आपने अक्सर देखा होगा कि किसी कार या बाइक के स्पीडोमीटर पर 200, 240, या 300 km/h तक की स्पीड लिखी होती है, भले ही वह वाहन इतनी तेज़ रफ़्तार से न चल सके। यह एक दिलचस्प सवाल है। अक्सर लोग ये सवाल जरूर करते हैं कि टॉप स्पीड इतनी ज्यादा अगर लिखी है तो गाड़ी उतनी स्पीड क्यों नहीं पकड़ पाती। कई बार गाड़ी चलाते समय हमारे मन में भी यही सवाल आता है। तो आइए जानते हैं इसके पीछे की वजहें!
मार्केटिंग और साइकोलॉजी
हाई स्पीडोमीटर रीडिंग से गाड़ी ज्यादा पावरफुल लगती है। ग्राहक को यह महसूस होता है कि गाड़ी की टॉप स्पीड बहुत अधिक है, भले ही वह ड्राइविंग के दौरान इसका यूज ना करें। एक स्पोर्टी और हाई-परफॉर्मेंस फील देने के लिए वाहन निर्माता बड़े नंबर दिखाती हैं।
इंजीनियरिंग और परफॉरमेंस
मैक्सिमम स्पीड भले ही वाहन तक सीमित हो, लेकिन इंजन और ट्रांसमिशन क्षमता के अनुसार स्पीडोमीटर को डिजाइन किया जाता है। कुछ वाहनों के इंजन लिमिटर या इलेक्ट्रॉनिक स्पीड गवर्नर होते हैं, जो उन्हें एक तय स्पीड से ऊपर नहीं जाने देते। कुछ मामलों में, वाहन को स्पोर्ट्स या हाईवे मोड में अनलॉक किया जा सकता है, जिससे अधिकतम गति थोड़ी बढ़ सकती है।
क्या कहते हैं ऑटो एक्सपर्ट
इस बारे में ऑटो एक्सपर्ट रोनोजॉय मुखर्जी बताते हैं कि स्पीडोमीटर में ज्यादा रफ़्तार देना मार्केटिंग का ही हिस्सा होता है साथ ही ड्राइवर को भी फील देने के लिए भी स्पीड ज्यादा रहती है। लेकिन असल ड्राइविंग में सेफ्टी को ध्यान में रखते हुए स्पीड कम ही रहती है। आजकल तो डिजिटल मीटर कंसोल आने लगे हैं जिसमें टॉप स्पीड मेंशन नहीं होती। ज्यादातर कारों और बाइकों में स्पीडोमीटर की अधिकतम स्पीड वास्तविक टॉप स्पीड से 20-30% ज्यादा होती है।
कई बार कंपनियां एक ही स्पीडोमीटर डिज़ाइन का उपयोग अलग-अलग वेरिएंट में करती हैं। इससे मैन्युफैक्चरिंग कॉस्ट भी कम होती है। लेकिन उनकी टॉप स्पीड भी कम और ज्यादा होती है। स्पीडोमीटर पर बफ़र (Margin of Error) दिया जाता है, ताकि ड्राइवर को हमेशा रियल टाइम स्पीड का अंदाजा रहे।
कुल मिलाकर यही निष्कर्ष निकलता है कि स्पीडोमीटर की अधिकतम गति तकनीकी, मार्केटिंग, और डिजाइन कारणों से अधिक दिखाई जाती है। यह ग्राहकों को गाड़ी की पावरफुल इमेज देता है, साथ ही कंपनियों के लिए लागत बचाने में मदद करता है।
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