महाराष्ट्र की सियासत में एक और बड़ा राजनीतिक उलटफेर सामने आया है. उपमुख्यमंत्री सुनेत्रा पवार के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस को रायगढ़ जिले में बड़ा झटका लगा है. सांसद सुनील तटकरे और मंत्री अदिति तटकरे का मजबूत राजनीतिक गढ़ माने जाने वाले म्हसला नगर पंचायत में शिंदे गुट की शिवसेना ने कांग्रेस के समर्थन से सत्ता पर कब्जा जमा लिया. करीब एक दशक से कायम राष्ट्रवादी कांग्रेस की सत्ता को उखाड़ फेंकते हुए शिंदे सेना ने यहां भगवा लहरा दिया है. इस घटनाक्रम को सिर्फ स्थानीय सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि महाराष्ट्र की बदलती राजनीतिक बिसात पर बड़े संकेत के तौर पर देखा जा रहा है.
गुरुवार को नगराध्यक्ष पद के लिए हुई विशेष सभा में पूरे राज्य की निगाहें टिकी थीं. कारण साफ था, यह मुकाबला सीधे तौर पर अजित पवार गुट और उप मुख्यमंत्री एकनाथ शिन्दे की शिवसेना की प्रतिष्ठा से जुड़ गया था. मतदान प्रक्रिया पूरी होने के बाद तस्वीर साफ हुई और शिंदे गुट ने बहुमत का आंकड़ा अपने पक्ष में कर लिया.
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17 सदस्यीय नगर पंचायत में 9 नगरसेवकों का समर्थन जुटाकर शिंदे गुट ने सत्ता की बाजी मार ली. शिवसेना उम्मीदवार शाहिद जंजीरकर ने राष्ट्रवादी कांग्रेस के उम्मीदवार सुनील शेडगे को मात देते हुए नगराध्यक्ष पद पर कब्जा जमा लिया. नतीजे सामने आते ही शिंदे गुट के कार्यकर्ताओं ने जोरदार शक्ति प्रदर्शन किया.
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दरअसल, म्हसला की यह राजनीतिक पटकथा पिछले कई महीनों से तैयार हो रही थी. राष्ट्रवादी कांग्रेस के तत्कालीन नगराध्यक्ष समेत सात नगरसेवकों ने कुछ महीने पहले शिंदे गुट का दामन थाम लिया था. इसके बाद राष्ट्रवादी कांग्रेस ने दल-बदल विरोधी कानून के तहत कार्रवाई की मांग उठाई थी. जनवरी 2026 में रायगढ़ जिलाधिकारी ने सात नगरसेवकों को अयोग्य घोषित कर शिंदे गुट को बड़ा झटका भी दिया था. उस वक्त माना जा रहा था कि तटकरे खेमे ने एकनाथ शिंदे के करीबी विधायक भरत गोगवले की रणनीति को मात दे दी है.
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लेकिन महाराष्ट्र की राजनीति में समीकरण कब करवट ले लें, यह कहना मुश्किल है. भरत गोगावले ने कांग्रेस के साथ नई राजनीतिक बिसात बिछाई और आखिरकार म्हसला नगर पंचायत की सत्ता फिर अपने खेमे में खींच ली. यही वजह है कि इस जीत को शिंदे गुट के लिए सिर्फ स्थानीय निकाय की जीत नहीं, बल्कि अजित पवार गुट के प्रभाव क्षेत्र में की गई बड़ी राजनीतिक घुसपैठ माना जा रहा है.
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राजनीतिक जानकारों का मानना है कि रायगढ़ में हुआ यह सत्ता परिवर्तन महायुति के भीतर बदलते शक्ति संतुलन का संकेत भी है. खासकर ऐसे समय में, जब राज्य में शिवसेना, भाजपा और अजित पवार गुट के बीच अंदरूनी वर्चस्व की लड़ाई लगातार चर्चा में है, तब तटकरे परिवार के प्रभाव वाले इलाके में शिंदे गुट की यह जीत महाराष्ट्र की राजनीति में दूरगामी संदेश देने वाली मानी जा रही.