पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी का शासन, संवैधानिक टकराव और राष्ट्रपति शासन की आशंकाएं, क्या ममता की होगी गिरफ्तारी?

2011 में ममता बनर्जी के सत्ता में आने के बाद राज्य की राजनीति एक ऐसे दौर में दाखिल हुई, जहां राज्य सरकार, राज्यपाल, न्यायपालिका और केंद्र सभी के बीच संबंध अक्सर तनावपूर्ण रहे. आखिर क्या है इसका मुख्य कारण? पढ़िये राजनीतिक विश्लेषक तथा वरिष्ठ पत्रकार प्रियदर्शी रंजन के विचार.

Mamata Banerjee

प्रियदर्शी रंजन

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प्रवर्तन निदेशालय (ED) की कार्यवाही में ममता बनर्जी सरकार की कथित दखलंदाजी यदि अदालत में सिद्ध होती है, तो यह तृणमूल कांग्रेस सरकार के लिए गंभीर संवैधानिक संकट खड़ा कर सकती है. क्योंकि मुख्यमंत्री होने के नाते गिरफ्तारी से कोई संवैधानिक सुरक्षा नहीं मिलती और अगर ED साबित कर दे कि फाइल्स जांच से जुड़ी हैं, तो ममता पर बड़ी कार्रवाई हो सकती है. पश्चिम बंगाल के राज्यपाल सी. वी. आनंद बोस इस विषय को पहले ही संवैधानिक अधिकारों के उल्लंघन के रूप में चिन्हित कर चुके हैं. उनका यह कहना कि ‘वे चुप नहीं बैठ सकते’, संकेत देता है कि राजभवन इस पूरे घटनाक्रम को केवल राजनीतिक विवाद नहीं, बल्कि संवैधानिक प्रश्न मान रहा है. संविधान के तहत राज्यपाल केंद्र का प्रतिनिधि होता है और उसकी रिपोर्ट राष्ट्रपति शासन का आधार बन सकती है.

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दरअसल, पश्चिम बंगाल की राजनीति पिछले डेढ़ दशक से केवल सत्ता परिवर्तन या चुनावी संघर्ष की कहानी नहीं रही है. 2011 में ममता बनर्जी के सत्ता में आने के बाद राज्य की राजनीति एक ऐसे दौर में दाख़िल हुई, जहां राज्य सरकार, राज्यपाल, न्यायपालिका और केंद्र सभी के बीच संबंध अक्सर तनावपूर्ण रहे. इसी कारण ममता बनर्जी के शासनकाल में कई बार ऐसा माहौल बना जब यह प्रश्न राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बना कि क्या पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति शासन लगाया जा सकता है? हालांकि अब तक यह आशंका कभी वास्तविकता में नहीं बदली, लेकिन इसके पीछे की परिस्थितियां और टकराव बंगाल की समकालीन राजनीति को समझने के लिए अहम हैं.

शारदा घोटाला: शुरुआती झटका और अविश्वास (2012–13)


ममता सरकार के शुरुआती वर्षों में ही शारदा चिटफंड घोटाला सामने आया. लाखों निवेशकों की गाढ़ी कमाई डूब गई. तृणमूल कांग्रेस के कई नेताओं पर गंभीर आरोप लगे. सीबीआई और ईडी की जांच ने राज्य सरकार और केंद्र के बीच टकराव को जन्म दिया. इस दौर में पहली बार यह कहा जाने लगा कि राज्य प्रशासन नैतिक और प्रशासनिक संकट में है. हालांकि कानून-व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त नहीं हुई और न्यायपालिका की निगरानी शुरू हो गई, इसलिए राष्ट्रपति शासन की चर्चा राजनीतिक गलियारों तक ही सीमित रही.

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शैक्षणिक संस्थान और असहमति की राजनीति (2016–17)

जादवपुर और प्रेसीडेंसी यूनिवर्सिटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में छात्र आंदोलनों और पुलिस कार्रवाई ने सरकार की आलोचना बढ़ाई. विपक्ष ने इसे असहमति के दमन के रूप में देखा. हालांकि यह टकराव लोकतांत्रिक मूल्यों से जुड़ा था, लेकिन इसे संवैधानिक विफलता की श्रेणी में नहीं रखा गया.

2018 पंचायत चुनाव : लोकतंत्र पर सबसे बड़ा प्रश्न

2018 के पंचायत चुनाव ममता शासन के सबसे विवादास्पद अध्यायों में गिने जाते हैं. हजारों सीटों पर विपक्ष के उम्मीदवार नामांकन तक नहीं कर सके. हिंसा, धमकी और निर्विरोध जीत ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर दिए. भाजपा ने राष्ट्रपति शासन की औपचारिक मांग की. यह वह समय था जब पहली बार गंभीरता से कहा गया कि बंगाल में संवैधानिक हस्तक्षेप की नौबत आ सकती है. लेकिन चुनाव आयोग और अदालतों के हस्तक्षेप को पर्याप्त मानते हुए केंद्र ने कोई कठोर कदम नहीं उठाया.

