2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी बूथ लेवल पर मजबूती बढ़ाने के लिए जोर-शोर से काम कर रही है. बूथ मैनेजमेंट को मजबूत करने की रणनीति के तहत खास तौर पर उन बूथों पर फोकस किया जा रहा है, जिनके नतीजे साल 2022 और 2024 के बीच बदल गए. इकोनॉमिक्स टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, जिन बूथों पर साल 2022 विधानसभा चुनाव में भाजपा की जीत हुई थी, 2024 के लोकसभा चुनाव में वही बूथ पार्टी हार गई. ऐसे बूथों की संख्या करीब 18900 है.
यूपी के भाजपा प्रभारी विनोद तावड़े 16 सितंबर से 22 सितंबर तक राज्य का दौरा करेंगे. इस दौरान वे इन बूथों को रिव्यू करेंगे समीक्षा करेंगे और उन्हें दोबारा भाजपा के पाले में करने के लिए रणनीति बनाएंगे.
ग्रामीण इलाके के बूथों पर नुकसान
2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा केवल 33 सीटें जीतने में ही कामयाब रही थी. जबकि इसके पांच साल पहले 2019 में 62 सीटें जीती थीं. वहीं, 2019 में केवल पांच सीटें जीतने वाली समाजवादी पार्टी के खाते में 2024 में 37 सीटें आई थीं. BJP को बूथ-स्तर पर सबसे ज्यादा नुकसान ग्रामीण इलाकों में हुआ. जिन बूथ पर भाजपा हारी थी, उनमें से 80 फीसदी ग्रामीण इलाकों में थे. अवध और पूर्वांचल क्षेत्रों में सबसे ज्यादा बूथों पर भाजपा की हार हुई.
2022 में भाजपा को कहां कितना नुकसान हुआ?
2022 के विधानसभा चुनाव के आंकड़ों पर नजर डालें तो अवध बेल्ट की 154 में से 101 और पूर्वांचल की 102 में से 53 सीटों पर भाजपा की जीत हुई थी. अमेठी, फैजाबाद, कन्नौज, सुल्तानपुर और सीतापुर में भाजपा को बूथ-स्तर पर काफी नुकसान हुआ था. पूर्वांचल में गैर-यादव OBC वोटों का एक बड़ा हिस्सा सपा की तरफ चला गया. इनमें जौनपुर, गाजीपुर, मछलीशहर, चंदौली और ग्रामीण प्रयागराज के बूथ शामिल हैं.
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वहीं, 2022 में पश्चिमी यूपी और रुहेलखंड में 128 विधानसभा सीटों में से BJP ने 87 सीटें जीतीं थी. 2024 के लोकसभा चुनाव भाजपा 65 विधानसभा सीटों पर आगे रही. बुंदेलखंड में भाजपा ने 2022 में 19 विधानसभा सीटों में से 14 सीटें जीतीं और 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी नौ सीटों पर आगे रही.
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क्या थी वजह?
जिन बूथों पर भाजपा हारी थी, उन इलाकों में सत्ता विरोधी लहर के अलावा स्थानीय मुद्दे ज्यादा हावी रहे. इकोनॉमिक्स टाइम्स ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि समाजवादी पार्टी के PDA (पिछड़े, दलित, अल्पसंख्यक) कैंपेन की वजह से भाजपा के कुर्मी, कुशवाहा और दूसरे OBC वोट बैंक का एक हिस्सा भी छिटक गया. इसके साथ ही मायावती की बसपा के कमजोर होने से गैर-जाटव दलित वोटों का एक हिस्सा भी सपा गठबंधन की तरफ चला गया.
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