसाद यादव
दरअसल, साल 1990 में लालू प्रसाद यादव बिहार के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे। लालू का सत्ता चलाने का अपना अंदाज था। दूसरी ओर, बाहुबलियों ने अपराध को ही कारोबार की शक्ल देना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे बिहार के अपहरण कारोबार और रंगदारी टैक्स की चर्चा देश के हर कोने-कोने में होने लगी। चारा घोटाले में जेल जाने से पहले लालू यादव ने अपनी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठा दिया। राबड़ी देवी के साथ मजबूती से खड़े थे उनके दोनों भाई साधु यादव और सुभाष यादव। सूबे में सफेद कुर्ता-पायजामा पहनकर हथियारों के साथ हवाखोरी करने वालों की तादाद एकाएक बढ़ने लगी।
अपहरण, रंगदारी, हत्या जैसी खबरों से अखबार भरे रहते थे। लोग सेल्फ प्रोटेक्शन की बात करने लगे, अपनी सुरक्षा के लिए खुद इंतजाम करने लगे। नए मिजाज के बिहार में हथियार रखना इज्जत की बात, शान की बात समझा जाने लगा। सिस्टम के भीतर एक और सिस्टम काम कर रहा था। जातिवाद के जिस तवे को सियासत के लिए गर्म किया गया था। उसने बहुत खतरनाक रूप ले लिया। जातीय संघर्ष के नाम पर आए दिन खून-खराबा हो रहा था।
साल 1990 से 2005 के बीच बिहार में आगे बढ़ा क्राइम
दिसंबर 1994 में गोपालगंज के तत्कालीन डीएम जी. कृष्णैया की पीट-पीटकर हत्या कर दी गईं। मार्च 1997 में छात्र नेता चंद्रशेखर की सिवान में सरे-आम हत्या कर दी गई। उस दौर में एक के बाद एक कई नरसंहार भी हुए। मसलन, जहानाबाद के लक्ष्मणपुर बाथे में 58 लोगों को गोलियों से भून दिया गया। इसी तरह भोजपुर के बथानी टोला में भी 21 दलितों का नरसंहार हुआ। साल 1990 से 2005 के बीच बिहार जिस मिजाज के साथ आगे बढ़ा, उसमें पुलिस से लोगों का भरोसा कम हुआ। जाति, जमीन और मजदूरी के सवाल पर संघर्ष बढ़ा तो ब्रह्मर्षि सेना, कुंवर सेना, सनलाइट सेना और रणवीर सेना जैसे संगठनों की छतरी तले लोग आने लगे। हत्या, अपहरण, डकैती और नरसंहार की बातें बिहार के कोने में होने लगीं, जिन्हें लगा कि इस मिजाज के बिहार में ज्यादा दिन Survive नहीं कर सकते, उन्होंने देश के दूसरे हिस्सों के लिए ट्रेन पकड़ ली। लेकिन हाल में बिहार में जिस तरह से हत्या की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं।
बिहार में कारोबारियों को निशाना बनाया जा रहा है, उसमें वहां का आम आदमी ये सोचने के लिए जरूर मजबूर हुआ है कि क्या उसकी जिंदगी सुरक्षित है? बिहार पुलिस अपराधियों को क्यों नहीं कंट्रोल कर पा रही है? क्या पुलिस के टॉप अफसरों को पॉलिटिकल लीडरशिप से क्लीयर सिग्नल नहीं मिल रहा है कि आज की तारीख में अपराधियों से कैसे निपटना है? क्योंकि, हाल ही में जेल से बेल पर बाहर निकले एक बाहुबली कह रहे हैं कि वो जेडीयू से चुनाव लड़ेंगे और अगले 25 साल तक नीतीश कुमार मुख्यमंत्री रहेंगे
बिहार की धरती पर भगवान बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ। बिहार की ही धरती से चक्रवर्ती अशोक ने दुनिया को युद्ध की जगह शांति का संदेश दिया। बिहार के नालंदा और विक्रमशिला विश्वविद्यालय ने दुनिया के ज्ञान से रोशन किया। इसी बिहार की धरती से महात्मा गांधी ने अंग्रेजों के खिलाफ देश में सत्याग्रह और अहिंसा का सफल प्रयोग किया। इसी बिहार की धरती से जयप्रकाश नारायण ने संपूर्ण क्रांति का नारा दिया। आज उसी बिहार को कोई भारत की क्राइम कैपिटल बता रहा है तो कोई महाजंगलराज कह रहा है।
बिहार में हर महीने औसतन 229 मर्डर
