Rohit Sharma: मशहूर भारतीय शायर निदा फाज़ली साहब का एक शेर है कि, 'कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता! किसी को पूरी ज़मीं तो, किसी को आसमां नहीं मिलता…' रोहित शर्मा के उस वन-डे वर्ल्ड कप जीतने के अधूरे ख्वाब को देखकर आज यह बात एकदम सच लगने लगी है. मीडिया रिपोर्ट्स को सच माना जाए तो 19 जुलाई के दिन, क्रिकेट का मक्का कहा जाने वाला लॉर्ड्स के ऐतिहासिक मैदान पर करोड़ों रोहित शर्मा के फैंस का दिल टूटने वाला है.

भारत और इंग्लैंड के बीच वन-डे सीरीज़ का तीसरा और आखिरी मुकाबला शायद उस सुनहरे सफर का भी आखिरी मैच बनने जा रहा है. जिस रोहित शर्मा ने सालों तक पूरी दुनिया को अपनी बल्लेबाज़ी से एंटरटेन किया, उन्हीं को सिलेक्टर्स ने साफ कर दिया है कि 2027 वन-डे वर्ल्ड कप के विजन में अब वो फिट नहीं बैठते. खबर भारतीय फैंस को अंदर तक झकझोर सकती है क्योंकि मुमकिन है टेस्ट और टी20 से पहले ही संन्यास ले चुके रोहित अब शायद इंटरनेशनल क्रिकेट को पूरी तरह अलविदा कह देंगे.

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कप्तानी का सुनहरा दौर और वर्ल्ड कप की वो टीस

जिस खिलाड़ी ने 2023 वन-डे वर्ल्ड कप में अपनी कप्तानी और 'Selfless' बल्लेबाज़ी से टीम को अजेय रहते हुए फाइनल तक पहुंचाया, क्या उसका अंत ऐसा होना चाहिए? माना कि वो रात हमारे लिए एक बुरा सपना बन गई, लेकिन उसके बाद उसी रोहित ने हार नहीं मानी. अपनी कप्तानी में भारत का परचम लहराते हुए उन्होंने टी20 वर्ल्ड कप 2024 और मिनी वर्ल्ड कप कही जाने वाली आईसीसी चैंपियंस ट्रॉफी का भी खिताब जिताया. लेकिन रोहित हमेशा कहते रहे कि उन्हें भारत को वन-डे वर्ल्ड कप जिताना है. 2023 की वो कसर उनके दिल में आज भी बाकी है. अपनी उस अधूरी ख्वाहिश को पूरा करने के लिए, खासकर ये जानते हुए कि ये आखिरी मौका होगा रोहित कुछ भी कर सकते हैं.

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आंकड़ों का वो एवरेस्ट और 'हिटमैन' की ऐतिहासिक पारियां

करीब 23 साल लंबे अपने खेल पत्रकारिता के करियर में मैंने अनगिनत क्रिकेटर्स देखे हैं. सचिन से लेकर धोनी और विराट से लेकर आज के दौर में शुभमन गिल तक, क्रिकेटर्स की लंबी फेहरिस्त है. लेकिन सच कहूं तो वन-डे क्रिकेट में रोहित जैसा प्रभाव एक-दो नामों को छोड़कर शायद ही किसी का रहा होगा. रोहित के करियर को सिर्फ हार-जीत से नहीं आंका जा सकता. उन्होंने जो विरासत खड़ी की है, वो आंकड़ों का एक ऐसा एवरेस्ट है जिसे छूना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन सा लगता है.

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वन-डे क्रिकेट के इतिहास में तीन-तीन दोहरे शतक जड़ने वाला इकलौता बल्लेबाज़. श्रीलंका के खिलाफ ईडन गार्डन्स में खेली गई 264 रनों की वो पारी महज़ एक स्कोर नहीं, बल्कि क्रिकेट इतिहास का अजूबा है. इसके अलावा 2019 वन-डे वर्ल्ड कप में 5 शतक जड़ने का वो करिश्मा, जिसने दुनिया भर के गेंदबाज़ों में खौफ भर दिया था. 'हिटमैन' का पुल शॉट सिर्फ एक क्रिकेटिंग शॉट नहीं, बल्कि भारतीय फैंस के लिए सुकून का एहसास रहा है. आईसीसी की वन-डे रैंकिंग में रोहित आज भी दुनिया के चौथे नंबर के बल्लेबाज़ हैं.

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मैदान पर हमारा अपना 'शर्मा जी का बेटा'

इन तमाम रिकॉर्ड्स के बावजूद, रोहित की सबसे बड़ी खूबी उनका आम आदमी जैसा स्वभाव है. वो पिच पर खेलते हुए किसी सुपरहीरो से ज़्यादा हमें अपने बीच का ही एक इंसान लगते हैं, बिल्कुल 'शर्मा जी के बेटे' की तरह. उनका बेबाक और मस्तमौला अंदाज़, टॉस के वक्त फैसले भूल जाना, अपनी ही टीम के खिलाड़ियों का नाम भूल जाना और मैदान पर साथी खिलाड़ियों को देसी अंदाज़ में डांटना फैंस को बहुत भाता है. स्टंप माइक में कैद हुई उनकी वो आवाज़, 'कोई भी गार्डन में घूमेगा…' ये सब बताता है कि वो दिल के कितने साफ हैं. वो कप्तान के साथ-साथ एक बड़े भाई की तरह टीम को चलाते थे. सच कहूं तो हम भारतीयों के लिए रोहित का यही अनफिल्टर्ड अंदाज़ उन्हें सीधे हमारे दिलों में उतार देता है.

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अचानक टीम मैनेजमेंट के लिए 'बोझ' बने रोहित?

