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दुनिया के कई देशों ने अपनी रेल व्यवस्था को आधुनिक बनाने के लिए एक ही ट्रैक पर अलग-अलग ट्रेनों को चलाने की दिशा में बड़े कदम उठाए हैं. भारत भी अब इसी कतार में शामिल होकर अपनी परिवहन प्रणाली को एक नई और ऊंचे स्तर की पहचान दिलाने जा रहा है.

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मेरठ में नमो भारत और मेरठ मेट्रो का एक ही पटरी पर चलना तकनीक की बड़ी मिसाल है. इससे पहले बांग्लादेश ने अपने नेटवर्क में तीन पटरियों का उपयोग कर ब्रॉड और मीटर गेज ट्रेनों को एक साथ चलाकर दिखाया है.

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ब्राजील और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में भी मिक्स्ड गेज तकनीक का इस्तेमाल बहुत समय से किया जा रहा है. वहां की पटरियों पर अलग-अलग चौड़ाई वाली मालगाड़ियां और पैसेंजर ट्रेनें एक ही मार्ग से गुजरती हैं.

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यूरोप के देशों में फ्रांस और जर्मनी ने भी अपनी रेल लाइनों को इस तरह विकसित किया है कि वहां विभिन्न प्रकार की ट्रेनें चल सकें. इन देशों ने आधुनिक सिग्नल और ट्रैक मैनेजमेंट के जरिए रेल संचालन को बहुत ही सुगम बना दिया है.

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फिनलैंड और हंगरी में ड्यूअल गेज तकनीक के कारण रेल कनेक्टिविटी को बहुत मजबूती मिली है. इन देशों में रेल नेटवर्क का विस्तार करते समय अलग-अलग साइज की ट्रेनों की जरूरतों का पूरा ध्यान रखा गया है.

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रूस और यूक्रेन में भी तीन या चार पटरियों वाले ट्रैक का उपयोग कर अलग-अलग श्रेणियों की ट्रेनों का संचालन किया जाता है. यह तकनीक न केवल जमीन बचाती है बल्कि रेल प्रबंधन की लागत को भी कम करने में मददगार साबित होती है.

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स्लोवेनिया ने भी मिक्स्ड गेज के सफल प्रयोग से दुनिया को बताया है कि एक ही पथ पर दो तरह की सेवाओं को कैसे चलाया जाए. यह तकनीक भविष्य की रेल यात्रा के लिए पूरी दुनिया में एक मील का पत्थर साबित हो रही है.