ट्रॉफियों के शोर में क्यों दबी टेस्ट की चीख, टीम इंडिया के 'गंभीर' काल का ज़िम्मेदार कौन?
जो अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाए वो है ‘गौतम’ और ‘गंभीर’ यानी वो शख्सियत जो सघन, अडिग और शांत रहकर बड़े फैसले ले सके. भारतीय क्रिकेट इतिहास में इस नाम की धमक भी ऐसे नायक की है जो अकेले अपने दम पर बाज़ी पलटने का माद्दा रखता था. एक क्रिकेटर के तौर पर कभी हार ना मानने वाले फाइटर और चैंपियन की पहचान रखने वाले गौतम गंभीर, आज भारतीय टीम के हेड कोच हैं.
उन्होंने व्हाइट बॉल क्रिकेट में टीम इंडिया को महज़ दो साल के भीतर 2-2 आईसीसी खिताब दिलाए हैं, खुद को ‘धुरंधर’ साबित किया. लेकिन मानो या ना मानो सबकुछ होने के बाद भी गौतम गंभीर का रणनीतिक जादू सवालों के घेरे में है. टेस्ट क्रिकेट में घरेलू सरज़मीं पर शर्मनाक हार के सिलसिले, मनमाने चयन और विरोधाभासी फैसलों ने उनके ‘सुप्रीम बॉस’ वाले रसूख को भारतीय क्रिकेट का ‘गंभीर’ संकटकाल बना दिया है.
2007 का टी20 वर्ल्ड कप फाइनल हो या 2011 का वनडे वर्ल्ड कप फाइनल, जब-जब भारतीय क्रिकेट पर संकट के बादल छाए गौतम गंभीर का बल्ला एक रक्षक की तरह तनकर खड़ा हो गया. इन दोनों मौकों पर टीम के लिए गंभीर ही टॉप स्कोरर रहे, अपनी आवाज़ और अंदाज़ से हमेशा ‘टीम फर्स्ट’ अप्रोच के सिपाही रहे गौतम गंभीर आईपीएल में भी कोलकाता नाइट राइडर्स की कामयाबी के सिरमौर रहे.
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वो गंभीर ही थे जिन्होंने केकेआर को पहले बतौर कप्तान दो बार और फिर बतौर मेंटॉर चैंपियन बनाकर अपनी रणनीतिक सूझबूझ का लोहा मनवाया. इसी सुनहरी साख के दम पर जब गंभीर ने भारतीय टीम के हेड कोच का पद संभाला था, तो लगा कि टीम इंडिया अब एक नए युग में प्रवेश कर रही है. लेकिन जहां गंभीर के आने के बाद व्हाइट बॉल क्रिकेट में टीम इंडिया का इतिहास ‘सुनहरे’ अक्षरों में लिखा गया, वहीं रेड बॉल क्रिकेट में मानो उनका कार्यकाल भारतीय क्रिकेट के लिए एक ‘गंभीर’ संकटकाल बन गया है.
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व्हाइट बॉल के हीरो, टेस्ट में ज़ीरो!
शायद क्रिकेट के कई पंडित आज भी यही कहेंगे कि बतौर कोच गौतम गंभीर का कार्यकाल किसी ख्वाब जैसा माना जा सकता है. उन्हीं की सरपरस्ती में भारतीय टीम ने महज़ 2 साल में 2025 आईसीसी चैंपियंस ट्रॉफी और फिर 2026 टी20 वर्ल्ड कप जीतकर इतिहास रच दिया. बतौर कोच गौतम गंभीर की ये ऐसी उपलब्धि है जिसे सदियों तक याद रखा जाएगा. लेकिन जैसे ही इस सुनहरे पन्ने को पलटकर हम रेड बॉल फॉर्मेट यानी टेस्ट क्रिकेट को देखते हैं, तो पूरी कहानी ही पलट जाती है.
2024 में गौतम गंभीर के आने से पहले टीम इंडिया टेस्ट की लगातार नंबर-1 टीम रही. घरेलू पिचों के अलावा विदेशी सरज़मीं पर भी जीत का स्वाद चखना भारतीय टीम की आदत बन चुका था. वर्ल्ड टेस्ट चैंपियनशिप के शुरुआती दोनों साइकिल्स में टीम इंडिया 2021 और 2023 में रनरअप रही. साल 2024 के भी आखिरी कुछ महीनों तक टीम इंडिया तीसरे WTC फाइनल की सबसे बड़ी दावेदार दिख रही थी, लेकिन फिर कुछ ऐसा हुआ कि टीम 2025 आते-आते रेस से ही बाहर हो गई. भारतीय क्रिकेट का जो किला कभी अभेद्य माना जाता था, उसकी दीवारें एक-एक कर ढहने लगीं.
