देश के नेशनल हाईवे और एक्सप्रेसवे पर सफर करने वालों के लिए जल्द एक बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है. अब बारिश, घना कोहरा, धूलभरी आंधी या अन्य खराब मौसम की स्थिति में वाहनों की अधिकतम स्पीड लिमिट घटा दी जाएगी.अभी जहां सामान्य मौसम में कारों के लिए हाईवे पर 100 किमी प्रति घंटा और एक्सप्रेसवे पर 120 किमी प्रति घंटा तक की रफ्तार की अनुमति है, वहीं विजिबिलिटी कम होने या मौसम खराब होने पर यही सीमा घटाकर करीब 60 से 80 किमी प्रति घंटा की जा सकती है. इतना ही नहीं, इस प्लान के अनुसार, अगर कोई वाहन चालक तय लिमिट से आगे बढ़ता है, तो उसका ई-चालान कट जाएगा, जिसकी सूचना उसे ईमेल आदि पर भेज दिया जाएगा.
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सेंसर, वेदर स्टेशन और मोबाइल अलर्ट से चलेगा पूरा सिस्टम
इस नई व्यवस्था के लिए हाईवे और एक्सप्रेसवे पर अत्याधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा. सड़क किनारे जगह-जगह विजिबिलिटी सेंसर और वेदर स्टेशन लगाए जाएंगे, जो बारिश, धुंध, धूल और हवा की स्थिति पर नजर रखेंगे. जैसे ही किसी हिस्से में मौसम खराब होगा, यह सिस्टम कंट्रोल रूम को रीयल-टाइम अलर्ट भेजेगा. इसके बाद डिजिटल साइन बोर्ड, कार स्क्रीन और मोबाइल अलर्ट के जरिए ड्राइवरों को तुरंत जानकारी दी जाएगी कि उस हिस्से में स्पीड कम रखनी है. जियो-फेंसिंग और सेल ब्रॉडकास्ट तकनीक की मदद से प्रभावित इलाके में प्रवेश करते ही ड्राइवर के फोन पर चेतावनी संदेश भी पहुंच सकेगा, और इसके लिए इंटरनेट जरूरी नहीं होगा.
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70-80 फीसदी तक कम हो सकते हैं एक्सीडेंट
माना जा रहा है कि, इस सिस्टम का सबसे बड़ा मकसद खराब मौसम में होने वाले सड़क हादसों को कम करना है. विशेषज्ञों द्वारा तैयार किए गए आकलन के मुताबिक, अगर डायनमिक स्पीड लिमिट और रीयल-टाइम चेतावनी प्रणाली सही तरीके से लागू होती है, तो एक्सप्रेसवे और हाईवे पर फिसलन, कम विजिबिलिटी और अचानक ब्रेकिंग की वजह से होने वाले हादसों में 70 से 80 फीसदी तक कमी लाई जा सकती है. भारत में हर साल बड़ी संख्या में सड़क दुर्घटनाएं सिर्फ इसलिए होती हैं क्योंकि चालक मौसम खराब होने के बावजूद सामान्य रफ्तार से वाहन चलाते रहते हैं. ऐसे में यह तकनीक सड़क सुरक्षा के लिहाज से बड़ा कदम मानी जा रही है.
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कहां-कहां लगेगा ये सिस्टम?
जानकारी के मुताबिक, इस नई व्यवस्था की शुरुआत पहले चरण में कुछ चुनिंदा रूट्स पर की जाएगी. शुरुआती ट्रायल दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे और उत्तर प्रदेश के गंगा एक्सप्रेसवे के कुछ संवेदनशील हिस्सों पर किया जा सकता है. वहां से मिले नतीजों और तकनीकी सुधार के बाद इसे धीरे-धीरे देश के दूसरे बड़े ग्रीनफील्ड एक्सप्रेसवे और दुर्घटना-प्रभावित नेशनल हाईवे पर लागू किया जाएगा. सरकारी आंकड़े बताते हैं कि भारत में हर साल करीब 1.5 लाख लोग सड़क हादसों में जान गंवाते हैं और इनमें बड़ी संख्या ऐसे मामलों की होती है, जहां खराब मौसम और कम विजिबिलिटी अहम वजह बनती है.
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