Periods Ki Shiksha Kab Deni Chahiye: भारत में आज भी बच्चों से शरीर, पीरियड्स और प्रजनन स्वास्थ्य जैसे विषयों पर खुलकर बात नहीं की जाती. घर से लेकर स्कूलों में आज भी इसको लेकर झिझक है और समाज में इन विषयों को अक्सर शर्म से जोड़कर देखा जाता है. इसका परिणाम यह होता है कि किशोरावस्था में महिलाओं को सही जानकारी नहीं मिलती है. इसकी वजह से यौन और प्रजनन स्वास्थ्य की शिक्षा, जिसे अक्सर संकोच के साथ टाला जाता है. इसको लेकर एक्सपर्ट डॉक्टर प्रीथा भक्ता (जो कार्यक्रम डिजाइन और विकास, मैजिक बस इंडिया फाउंडेशन की निदेशक हैं) का कहना है कि बच्चों को सही उम्र में इन चीजों की जानकारी देना जरूरी है वरना बच्चों को घबराहट हो सकती है. 

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सही जानकारी से बढ़ता है आत्मविश्वास

किशोरावस्था वह समय है जब शरीर और मन दोनों में तेजी से बदलाव आते हैं. इस दौरान बच्चे अपनी पहचान बनाने के साथ-साथ समाज को भी समझने की कोशिश करते हैं. अगर उन्हें इस समय वैज्ञानिक जानकारी नहीं मिलती तो इसका प्रभाव केवल उनके स्वास्थ्य पर ही नहीं पड़ता, बल्कि उनके शिक्षा और मानसिक स्वास्थ्य पर भी दिखाई देता है.

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कक्षा में झिझक और चुप्पी

कई विद्यालयों में आज भी किशोरावस्था, शारीरिक बदलावों और प्रजनन स्वास्थ्य जैसे विषयों पर खुलकर चर्चा नहीं हो पाती. इन विषयों को अगर टाल दिया जाए तो बच्चे अपने सवाल पूछने में झिझक महसूस करते हैं. इसलिए यह जरूरी है कि स्कूलों में ऐसा बनाया जाए, जहां बच्चे बिना किसी डर या शर्म के अपने सवाल पूछ सकें और सही जानकारी प्राप्त कर सकें. 

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लड़कों को भी बातचीत का हिस्सा बनाना होगा

पीरियड्स और प्रजनन स्वास्थ्य को लंबे समय तक केवल लड़कियों का विषय माना जाता रहा है, लेकिन इसकी सही जानकारी लड़कों को भी देना जरूरी है. यही समझ स्वस्थ रिश्तों और बेहतर समाज की नींव बनती है. इसलिए लड़कों को भी एक वक्त के बात सही जानकारी देना जरूरी है. 

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सही जानकारी देना जरूरी है 

पीरियड्स, गर्भावस्था, यौन संचारित संक्रमण, HIV और प्रजनन स्वास्थ्य से जुड़ी सही जानकारी किशोरों को सुरक्षित और जिम्मेदार व्यवहार अपनाने में मदद करती है. वहीं, लड़कों के लिए यह जिम्मेदारी, सम्मान और संवेदनशीलता विकसित करने का अवसर बनती है.

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सवाल पूछने की आजादी से टूटते हैं भ्रम

जब बच्चों को घर या स्कूल में सही जानकारी नहीं मिलती तो वे इंटरनेट, दोस्तों या अधूरी जानकारियों पर निर्भर हो जाते हैं. इससे भ्रम और गलतफहमियां और अधिक बढ़ सकती हैं. इससे सम्मानजनक और खुला संवाद धीरे-धीरे जागरूकता को आत्मविश्वास में बदल देता है.

किस उम्र में शुरू करनी चाहिए बातचीत?

बच्चों को 8 से 10 साल की उम्र के बीच शरीर में होने वाले बदलावों और पीरियड्स के बारे में उम्र के अनुसार जानकारी देना शुरू कर देना चाहिए. ऐसा इसलिए क्योंकि कुछ लड़कियों में पीरियड्स 10 से 12 साल की उम्र में ही शुरू हो सकते हैं.  

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