आंकड़ों के हिसाब से देखा जाए तो साल 2015 से 2024 तक बिहार में अपराध के मामलों में 80.2% की बढ़ोतरी हुई है। जबकी, इस दौरान राष्ट्रीय औसत 23.7% रहा। पूरा देश तब सन्न रह गया जब जुलाई महीने में 5 अपराधी हथियार लहराते हुए पटना के पारस अस्पताल में घुसे और इलाज के लिए लाए गए सजायाफ्ता कैदी चंदन मिश्रा को गोलियों से भून दिया। पटना में बालू कारोबारी रमाकांत यादव की गोली मारकर हत्या कर दी गई। जुलाई के पहले हफ्ते में बिजनेसमैन गोपाल खेमका की भी पटना में हत्या कर दी गई। ये तो हुए कुछ चर्चित मर्डर केस, जो टीवी और न्यूज पेपर में हेडलाइन बने लेकिन जनवरी से जून तक के आंकड़े बताते हैं कि बिहार में हर महीने औसतन 229 मर्डर हो रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या 20 साल का समय किसी सूबे की कानून -व्यवस्था को ठीक करने के लिए कम होता है? क्या नीतीश कुमार की पुलिस का इकबाल खत्म हो गया है? क्या बिहार के अपराधियों को कानून का डर नहीं रहा? जब लोगों के जान-माल की नहीं होगी गारंटी तो फिर आगे कैसे बढ़ेगा बिहार? 2005 में सत्ता में आने के बाद नीतीश कुमार कैसे बने सुशासन बाबू? उन्होंने कैसे सुधारी बिहार की जंगलराज वाली छवि? कैसा था बिहार में जंगलराज का दौर? तब क्या कर रहे पुलिस के तेज-तर्रार अफसर? दर्द-ए-बिहार में ऐसे ही कुछ गंभीर सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश करेंगे कि बिहार में इतना क्राइम क्यों?
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बिहार में क्राइम पर बनीं कई फिल्में
बिहार में ना कल-कारखानों की बहार है, ना नौकरियों की बहार है। ना अच्छे प्राइवेट कॉलेज और यूनिवर्सिटी की, ना अच्छे प्राइवेट अस्पतालों की। क्योंकि, पिछले कई दशकों से बिहार जिस मिजाज के साथ आगे बढ़ा, उसमें देश के दूसरे हिस्सों के कारोबारी घरानों ने सूबे में पूंजी लगाने से पहले बहुत हिसाब लगाया होगा। इसकी एक वजह, बिहार में क्राइम के ग्राफ को भी माना जाता है। वहां की खराब कानून-व्यवस्था को माना जाता है। कभी बिहार के अलग-अलग हिस्सों में बाहुबलियों की अघोषित हुकूमत चला करती थी। अपहरण, फिरौती, हत्या और डकैती सामान्य बात थी। राजनीति और अपराधियों के बीच गठजोड़ की भी कई कहानियां है। उस दौर के बिहार की तस्वीर बॉलीवुड फिल्मकारों ने शूल, अपहरण, मृत्युदंड, गंगाजल जैसी फिल्मों के जरिए पेश करने की कोशिश की।
बिहार में 20 साल नीतीशे कुमार तो फिर कैसे बदमाशों की बहार
बिहार में लालू यादव और राबड़ी देवी के शासनकाल में जंगलराज का मुद्दा आगे कर नीतीश कुमार 2005 में सत्ता में आए। उन्होंने अपनी पहली पारी में सूबे में क्राइम कंट्रोल करने के लिए कई कदम उठाए। उसका असर भी जमीन पर दिखा। इससे सूबे में नीतीश कुमार की एक नई पहचान बनी–सुशासन बाबू की। हाल में जिस तरह से ताबड़तोड़ हत्याएं हो रही हैं, उससे कहा जाने लगा है कि बिहार में अपराधियों की बहार आ गई है। अपराधी दिन-दहाड़े हत्या कर रहे हैं। हाल की कुछ चर्चित घटनाओं के जरिए समझने की कोशिश करते हैं कि बिहार में 20 साल नीतीशे कुमार हैं तो फिर कैसे बदमाशों की बहार है।
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बिहार पुलिस के मुखिया यानी डीजीपी विनय कुमार दलील देते हैं कि आज की तारीख में Nature of Crime जिस तरह का है, उनमें से ज्यादातर अपराध को रोकना पुलिस के असंभव है। हत्या की बढ़ती घटनाओं की एक वजह इंटरकास्ट मैरिज और प्रॉपर्टी विवाद भी है। पुलिस का दावा है कि अपहरण, डकैती और नक्सली हिंसा पूरी तरह से कंट्रोल में है लेकिन, State Crime Records Bureau के आंकड़ों के मुताबिक, साल 2015 से 2024 बिहार में अपराध के मामलों में 80.2% की वृद्धि दर्ज की गई जबकि इस दौरान राष्ट्रीय औसत केवल 23.7% बढ़ा। डीजीपी विनय कुमार का तर्क है कि बिहार में शराबबंदी कानून की वजह आंकड़ों में क्राइम की संख्या बढ़ी है। ऐसे में आंकड़ों के जरिए समझने की कोशिश करते हैं बिहार में क्राइम कंट्रोल में है या आउट ऑफ कंट्रोल है? राज्य में अपराधियों को काबू में करने के लिए पुलिस की ओर से किस तरह के कदम उठाए जा रहे हैं?
