मंच पर छलका दर्द, वसुंधरा राजे के बयान से उजागर हुई बीजेपी की अंदरूनी कलह!

राजस्थान की सियासत में फिर हलचल, वसुंधरा राजे के भावुक बयान ने बढ़ाई चर्चा. कुर्सी जाने का दर्द मंच पर छलका, बीजेपी की अंदरूनी राजनीति और नेतृत्व को लेकर उठे कई सवाल. जानिए पूरी खबर.

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राजस्थान की सियासत में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है. पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे का एक भावुक बयान सामने आया है जिसमें वे खुलकर सबके सामने यह कहती नजर आ रही है कि उनके तो कुर्सी ही चली गई है लेकिन वह कुछ नहीं कर पा रही हैं ऐसे में जनता जब राजस्थान में बीजेपी की सरकार में काम नहीं होने कि उनसे गुहार लगाते हैं तो वह यह कहने को मजबूर हो जाती हैं कि जब भी अपने लिए कुछ नहीं कर पाई तो उनके लिए क्या कर सकेंगी.

वसुंधरा का यह बयान न केवल सरकार के कामकाज को लेकर जनता की भावनाओं को प्रदर्शित करने वाला समझा जा रहा है बल्कि मुख्यमंत्री नहीं बनाए जाने के बाद उनकी नाराजगी अब तक भी बरकरार रहने का संकेत दे रही है. यही कारण है कि राजनीतिक गलियारों से लेकर सोशल मीडिया तक उनका यह बयान चर्चा का केंद्र बन गया और मंच पर उनके शब्दों में जो दर्द झलका, उसने कई सवाल खड़े कर दिए हैं.

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झालावाड़-बारां सांसद और अपने बेटे दुष्यंत सिंह की जनसंवाद यात्रा के दौरान कामखेड़ा बालाजी धाम में आयोजित सभा में राजे ने खुलकर कहा— “भैया मैं नहीं लड़ सकती… जब मेरा ही चला गया… तो मैं तुम्हारे लिए क्या करूं.”

उनके इस बयान में कहीं न कहीं उस राजनीतिक पीड़ा की झलक साफ दिखी, जो उन्हें मुख्यमंत्री पद से दूर रहने के बाद से महसूस हो रही है. राजे यहीं नहीं रुकीं पार्टी कार्यकर्ता और आम जनता उनके पास पेंशन नहीं मिलने और काम नहीं होने की शिकायत लेकर आते हैं, लेकिन उन्हें समझना होगा जब मैं अपने आप के लिए कुछ नहीं कर सकी… तो तुम्हारे लिए क्या करूं.

यह बयान सीधे तौर पर उस निराशा को दर्शाता है, जो पार्टी के भीतर उनकी भूमिका और प्रभाव को लेकर समय-समय पर सामने आती रही है.
इससे पहले बीजेपी के स्थापना दिवस पर भी राजे ने जयपुर में bjp के तमाम बड़े नेताजी के बीच मंच से ही ‘निष्ठावान कार्यकर्ताओं’ को जिम्मेदारी देने की बात कहकर इशारों-इशारों में पार्टी नेतृत्व को संदेश दिया था की वर्तमान हालातो में वह भाजपा संगठन और अपनी ही पार्टी के सरकार से क्या चाहती हैं. अब उनके ताज़ा बयान ने उन अटकलों को और हवा दे दी है कि वे अपनी राजनीतिक स्थिति को लेकर असहज हैं.

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झालावाड़ 12 यूं तो खुद वसुंधरा राज्य का राजनीतिक गढ़वी है यही से उन्होंने अपनी राजनीति की शुरुआत की थी पांच बार सांसद और लगातार अब तक यहां से विधायक रहने के बाद भी इस इलाके में उनके बेटे दुष्यंत सिंह के साथ अचानक एक बार दिए से मैदान में उतरने के राजनीतिक मायने भी अब निकाले जाने लगे हैं. खुद वसुंधरा इन दिनों राज्यभर के दौरे पर हैं और जनता को उनकी सरकार द्वारा किये गए कार्यों की याद भी दिला रही हैं. ऐसे में कहा जा रहा है कि अपनी राजनीतिक जमीन को फिर आए मजबूत करने के साथ वसुंधरा राजे इन दिनों अपने और अपने बेटे दुष्यंत सिंह के साथ लगातार जनसंवाद यात्रा को जरिया बना रही है. सियासी जानकार इसे उनके बेटे के राजनीतिक भविष्य को मजबूत करने की कोशिश के तौर पर देख रहे हैं.

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वैसे, राजे का आये दिन किसी न किसी बात को लेकर तंज कसने के यह भावुक अंदाज महज एक बयान नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे राजस्थान बीजेपी के अंदर चल रही हलचल और शक्ति संतुलन के संकेत के रूप में देखा जा रहा है. अब सवाल यह है—क्या यह ‘दर्द’ आने वाले दिनों में किसी बड़े सियासी बदलाव की भूमिका बनेगा?

राजस्थान की राजनीति में इस बयान ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि यहां हर शब्द के पीछे कई मायने छिपे होते हैं… और हर भावुकता, एक नई कहानी लिख सकती है.

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