'होटल की खिड़की खोलते तो आंखों के सामने मिसाइलों की बारिश होती दिखती थी. हर तरफ धुंआ था और पहाड़ों से टकराती धमाकों की गूंज. ऐसा लगता था कि बस अब सब खत्म होने वाला है.' यह रोंगटे खड़े कर देने वाली आपबीती गाजियाबाद के केतन मेहता की है, जो हाल ही में ईरान और इजरायल के बीच छिड़ी भीषण जंग के बीच से किसी तरह जान बचाकर सुरक्षित भारत लौटे हैं.

केतन मेहता की यह कहानी मौत के साये में बिताए उन 100 दिनों का संघर्ष है, जिसमें उन्होंने जेल की सलाखें भी देखीं और युद्ध की विभीषिका भी. केतन ने अपनी ये खौफनाक आपबीती एनडीटीवी को बताई है.

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जेल से छूटे तो शुरू हो गया युद्ध

केतन मेहता उस तेल टैंकर (MT Valiant Roar) के क्रू मेंबर में शामिल थे, जिसे 8 दिसंबर को ईरान ने अवैध डीजल ले जाने के आरोप में जब्त कर लिया था. केतन को 50 दिनों तक ईरान की जेल में रहना पड़ा. 27 फरवरी को जब उन्हें रिहा कर एक होटल में शिफ्ट किया गया, तो उन्हें लगा कि अब उनकी मुश्किलें खत्म हो गई हैं. लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था.

एनडीटीवी की रिपोर्ट के मुताबिक, अगले ही दिन उन्हें भारत के लिए निकलना था, लेकिन उसी दिन 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर हवाई हमले शुरू कर दिए. केतन जिस होटल में रुके थे, वह ईरान के मुख्य नौसैनिक अड्डे बंदर अब्बास से महज 600-700 मीटर दूर था. देखते ही देखते पूरा इलाका युद्ध के मैदान में तब्दील हो गया.

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होटल की खिड़की से देखी 'मौत की बारिश'

केतन बताते हैं कि दूतावास ने उन्हें होटल से बाहर न निकलने की सख्त हिदायत दी थी. वह बताते हैं, 'दिन-रात सिर्फ धमाकों की आवाजें आती थीं. एक दिन में 100 से 200 बम गिरते थे. होटल की खिड़की से हम मिसाइलों को गिरते हुए देखते थे.' वह 25 दिनों तक उसी होटल के कमरे में कैद रहे, जहां हर पल यह डर सताता था कि अगली मिसाइल कहीं उनके होटल पर न गिर जाए.

1,800 किलोमीटर का वो रास्ता

जब वापसी का रास्ता खुला, तो वह किसी चुनौती से कम नहीं था. केतन को सड़क मार्ग से आर्मेनिया बॉर्डर तक पहुंचना था. बंदर अब्बास से आर्मेनिया तक का 1,800 किलोमीटर का सफर उन्होंने एक बस में तय किया, जिसमें करीब 19 घंटे लगे.

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केतन के मुताबिक, यह सफर सबसे डरावना था. पहाड़ों के बीच से गुजरते समय लगातार धमाकों की गूंज सुनाई दे रही थी. धमाकों की तीव्रता इतनी ज्यादा थी कि चलती हुई बस हिल जाती थी.