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क्या आप जानते हैं कि भारत में लड़कियों के लिए पहला स्कूल किसने खोला था?

भारत में लड़कियों के लिए पहला आधुनिक स्कूल किसने खोला था? जानिए 1848 में सावित्रीबाई फुले और ज्योतिराव फुले ने पुणे के भिड़े वाडा में स्कूल क्यों शुरू किया था.

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आज लड़कियों का स्कूल जाना आम बात है. लेकिन करीब 175 साल पहले भारत में लड़कियों के लिए पढ़ाई के मौके बहुत कम थे. ऐसे समय में महाराष्ट्र के पुणे से एक ऐसी पहल शुरू हुई, जिसने लड़कियों की शिक्षा की दिशा बदलने में अहम भूमिका निभाई. इसे भारत में लड़कियों के लिए खास तौर पर बने पहले आधुनिक स्कूल के तौर पर पहचाना जाता है.

सावित्रीबाई और ज्योतिराव फुले ने खोला था स्कूल

साल 1848 में सावित्रीबाई फुले और ज्योतिराव फुले ने पुणे के भिड़े वाडा में लड़कियों के लिए एक स्कूल शुरू किया था. इसे भारत में लड़कियों के लिए शुरू किए गए पहले आधुनिक स्कूलों में से एक माना जाता है.

उस दौर में लड़कियों को औपचारिक शिक्षा दिलाने का चलन नहीं था. ऐसे समय में फुले ने लड़कियों को पढ़ाने की पहल की और समाज में एक नई मिसाल कायम की.

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कौन थीं सावित्रीबाई फुले?

सावित्रीबाई फुले शिक्षिका, कवयित्री और समाज सुधारक थीं. उन्होंने ऐसे समय में लड़कियों को पढ़ाने का काम शुरू किया, जब महिलाओं की शिक्षा को लेकर समाज में कई तरह की बंदिशें थीं.

ज्योतिराव फुले के सहयोग से उन्होंने शिक्षिका बनने की ट्रेनिंग ली और पुणे में लड़कियों को पढ़ाना शुरू किया. बाद में दोनों ने लड़कियों के साथ-साथ उन समुदायों के बच्चों की शिक्षा के लिए भी कई स्कूल शुरू किए, जिन्हें पढ़ाई के अवसर कम मिलते थे.

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भिड़े वाडा का स्कूल क्यों था खास?

भिड़े वाडा में शुरू हुआ यह स्कूल लड़कियों की शिक्षा के इतिहास में एक अहम पड़ाव माना जाता है. उस समय जब लड़कियों को स्कूल भेजना सामान्य नहीं था, इस पहल ने उन्हें पढ़ने और आगे बढ़ने का मौका दिया.

सावित्रीबाई फुले की कोशिशों ने लड़कियों की शिक्षा और सामाजिक बराबरी के मुद्दे को भी मजबूती दी. इसी वजह से उन्हें भारत के प्रमुख समाज सुधारकों में गिना जाता है.

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क्या है भिड़े वाडा?

पुणे का भिड़े वाडा वही ऐतिहासिक स्थान है, जहां 1848 में सावित्रीबाई और ज्योतिराव फुले ने लड़कियों के लिए स्कूल शुरू किया था.

सितंबर 2024 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसी जगह पर सावित्रीबाई फुले को समर्पित एक स्मारक की आधारशिला रखी थी. यह जगह आज भी भारत में लड़कियों की शिक्षा के संघर्ष और सामाजिक बदलाव की याद दिलाती है.

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