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Gautam Gambhir Instructs Rishabh Pant to Play Defensively Even Before He Enters to Bat 🙏 pic.twitter.com/UgVFRkzFqi
दरअसल यही वो ‘गंभीर’ दौर था जब भारतीय टीम को घरेलू कंडीशंस में न्यूजीलैंड की ‘बी’ टीम कही जा रही टीम के खिलाफ भी अपनी पहली सीरीज़ हार का सामना करना पड़ा. क्रिकेट फैंस के लिए गौतम गंभीर ऐसे घाव की वजह बन चुके थे जिसे सह पाना आसान नहीं था. इसके बाद आई ऑस्ट्रेलियाई दौरे पर खेली गई बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी. जहां सालों की बादशाहत और लगातार दो सीरीज़ जीत का गौरव इस बार मिट्टी में मिल गया, भारत की करारी हार हुई और दबे लफ्ज़ों में ठीकरा कप्तान रहे रोहित शर्मा पर फोड़ दिया गया.
बदलते हालात में टीम इंडिया की ‘त्रिमूर्ति’ जिसमें रोहित शर्मा, विराट कोहली और आर अश्विन जैसे दिग्गजों के चेहरे शामिल थे टेस्ट को अचानक अलविदा कर गई. तीसरे वर्ल्ड टेस्ट चैंपियनशिप साइकिल फाइनल का सपना तो ध्वस्त हो चुका था लेकिन फिर ‘जले पर नमक’ का काम किया 2025-27 WTC साइकिल में साउथ अफ्रीका के खिलाफ घर पर मिली एक और 2-0 से सीरीज़ की हार ने. यहां भी वो हुआ जिसकी किसी ने उम्मीद तक ना की थी.
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टीम के ‘सुप्रीम बॉस’ फिर विरोधाभास क्यों?
क्रिकेट के गलियारों में यह चर्चा आम है कि मौजूदा दौर में गौतम गंभीर सिर्फ एक कोच नहीं, बल्कि भारतीय क्रिकेट टीम के ‘सुप्रीम बॉस’ हैं. भविष्य के लिए टीम का टैलेंट पूल तैयार करने से लेकर कप्तानी और सिलेक्शन के फैसलों तक, हर जगह गंभीर की मर्जी का सिक्का चलता है. लेकिन इसी ‘असीमित अधिकार’ ने कई ऐसे फैसलों को जन्म दिया है जिसने सबको हैरान किया है.
विराट-रोहित जैसे दिग्गजों की टेस्ट फॉर्मेट से विदाई के लिए गंभीर अगर ज़िम्मेदार ना भी हों, तो भी जसप्रीत बुमराह, केएल राहुल और ऋषभ पंत जैसे सीनियर और अनुभवी नामों से पहले शुभमन गिल को टेस्ट टीम का कप्तान बनाया जाना समझ से परे ही कहा जाएगा. फिर वो भी गंभीर ही हैं जिनपर टीम सिलेक्शन के दौरान भी पक्षपात के आरोप लगते रहे हैं. कई मौकों पर आईपीएल की फॉर्म को आधार बनाकर टेस्ट टीम में खिलाड़ियों को चुनना और देवदत्त पड्डिकल, अभिमन्यु ईश्वरन या मोहम्मद शमी जैसे घरेलू क्रिकेट के तपस्वियों को प्लेइंग-11 में सही मौका न देना, गंभीर की सोच को गलत ठहराता रहा है.
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गंभीर काल में पनपी है ‘असुरक्षा’ की भावना!
भारतीय क्रिकेट और क्रिकेटर्स को जानने वाले ये बात बखूबी मानेंगे कि गौतम गंभीर भले ही बहुत बड़े नाम हों. लेकिन बतौर कोच उनका काम करने का अंदाज़ ड्रेसिंग रूम के माहौल में असुरक्षा की भावना पैदा कर रहा है. अच्छे प्रदर्शन के बावजूद खिलाड़ियों को कभी टीम तो कभी प्लेइंग-11 में मौका ना मिलना, चैंपियन कप्तान के खिलाफ एकाएक से माहौल का बदल जाना, प्लेइंग-11 में मौका मिलने पर बार-बार पोज़ीशन और ज़िम्मेदारियों को लेकर एक्सपेरिमेंट्स का होना क्रिकेट के किस कोचिंग मैन्युअल में सही ठहराया जाएगा?
