पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) इन दिनों अपने सबसे बड़े आंतरिक संकट से गुजरती नजर आ रही है. पार्टी के भीतर चल रही नाराजगी अब विधानसभा से निकलकर संसद तक पहुंच गई है. कुछ बागी नेताओं ने दावा किया है कि करीब 20 टीएमसी सांसद अलग ग्रुप बनाकर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) का समर्थन करने के लिए तैयार हैं. तृणमूल प्रमुख ममता बनर्जी की मुश्किलें और बढ़ गई हैं, क्योंकि आज ही उन्होंने INDIA ब्लॉक के साथ बैठक की थी. उनकी पार्टी के 20 सांसदों का एक गुट अब NDA में शामिल होना चाहता है. व्हिप के पद से हटाए जाने के बाद पार्टी से नाराज रहीं काकोली घोष दस्तीदार ने कहा कि जनता के फैसले को देखते हुए, उनका मानना है कि उन्हें NDA के साथ होना चाहिए.
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ओम बिरला को लिखी चिट्ठी
काकोली घोष दस्तीदार ने आज पत्रकारों को बताया कि तृणमूल के लगभग 20 सांसदों ने स्पीकर ओम बिरला को पत्र लिखकर NDA का हिस्सा बनने की अपनी इच्छा औपचारिक रूप से बताने का फैसला किया है. ये कदम पश्चिम बंगाल की घटनाओं जैसा ही है, जहां पार्टी से निकाले गए बागी नेता ऋताब्रता बनर्जी की अगुवाई में 58 विधायकों ने एक गुट बनाया है और शिवसेना की तर्ज पर खुद को असली तृणमूल होने का दावा कर रहे हैं. उनकी शिकायत राज्य विधानसभा में विपक्ष के नेता के तौर पर पार्टी की पसंद, शोभनदेव चटर्जी को लेकर है. विधानसभा स्पीकर ने इस पद के लिए ऋतब्रत बनर्जी को मंजूर कर लिया है और उन्हें राज्य विधानसभा में पार्टी के कमरे की चाबियां भी सौंप दी हैं.
टीएमसी को बड़ा झटका
घोष दस्तीदार के मामले में, उन्हें ‘व्हिप’ के पद से हटाना ही शायद आखिरी बात साबित हुई. जब कल्याण बनर्जी ने लोकसभा में पार्टी के मुख्य व्हिप के तौर पर उनकी जगह ली, तब से ही यह सांसद नाराज़ चल रही थी. इसके कुछ ही समय बाद, बारासात की सांसद ने पार्टी के अपने पद से इस्तीफा दे दिया था और पॉलिटिकल कंसल्टेंसी फर्म I-PAC को काम पर रखने के फैसले की कड़ी आलोचना की थी. आज, उन्हें हटाए जाने के फैसले को मनमाना और एकतरफा बताते हुए घोष ने पत्रकारों से कहा कि पार्टी चेयरपर्सन ने भले ही इस पद पर उनकी जगह किसी और के आने का ऐलान कर दिया हो, लेकिन इससे रातों-रात संवैधानिक और संसदीय स्थिति नहीं बदल जाती. इस बीच टीएमसी को एक और बड़ा झटका तब लगा जब वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रॉय ने पार्टी और राज्यसभा दोनों से इस्तीफा दे दिया. इस्तीफे के बाद उन्होंने पार्टी नेतृत्व और संगठन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए. उनके इस कदम को टीएमसी में बढ़ती असंतुष्टि का संकेत माना जा रहा है.
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