कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने तृणमूल कांग्रेस के नाम और चुनाव चिह्न के इस्तेमाल पर रोक लगाए जाने के मामले को लेकर चुनाव आयोग पर निशाना साधा है. उन्होंने चुनाव आयोग पर 'पार्टी तोड़ने' का आरोप लगाते हुए कहा कि 'पहले वोट चोरी होते थे, सरकार चोरी होती थी, अब तो पार्टी ही चोरी कर ली जा रही है. साथ ही उन्होंने कहा कि यह लड़ाई ममता बनर्जी की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह हर उस राजनीतिक दल और मतदाता की है जो स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव चाहता है।.
क्या बोले राहुल गांधी?
राहुल गांधी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा है, 'पहले शिवसेना, फिर NCP और अब तृणमूल कांग्रेस. हर बार एक ही पैटर्न - BJP और चुनाव आयोग मिलकर एक पार्टी को तोड़ते हैं. फिर उसका इलेक्शन सिंबल छीन लिया जाता है. जब पूरी की पूरी पार्टी चोरी हो सकती है, तो करोड़ों भारतीयों के वोट चोरी होना भी हैरानी की बात नहीं. वोट चोरी, सरकार चोरी, अब पार्टी चोरी - ये हमारे लोकतांत्रिक पतन के प्रतीक बन गए हैं.'
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साथ ही उन्होंने कहा, 'ECI की संवैधानिक जिम्मेदारी जनादेश की रक्षा करना है - मगर उल्टा वो उन ताकतों की मदद कर रहा है, जो जनता के फैसले को ही पलट देते हैं. यह लड़ाई सिर्फ ममता बनर्जी जी की नहीं है. यह हर राजनीतिक दल, हर मतदाता की लड़ाई है जो स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव चाहता है.'
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चुनाव आयोग ने तृणमूल कांग्रेस के दोनों गुटों को पश्चिम बंगाल के आगामी विधानसभा उपचुनाव के दौरान पार्टी के नाम और ‘जोड़ा फूल’ चुनाव चिह्न का इस्तेमाल न करने का गुरुवार को निर्देश दिया था. आयोग ने दोनों गुटों से शुक्रवार सुबह तक अपनी पसंद के नाम और चुनाव चिह्न सौंपने के लिए भी कहा था. इसके बाद ममता बनर्जी ने आधी रात में ही अपनी पसंद के नाम और सिंबल चुनाव आयोग को भेज दिए थे.
भाजपा का पलटवार
चुनाव आयोग पर राहुल गांधी के निशाने के बाद भाजपा ने पलटवार किया है. भाजपा नेता सुधांशु त्रिवेदी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके कहा कि राहुल गांधी बिना वजह आरोप लगाते रहते हैं. उन्होंने कहा कि राहुल गांधी को अपनी ही पार्टी का नहीं पता है, ना जानें कांग्रेस ने कितनी पार्टियों को निगल लिया है. कांग्रेस ने अपने वक्त में 9 राज्यों में विपक्ष की सरकार बर्खास्त की.
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साथ ही त्रिवेदी ने कहा कि कांग्रेस अपने नेताओं को ही खा जाती है. कांग्रेस से टूटकर ही एनसीपी और टीएमसी बनी थी.
क्या है विवाद?
निर्वाचन आयोग का यह आदेश उस बगावत के बाद आया है जो मई में विधानसभा चुनाव में हार के बाद तृणमूल कांग्रेस विधायक दल में शुरू हुई थी और बाद में संसद तक पहुंच गई थी. जून में, 58 बागी विधायकों ने ममता खेमे के उम्मीदवार सोवनदेब चट्टोपाध्याय के बजाय पार्टी से निकाले गए नेता रितब्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता चुना और विधानसभा अध्यक्ष से मान्यता हासिल की, जो 28 साल के इतिहास में पहली बार पार्टी में विभाजन का संकेत था.
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पांच दिन बाद, यह बगावत संसद तक पहुंच गई. वरिष्ठ नेता काकोली घोष दस्तीदार की अगुवाई में 20 लोकसभा सदस्यों ने नेशनलिस्ट सिटीजंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) पार्टी का दामन थामा और लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखकर अलग गुट के तौर पर भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए को समर्थन दिया. इससे पार्टी के संसदीय खेमे में दरार और गहरी हो गई.
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