Thursday, 22 February, 2024

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Gita Press: 600 रुपए के प्रिंटिंग मशीन से शुरुआत, 41 करोड़ से अधिक पुस्तकें छापी, जानें गीता प्रेस के 100 सालों का इतिहास

Gita Press (Gorakhpur): उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में गीता प्रेस है। इसे 2021 का गांधी शांति पुरस्कार मिला है। यह पुरस्कार गीता प्रेस को अहिंसा और गांधीवादी तरीके से सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिवर्तन में योगदान के लिए दिया गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को गीता प्रेस को गांधी शांति पुरस्कार के लिए चुने जाने […]

Edited By : Bhola Sharma | Updated: Jun 19, 2023 18:53
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Gita Press (Gorakhpur): उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में गीता प्रेस है। इसे 2021 का गांधी शांति पुरस्कार मिला है। यह पुरस्कार गीता प्रेस को अहिंसा और गांधीवादी तरीके से सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिवर्तन में योगदान के लिए दिया गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को गीता प्रेस को गांधी शांति पुरस्कार के लिए चुने जाने पर बधाई दी। उन्होंने ट्वीट कर लिखा, ‘गीता प्रेस ने 100 सालों में लोगों के बीच सामाजिक और सांस्कृतिक परिवर्तन को आगे बढ़ाने की दिशा में सराहनीय काम किया है।’

गांधी शांति पुरस्कार के साथ 1 करोड़ रुपये की धनराशि से भी पुरस्कृत किया जाता है। लेकिन गीता प्रेस ने इस राशि को लेने से इंकार कर दिया।

हिंदू ग्रंथों का सबसे बड़ा प्रकाशक है गीता प्रेस

गोरखपुर में स्थापित गीता प्रेस, हिंदू धार्मिक ग्रंथों का दुनिया का सबसे बड़ा प्रकाशक है। इसकी स्थापना 29 अप्रैल, 1923 को जय दयाल गोयनका, घनश्याम दास जालान और हनुमान प्रसाद पोद्दार ने की थी। गीता प्रेस की स्थापना का उद्देश्य सनातन धर्म या हिंदू धर्म के शाश्वत सत्य के सिद्धांतों को बढ़ावा देना था। संस्थापकों में से एक हनुमान प्रसाद पोद्दार गीता प्रेस की कल्याण पत्रिका के आजीवन संपादक भी थे।

अपनी स्थापना के पांच महीने बाद गीता प्रेस ने 600 रुपये में एक प्रिंटिंग मशीन खरीदी। गीता प्रेस के अभिलेखागार में 3,500 से अधिक पांडुलिपियां हैं।

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41 करोड़ से अधिक पुस्तकें मुद्रित

गीता प्रेस गोविंद भवन कार्यालय की एक इकाई है, जो सोसायटी पंजीकरण अधिनियम 1860 के तहत पंजीकृत है। जिसे अब पश्चिम बंगाल सोसायटी अधिनियम, 1960 के रूप में जाना जाता है। गीता प्रेस की आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक, अब तक 41.7 करोड़ से ज्यादा किताबें छापी गई हैं। ये पुस्तकें हिंदी के अलावा 14 भाषाओं में उपलब्ध हैं, जिनमें मराठी, गुजराती, उड़िया, संस्कृत, तेलुगु, कन्नड़, नेपाली, अंग्रेजी, बांग्ला, तमिल, असमिया और मलयालम शामिल हैं।

गीता प्रेस ने अब तक श्रीमद्भगवद्गीता की 16.21 करोड़ से अधिक प्रतियां छापी हैं। इसके अलावा इसने तुलसीदास की 11.73 करोड़ रचनाएं और पुराणों और उपनिषदों की 2.68 करोड़ प्रतियां छापी हैं।

गीता प्रेस कैसे काम करता है?

गीता प्रेस की वेबसाइट के मुताबिक इस संस्था का प्रबंधन गवर्निंग काउंसिल (ट्रस्ट बोर्ड) संभालती है। गीता प्रेस न तो चंदा मांगता है और न ही विज्ञापनों से पैसे कमाता है। इसका सारा खर्च वहन करने वाले लोगों और संगठनों द्वारा वहन किया जाता है जो सस्ती कीमतों पर प्रिंटिंग की आपूर्ति प्रदान करते हैं।

इतिहास में पहली बार 2014 में हड़ताल

दिसंबर 2014 में गीता प्रेस के कर्मचारी अपने वेतन को लेकर हड़ताल पर चले गए थे। इसके बाद गीता प्रेस ने भी अपने तीन कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया था। हालांकि, बाद में कर्मचारी संगठन और गीता प्रेस के ट्रस्टियों के बीच हुई बैठक में मामला सुलझ गया। गीता प्रेस ने उन तीन कर्मचारियों को भी वापस काम पर रख लिया था जिन्हें उसने पहले निकाल दिया था। गीता प्रेस के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ था कि वह लगभग तीन सप्ताह तक बंद रहा।

गीता प्रेस क्या प्रिंट करता है?

गीता प्रेस हिंदू धार्मिक ग्रंथों जैसे श्रीमद्भगवद्गीता, रामचरितमान, रामायण, पुराण और उपनिषद आदि को छापता है। इनके अलावा बच्चों में धर्म की समझ बढ़ाने के लिए गीता प्रेस से पुस्तकें भी प्रकाशित होती हैं। यह संस्था अब तक बच्चों के लिए 11 करोड़ से ज्यादा किताबें प्रकाशित कर चुकी है।

गीता प्रेस भी हर महीने ‘कल्याण’ नाम की पत्रिका निकालती है। पत्रिका में भक्ति, ज्ञान, योग, धर्म, वैराग्य, अध्यात्म जैसे विषयों को शामिल किया गया है। इसके साथ ही हर साल किसी विशेष विषय या शास्त्र को कवर करने वाला एक विशेष अंक भी निकलता है।

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क्या है गांधी शांति पुरस्कार?

गांधी शांति पुरस्कार की शुरुआत 1995 में केंद्र सरकार द्वारा की गई थी। हर साल यह पुरस्कार महात्मा गांधी के आदर्शों की याद दिलाने के तौर पर दिया जाता है। पुरस्कार प्राप्त करने वाले का भारतीय या भारतीय संगठन होना आवश्यक नहीं है। इस पुरस्कार के तहत एक करोड़ रुपये की राशि, एक प्रशस्ति पत्र और एक पट्टिका दी जाती है।

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो), रामकृष्ण मिशन, ग्रामीण बैंक ऑफ बांग्लादेश, विवेकानंद केंद्र, अक्षय पात्र, एकल अभियान ट्रस्ट और सुलभ इंटरनेशनल जैसे संस्थानों को यह पुरस्कार मिल चुका है। 2019 में यह पुरस्कार ओमान के सुल्तान कबूस बिन सईद अल सईद ने प्राप्त किया था। 2020 में, यह मरणोपरांत बांग्लादेश के पहले राष्ट्रपति बंगबंधु शेख मुजीबुर रहमान को दिया गया था।

यह भी पढ़ें: गीता प्रेस गोरखपुर को सम्मानित करने पर भड़की कांग्रेस, जयराम रमेश बोले- सावरकर-गोडसे को पुरस्कार देने जैसा है ये फैसला

First published on: Jun 19, 2023 06:52 PM

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