आज के डिजिटल दौर में स्मार्टफोन पर एक क्यूआर (QR) कोड स्कैन करते ही आपकी ट्रेन यात्रा शुरू हो जाती है, लेकिन क्या आपको वह दौर याद है जब रेलवे स्टेशनों पर मोटे कार्डबोर्ड वाले टिकट मिला करते थे? अगर आपने आज से दो-तीन दशक पहले ट्रेन में सफर किया होगा, तो आपको याद होगा कि उन पीले या भूरे रंग के पक्के गत्ते वाले टिकटों में सफर के दौरान बारीक छेद कर दिए जाते थे. आम मुसाफिर अक्सर इसे छपाई की प्रक्रिया या महज एक सामान्य डिजाइन समझते थे.

क्या था इन छेदों का मुख्य उद्देश्य?


हालांकि रेलवे के इतिहास को खंगालें तो पता चलता है कि इन छोटे-छोटे छेदों के पीछे रेलवे प्रबंधन और सुरक्षा का एक बहुत बड़ा गणित छिपा हुआ था. ऑनलाइन बुकिंग और थर्मल प्रिंटेड पेपर टिकटों के आने से पहले, भारत सहित दुनिया के कई देशों में 'एडमंडसन' (Edmondson) शैली के कार्डबोर्ड टिकट चलन में थे. ये टिकट काफी मजबूत होते थे और इन्हें काउंटरों पर रखना बेहद आसान था.

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सफर के दौरान जब टिकट कलेक्टर या ट्रैवलिंग टिकट एग्जामिनर (TTE) यात्रियों के पास आते थे, तो वे अपने पास मौजूद एक टिकेट पंच मशीन से उस टिकट में छेद कर देते थे. इसके पीछे कई कारण थे.

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  1. मल्टीपल यूज और धोखाधड़ी पर लगाम: एक बार टिकट में छेद होने का सीधा मतलब होता था कि इस टिकट की जांच की जा चुकी है और यात्रा वैध हो चुकी है. इसके बाद कोई भी शातिर यात्री उस टिकट को किसी दूसरे व्यक्ति को दोबारा सफर करने के लिए नहीं सौंप सकता था.
  2. यात्रा के रूट और समय की निगरानी: कई रेल प्रणालियों में टिकट के किस हिस्से या किस पैटर्न में छेद किया गया है, इससे यह तय होता था कि टिकट किस स्टेशन या किस समय पर चेक हुआ है. यह व्यवस्था बिना किसी इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस के कर्मचारियों को तुरंत स्थिति समझने में मदद करती थी.

क्यों खत्म हो गया ये मैन्युअल तरीका?


मशीनीकरण के शुरुआती दौर में यह मैन्युअल तरीका बेहद कारगर और विश्वसनीय माना जाता था. यात्रियों को हिदायत दी जाती थी कि वे गंतव्य स्टेशन से बाहर निकलने तक अपने टिकट को संभालकर रखें, क्योंकि स्टेशन से बाहर आते समय भी उसकी दोबारा जांच हो सकती थी.

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    समय बदला और भारतीय रेलवे ने कंप्यूटर आधारित रिजर्वेशन सिस्टम (PRS) को अपनाया. इसके बाद थर्मल पेपर टिकट, स्मार्ट कार्ड और अब मोबाइल टिकटिंग एवं क्यूआर कोड ने इसकी जगह ले ली. डिजिटल वेरिफिकेशन के आने के बाद इन टिकटों पर मैन्युअल पंचिंग की जरूरत पूरी तरह खत्म हो गई.