बिहार चुनाव में अब 100 दिन से भी कम का समय बचा है । ऐसे में सवाल ये भी उठ रहा है कि क्या चुनाव की वजह से जान-बूझकर विपक्षी पार्टियां सूबे में कानून-व्यवस्था के मुद्दे को उठा रही हैं।
बिहार में हत्याओं से जुड़े आंकड़े
2015 में 3,178 2016 में 2,581 2017 में 2,803 2018 में 2,934 2019 में 3,138 2020 में 3,150 2021 में 2,799 2022 में 2,930
बिहार में क्राइम ग्राफ
2018 में 1,96,911 2019 में 1,97,935 2020 में 1,94,698 2021 में 1,86,006 2022 में 2,11,079
किसी भी समाज में क्राइम की मौजूदगी की मुकम्मल तस्वीर आंकड़े नहीं बयां कर सकते। अगर केस ही दर्ज नहीं होगा तो आंकड़ों में कहां से आएगा? बिहार में एक दौर ऐसा भी था – जब FIR दर्ज होना बड़ी बात मानी जाती थी। आज की तारीख में ऐसा नहीं है। पुलिस तक क्राइम की शिकायत पहुंचाने के कई रास्ते निकले हैं। मीडिया और सोशल मीडिया के जरिए भी क्राइम की घटनाएं पुलिस तक पहुंच रही हैं और उन पर एक्शन लेना पुलिस की जिम्मेदारी बनती है। ऐसे में Number of Crime का बढ़ना स्वाभाविक है। बिहार में साल 2005 में जहां 1,04,778 Cognizable Crimes के केस दर्ज हुए तो साल 2020 में ये संख्या बढ़कर 2,57,306 हो गई। इस साल यानी 2025 मई तक क्राइम का आंकड़ा 95,942 के निशान तक पहुंच गया लेकिन, ये समझना भी जरूरी है कि 2005 में सत्ता में आने के बाद नीतीश कुमार ने ऐसा क्या किया जिससे सूबे में अपराधियों की कमर टूटने लगी। बेखौफ अपराधियों में कानून का डर पैदा होने लगा।
बिहार से जंगलराज का खात्मा थी एक चुनौती
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपनी पहली पारी में एडीजी मुख्यालय की जिम्मेदारी सौंपी अभयानंद को, जो बाद में बिहार के डीजीपी भी बने। नीतीश कुमार के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी–बिहार से जंगलराज का खात्मा। IPS अभयानंद के दिमाग में एक बात साफ थी कि इकबाल कभी भी पुलिस का नहीं कानून का होना चाहिए क्योंकि, पुलिस का रुतबा और वर्दी की गुंडागर्दी में कोई फर्क नहीं होता है। ऐसे में एक प्लान पर आगे बढ़ा गया जिसमें अपराधियों की गिरफ्तारी से लेकर सजा दिलाने तक का काम तेजी से हुआ। ट्रायल कैसे कराना है इसकी भी ट्रेनिंग पुलिस को दी गई ।
बिहार पुलिस के बड़े अधिकारी दावा कर रहे हैं कि पिछले 20 वर्षों में पुलिस इंफ्रास्ट्रचर में बहुत बढ़ोत्तरी हुई है। बिहार पुलिस को हाईटेक हथियारों से लैस किया गया है। ऐसा Infrastructure और Training मैकेनिज्म तैयार किया गया है, जिससे सूबे की पुलिस Prevention, detection and conviction का काम पूरी तत्परता से कर सके। आज की तारीख में बिहार पुलिस के सामने सबसे बड़ी चुनौती साइबर क्राइम से निपटने की है। इसके लिए हर जिले में साइबर थाने बनाए गए हैं, जिसकी कमान डीएसपी रैंक के अफसर को सौंपी गई है लेकिन एक कड़वा ये भी है कि बिहार पुलिस में स्वीकृत आधे पद खाली हैं। पुलिस बल में कमी की वजह से पेट्रोलिंग और जांच प्रभावित होती है लेकिन, साल 2005 से पहले का बिहार कैसा था? आखिर, बिहार में जंगलराज की बात कहां से आई? उसमें क्या होता था? आज पुलिस में जो लोग ऊंचे पदों पर बैठे हैं वो तब कहां थे, क्या कर रहे थे? इसे भी जानना-समझना जरूरी है।