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राज्यपाल बनाम राज्य सरकार

ममता बनर्जी के शासनकाल में राज्यपाल और सरकार के रिश्ते लगातार तनावपूर्ण रहे. जगदीप धनखड़ (2019–2022) के कार्यकाल में यह टकराव अपने चरम पर दिखा. विश्वविद्यालयों में कुलाधिपति के अधिकारों को लेकर संघर्ष हुआ. राज्यपाल द्वारा ‘संवैधानिक संकट’ जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया. राज्य सरकार ने राज्यपाल पर केंद्र का ‘राजनीतिक प्रतिनिधि’ होने का आरोप लगाया. राजभवन और नवान्न के बीच यह टकराव बार-बार राष्ट्रपति शासन की बहस को हवा देता रहा. वर्तमान राज्यपाल सी. वी. आनंद बोस के साथ भी महिला सुरक्षा, विश्वविद्यालय प्रशासन और चुनावी हिंसा जैसे मुद्दों पर मतभेद सामने आए हैं.

न्यायपालिका से असहज संबंध

ममता सरकार और न्यायपालिका के रिश्ते भी कई मौकों पर तनावपूर्ण रहे. राजनीतिक हिंसा के मामलों में कलकत्ता हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणियां की. 2021 विधानसभा चुनाव के बाद हिंसा मामलों में CBI जांच के आदेश दिया. राज्य सरकार द्वारा न्यायिक आदेशों को ‘संघीय ढांचे में हस्तक्षेप’ बताया गया. हालांकि सरकार ने अंततः न्यायालयों के आदेशों का पालन किया, जिससे संवैधानिक संकट टल गया. लेकिन अदालतों की तीखी टिप्पणियों ने यह संकेत जरूर दिया कि शासन और कानून के बीच संतुलन एक चुनौती बना हुआ है.

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2019 और 2021 : चुनाव बाद की हिंसा और चरम बहस

2019 लोकसभा और 2021 विधानसभा चुनावों के बाद हिंसा के आरोपों ने माहौल को और गंभीर कर दिया. हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की निगरानी ने सरकार को कटघरे में खड़ा किया. विपक्ष ने इसे ‘राज्य मशीनरी की विफलता’ बताया और राष्ट्रपति शासन की मांग तेज हुई.

निष्कर्ष


ममता बनर्जी के शासनकाल में राष्ट्रपति शासन की आशंका बार-बार इसलिए उभरती है. पश्चिम बंगाल की राजनीति आज सत्ता और विपक्ष के संघर्ष से आगे बढ़कर संवैधानिक संस्थाओं के बीच संतुलन की परीक्षा बन चुकी है. ममता बनर्जी का शासन विवादों, टकरावों और आरोपों से घिरा रहा. फिर भी, ममता बनर्जी को मिला प्रचंड जनादेश मिला. और खास बात यह की इतनी टकराव के बाद भी अभी तक ममता बनर्जी के शासनकाल में पश्चिम बंगाल में एक बार भी राष्ट्रपति शासन नहीं लगा. हालिया विवाद में भी यही लग रहा कि बंगाल में राष्ट्रपति शासन सिर्फ एक राजनीतिक आशंका भर है. राष्ट्रपति शासन लगाने का निर्णय शायद ही हो पाए.

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(डिस्क्लेमर: यह लेखक के व्यक्तिगत मत हैं. लेख में उल्लिखित जानकारियों की सत्यता व सटीकता के लिए लेखक स्वयं जिम्मेदार है. News24 इसके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.)

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लेख समाप्त

लेखक के बारे में

Akarsh Shukla

Akarsh Shukla

आकर्ष शुक्ला न्यूज 24 के साथ बतौर चीफ सब एडिटर जुड़े हुए हैं. मूल रूप से नोएडा, उत्तर प्रदेश के रहने वाले आकर्ष ने पत्रकारिता का सफर 2016 में प्रिंट मीडिया से शुरू हुआ, बाद में उन्होंने डिजिटल मीडिया का रुख किया. आकर्ष शुक्ला ने गुरु जंभेश्वर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (GJUS&T) हिसार, हरियाणा से मास्टर ऑफ मास कम्युनिकेशन (MJMC) की डिग्री हासिल की. आकर्ष ने दिल्ली के अखबार वूमेन एक्सप्रेस में काम किया. इसके बाद नवोदय टाइम्स, ओपेरा न्यूज, वनइंडिया, इंडिया डॉट कॉम (जी मीडिया ग्रुप) में विभिन्न पदों पर कार्य किया. आकर्ष शुक्ला अक्टूबर, 2025 से न्यूज24 से जुड़े हुए हैं, जहां वो मुख्य रूप से राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय और राजनीति से जुड़ी खबरों को कवर करते हैं. इसके साथ ही आकर्ष शिफ्ट हेड के तौर पर टीम का नेतृत्व भी करते हैं. आकर्ष ने लोकसभा और विधानसभा चुनाव के अलावा संसद से जुड़ी खबरों को कवर किया है. उनकी राजनीति में गहरी रुचि है, इस कारण वह राजनीति से जुड़ी खबरों को आसान शब्दों में लिखने में माहिर हैं. डिग्री और डिप्लोमा: आकर्ष शुक्ला ने दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक (BA) की डिग्री के बाद गुरु जंभेश्वर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (GJUS&T) हिसार, हरियाणा से मास्टर ऑफ मास कम्युनिकेशन (MJMC) पोस्ट ग्रेजुएशन किया है. आकर्ष शुक्ला ने DICS इंस्टीट्यूट से कंप्यूटर सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर में 2 साल का डिप्लोमा भी किया है. पत्रकारिता में अनुभव: 10 वर्ष से अधिक
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