अमेरिका में नवंबर में होने वाले मिड-टर्म चुनावों से पहले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक ऐसा चुनावी दांव चला है, जिसने भारत के ‘रेवड़ी कल्चर’ वाली राजनीति से जोड़कर देखा जा रहा है. ऐसा इसलिए क्योंकि हाल ही में राष्ट्रपति ट्रंप ने हर अमेरिकी युवा को 5000 डॉलर यानी करीब 4.2 लाख रुपये का ‘डिविडेंड’ देने का प्रस्ताव रखा है. हालांकि, इस ऐलान के साथ उन्होंने एक शर्त भी रखी है. ट्रंप ने कहा कि अगर नवंबर के चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी को प्रतिनिधि सभा और सीनेट दोनों पर कंट्रोल मिला तो ये सुविधा युवाओं को दी जाएगी.
योजना लागू होने के बाद सरकार को कितना करना होगा खर्च?
डोनाल्ड ट्रंप ने बुधवार को डलास में रिपब्लिकन मिडटर्म कन्वेंशन के दौरान करीब 100 मिनट के भाषण में इस योजना का जिक्र किया. हालांकि, उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि इस रकम का भुगतान किस तरह किया जाएगा और इसके लिए पैसा कहां से आएगा? अगर बड़ी संख्या में अमेरिकी वोटर्स इस योजना के दायरे में आते हैं तो सरकार पर एक ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा का बोझ पड़ सकता है. इसके लिए अमेरिकी संसद यानी कांग्रेस की मंजूरी भी जरूरी होगी.
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भारत में कैसे पॉपुलर हुआ ‘रेवड़ी कल्चर’?
गौरतलब है कि भारत में चुनावी वादों के बदले सीधे आर्थिक या अन्य लाभ देने की राजनीति कोई नई बात नहीं है. राजनीतिक इतिहास में इसके शुरुआती संकेत तमिलनाडु से मिलते हैं, जहां 1950 और 1960 के दशक में तत्कालीन मद्रास राज्य के मुख्यमंत्री के कामराज ने मुफ्त शिक्षा और स्कूली बच्चों के लिए मिड-डे मील जैसी योजनाओं को बढ़ावा दिया. 1967 के तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में डीएमके संस्थापक सीएन अन्नादुरई ने सस्ती दर पर चावल देने का वादा किया. इसके बाद चुनावी राजनीति में कलर टीवी, गैस चूल्हे, मिक्सर-ग्राइंडर, पंखे, लैपटॉप और दूसरी सुविधाओं के वादों का दौर शुरू हुआ.
दिल्ली विधानसभा चुनाव के बाद मिला ‘रेवड़ी कल्चर’ नाम
चुनावी रैलियों में बड़ी-बड़ी सुविधाओं के ऐलान को बाद में ‘रेवड़ी कल्चर’ के नाम से जाना जाने लगा. साल 2015 में दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान आम आदमी पार्टी ने मुफ्त या सब्सिडी वाली बिजली और पानी जैसे मुद्दों को प्रमुखता दी. इसके बाद मुफ्त बिजली, महिलाओं के लिए मुफ्त बस यात्रा, किसानों की कर्जमाफी जैसे वादे देश के कई राज्यों में चुनावी राजनीति का हिस्सा बन गए. हालांकि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) कई बार चेतावनी दे चुका है कि ज्यादा सब्सिडी और मुफ्त योजनाएं राज्यों की वित्तीय स्थिति पर बुरा असर डाल सकती हैं और बुनियादी ढांचे, स्वास्थ्य और शिक्षा पर होने वाले खर्च को प्रभावित कर सकती हैं.
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