जब बिहार की कुर्सी पर बैठे लालू प्रसाद यादव
दरअसल, साल 1990 में लालू प्रसाद यादव बिहार के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे। लालू का सत्ता चलाने का अपना अंदाज था। दूसरी ओर, बाहुबलियों ने अपराध को ही कारोबार की शक्ल देना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे बिहार के अपहरण कारोबार और रंगदारी टैक्स की चर्चा देश के हर कोने-कोने में होने लगी। चारा घोटाले में जेल जाने से पहले लालू यादव ने अपनी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठा दिया। राबड़ी देवी के साथ मजबूती से खड़े थे उनके दोनों भाई साधु यादव और सुभाष यादव। सूबे में सफेद कुर्ता-पायजामा पहनकर हथियारों के साथ हवाखोरी करने वालों की तादाद एकाएक बढ़ने लगी।
अपहरण, रंगदारी, हत्या जैसी खबरों से अखबार भरे रहते थे। लोग सेल्फ प्रोटेक्शन की बात करने लगे, अपनी सुरक्षा के लिए खुद इंतजाम करने लगे। नए मिजाज के बिहार में हथियार रखना इज्जत की बात, शान की बात समझा जाने लगा। सिस्टम के भीतर एक और सिस्टम काम कर रहा था। जातिवाद के जिस तवे को सियासत के लिए गर्म किया गया था। उसने बहुत खतरनाक रूप ले लिया। जातीय संघर्ष के नाम पर आए दिन खून-खराबा हो रहा था।
साल 1990 से 2005 के बीच बिहार में आगे बढ़ा क्राइम
दिसंबर 1994 में गोपालगंज के तत्कालीन डीएम जी. कृष्णैया की पीट-पीटकर हत्या कर दी गईं। मार्च 1997 में छात्र नेता चंद्रशेखर की सिवान में सरे-आम हत्या कर दी गई। उस दौर में एक के बाद एक कई नरसंहार भी हुए। मसलन, जहानाबाद के लक्ष्मणपुर बाथे में 58 लोगों को गोलियों से भून दिया गया। इसी तरह भोजपुर के बथानी टोला में भी 21 दलितों का नरसंहार हुआ। साल 1990 से 2005 के बीच बिहार जिस मिजाज के साथ आगे बढ़ा, उसमें पुलिस से लोगों का भरोसा कम हुआ। जाति, जमीन और मजदूरी के सवाल पर संघर्ष बढ़ा तो ब्रह्मर्षि सेना, कुंवर सेना, सनलाइट सेना और रणवीर सेना जैसे संगठनों की छतरी तले लोग आने लगे। हत्या, अपहरण, डकैती और नरसंहार की बातें बिहार के कोने में होने लगीं, जिन्हें लगा कि इस मिजाज के बिहार में ज्यादा दिन Survive नहीं कर सकते, उन्होंने देश के दूसरे हिस्सों के लिए ट्रेन पकड़ ली। लेकिन हाल में बिहार में जिस तरह से हत्या की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं।
बिहार में कारोबारियों को निशाना बनाया जा रहा है, उसमें वहां का आम आदमी ये सोचने के लिए जरूर मजबूर हुआ है कि क्या उसकी जिंदगी सुरक्षित है? बिहार पुलिस अपराधियों को क्यों नहीं कंट्रोल कर पा रही है? क्या पुलिस के टॉप अफसरों को पॉलिटिकल लीडरशिप से क्लीयर सिग्नल नहीं मिल रहा है कि आज की तारीख में अपराधियों से कैसे निपटना है? क्योंकि, हाल ही में जेल से बेल पर बाहर निकले एक बाहुबली कह रहे हैं कि वो जेडीयू से चुनाव लड़ेंगे और अगले 25 साल तक नीतीश कुमार मुख्यमंत्री रहेंगे