एक मज़ेदार बात बताता हूं, यह कहानी गंभीर के अपने अतीत से भी जुड़ती है. कई साल पहले जब वो भारतीय टीम के उप-कप्तान थे, तब एक विदेशी दौरे पर खराब प्रदर्शन के बाद सिलेक्टर्स ने तत्कालीन कप्तान या कोच को बचाने के लिए गंभीर को अचानक पद से हटा दिया था. सालों बाद गंभीर ने इस दोहरे मापदंड पर सिलेक्टर्स और बोर्ड को जमकर कोसा था. मगर आज जब वो खुद कोच हैं, तो सही गलत की पहचान धुंधली हो गई है. टेस्ट में टीम लगातार हारी तो खुद गंभीर या कप्तान शुभमन गिल पर आंच नहीं आई. ठीकरा उप-कप्तान ऋषभ पंत पर फोड़कर, गैर-जिम्मेदाराना शॉट का बहाना बनाकर उनसे उप-कप्तानी छीन ली गई.
During PC, when Gambhir was asked about Rishabh Pant’s test vice captaincy removal, he said :
“Player’s responsibility is to play for India, captaincy and vice captaincy is just by product, when you play for India, you don’t think for captaincy or vice captaincy”
क्रिकेट आंकड़ों का खेल है इसलिए यहां कुछ आंकड़े भी लिखना सही होगा. बतौर कोच गौतम गंभीर के कार्यकाल में टीम इंडिया ने कुल 12 टेस्ट मैच खेले हैं. जिसमें से 9 मैच में उसे हार और 3 में जीत मिली है. इसमें भी न्यूज़ीलैंड से भारत को घर पर 3-0 और साउथ अफ्रीका से भी घर पर 2-0 से हार का सामना करना पड़ा था. खैर ये तो गुज़रे दिनों की बात है, आगे देखें तो गौतम गंभीर के लिए टेस्ट के टेस्ट का नयी चुनौती फिर शुरू होने जा रही है, जहां उन्हें अपनी रणनीतियों का ‘डैमेज कंट्रोल’ करना होगा.
मौजूदा 2025-27 वर्ल्ड टेस्ट चैंपियनशिप साइकिल में भारत की स्थिति पहले ही नाजुक हो चुकी है. साख बचाने के लिए श्रीलंका और न्यूजीलैंड के खिलाफ उन्हीं के घर पर तो वेस्टइंडीज के खिलाफ घर पर टेस्ट सीरीज़ होगी. अंत में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ 5 मैचों की घरेलू बॉर्डर गावस्कर ट्रॉफी का भी महा मुकाबला रहेगा. जहां एक भी हार, उम्मीदों को सोच से भी बड़ा झटका दे सकती है. गंभीर को टीम सिलेक्शन के दौरान अब उन चेहरों पर भी भरोसा दिखाने की हिम्मत करनी होगी, जो घरेलू क्रिकेट की अग्निपरीक्षा को पारकर ‘कुंदन’ बन निकले हैं. ऐसे जीत और मौकों के भूखे युवा नाम, नाकाबिल आउट ऑफ फॉर्म दिग्गजों से कहीं बेहतर हो सकते हैं.
वैसे कोई कुछ भी कहे, ना जाने क्यों.. मुझे तो लगता है कि अब समय आ गया है कि बीसीसीआई सिर्फ पुरानी साख के भरोसे बैठना बंद करे और कड़े व्यावहारिक फैसले ले. जब ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड जैसी दुनिया की दिग्गज टीमें ‘स्प्लिट कोचिंग’ यानी अलग-अलग फॉर्मेट के लिए अलग कोच के सफल मॉडल को अपनाकर आगे बढ़ सकती हैं, तो हमें कौन सी मजबूरी है? एक ही कोच से खेल के तीनों बिल्कुल जुदा फॉर्मेट्स में एक जैसी सफलता की उम्मीद करना बेमानी है.
वक्त का तकाजा है कि व्हाइट-बॉल के लिए गौतम गंभीर की आक्रामक रणनीतियों का पूरा इस्तेमाल किया जाए, लेकिन टेस्ट क्रिकेट की बिखरती तकदीर को संवारने के लिए रेड बॉल के प्रति समर्पित एक स्पेशलिस्ट और शांत दिमाग वाले कोच को कमान सौंपी जाए. इसके लिए वीवीएस लक्ष्मण या जस्टिन लैंगर जैसे पूर्व विदेशी दिग्गज भी विकल्प हो सकते है. फैसला या तो खुद गौतम गंभीर को लेना है या फिर बीसीसीआई को. सवाल ‘पर्सन फर्स्ट’ से पहले ‘टीम फर्स्ट’ की सोच को सही साबित करने का है.