सवाल ये है कि क्या इतना बड़ा खिलाड़ी अचानक टीम मैनेजमेंट को बोझ लगने लगा है ? हाल ही में अफगानिस्तान के खिलाफ 16, 48 और 79 रन की पारियां उन्होंने खेलीं. वहीं इंग्लैंड के खिलाफ पहले दो मैचों में महज़ 11 और 26 रन बने. मेरी राय में, क्या सिर्फ इन पारियों के आधार पर 40 साल के उस योद्धा के करियर का फैसला किया जा सकता है, जिसने हाल ही में अपनी फिटनेस पर जी-तोड़ मेहनत की है.

चीफ सिलेक्टर अजीत अगरकर और हेड कोच गौतम गंभीर की सख्त रणनीति पर अब सवाल उठ रहे हैं. गंभीर को कड़े फैसलों के लिए जाना जाता है, लेकिन क्या रोहित को लेकर उनका यह कदम जल्दबाज़ी नहीं है ? टीम इंडिया की लगातार मजबूत होती बेंच स्ट्रेंथ के बीच, हालांकि रोहित को लेकर कोई भी फैसला अभी औपचारिक नहीं है. लेकिन फिर भी एक महान कप्तान को इस तरह किनारे करना करोड़ों फैंस को आसानी से पचने वाला नहीं है.

उम्र सिर्फ एक नंबर, गंभीर के प्रयोग कितने सही?

खेल में अक्सर कहा जाता है कि युवाओं को मौका मिलना चाहिए, लेकिन क्या यह हमेशा जीत की गारंटी है? सच तो यह है कि ऐसे महान खिलाड़ियों के लिए उम्र महज़ एक नंबर होती है. हेड कोच गौतम गंभीर जिस तरह के एक्सपेरिमेंट लगातार कर रहे हैं, उससे टीम का कितना भला हो रहा है, यह पूरी दुनिया देख रही है. ज़रा सोचिए, 2025 की आईसीसी चैंपियंस ट्रॉफी में जो शानदार जीत हमें मिली.

उसका असली श्रेय रोहित शर्मा और राहुल द्रविड़ की बनाई उसी मजबूत टीम और मानसिकता को जाता है. उसी टीम की एक अहम कड़ी 2026 में भी टीम इंडिया को टी20 वर्ल्ड कप जिताने में सफल रही. अगर गंभीर की अपनी पसंद से टीम में बनाए रखे गए खिलाड़ियों की लिस्ट और उनके प्रदर्शन की पड़ताल शुरू की जाए, तो कई ऐसे विरोधाभास खड़े हो जाएंगे जिनका जवाब शायद खुद मैनेजमेंट के पास न हो. ऐसे में, क्रिकेट के एक सर्वकालिक महान खिलाड़ी को सिर्फ उम्र का हवाला देकर बाहर कर देना किसी भी लिहाज़ से इंसाफ नहीं लगता.

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दिल कहता है, 'बस एक मौका और दो'

आज हर फैन की तरह मेरे ज़हन में भी एक गहरा द्वंद्व है. एक तरफ यह भावुक दिल चीख-चीख कर कह रहा है कि रोहित के उस अधूरे ख्वाब के लिए अगरकर और गंभीर को वक्त देना चाहिए. क्या कोई इस बात से इनकार कर सकता है कि साउथ अफ्रीका और ज़िम्बाब्वे की उन चुनौतीपूर्ण विदेशी पिचों पर जब 2027 में गेंद स्विंग करेगी, तो रोहित शर्मा जैसा अनुभवी मैच विनर एक बड़ा संकटमोचक साबित हो सकता है. अगर मैनेजमेंट को उनकी फॉर्म पर रत्ती भर भी शक है, तो एक बार उन्हें बेफिक्र होकर अपने अंदाज़ में खेलने की आज़ादी देकर देखिए. सारे संशय पल भर में मिट जाएंगे.

वक्त का तकाज़ा और जहां की कड़वी हकीकत

वैसे वक्त का तकाज़ा एक दूसरी ही हकीकत बयां करता है. एक कड़वी सच्चाई, जिसे शायद भारी मन से ही सही पर खुद रोहित को भी मान लेना चाहिए. दरअसल देश और दुनिया में मौजूद रोहित शर्मा का कोई भी मुरीद ये नहीं चाहेगा कि करियर के इस पड़ाव पर आकर भारतीय क्रिकेट के इस दिग्गज का टीम में जगह को लेकर अपमान हो. मान लिया जाए कि रोहित टीम में सिलेक्ट होते रहें लेकिन प्लेइंग-11 से उन्हें बाहर रखा जाए. ऐसी स्थिति तो कोई भी नहीं देखना चाहेगा.

यशस्वी जायसवाल, संजू सैमसन और ईशान किशन जैसे युवा टैलेंट अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे हैं. मेरी व्यक्तिगत राय में भी, बदलाव क्रिकेट का एक क्रूर लेकिन ज़रूरी नियम है. निदा फाज़ली की वो बात यहां फिर याद आती है कि हर किसी को सब कुछ मिले यह ज़रूरी तो नहीं. आप महान थे, महान हैं और क्रिकेट के इतिहास में हमेशा महान ही गिने जाएंगे. लॉर्ड्स की वो बालकनी जब आपको आखिरी बार नीली जर्सी में देखेगी, तो शायद क्रिकेट के खेल की भी आंखें नम होंगी. लॉर्ड्स के मैदान पर क्रिकेटर मैच खेलने का ख्वाब देखते हैं, रोहित भी याद रखेंगे कि उन्होंने अपना आखिरी मैच वहीं खेला था.

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