सुप्रीम कोर्ट से केंद्र सरकार ने एक बड़ी और चौंकाने वाली मांग की है। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से जनहित याचिका (PIL) की व्यवस्था को खत्म करने का आग्रह किया है। इस मांग के पीछे सरकार ने दुरुपयोग का तर्क दिया है। केंद्र सरकार की इस मांग पर आज सुप्रीम कोर्ट में बहस हुई और CJI सूर्यकांत की ओर से जवाब भी दिया गया। केंद्र सरकार का कहना है कि जनहित याचिका को शुरू करने के पीछे का मकसद पूरा हो चुका है और अब इसका लोग दुरुपयोग करने लगे हैं तो इसे खत्म किया जाए।
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9 जजों की बेंच की याचिका पर सुनवाई और चर्चा
केंद्र सरकार की ओर से दायर याचिका को सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता ने पेश किया। वहीं सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली 9 जजों की बेंच याचिका पर सुनवाई कर रही है। बेंच में CJI सूर्यकांत के अलावा जस्टिस बीवी नागरत्ना, जस्टिस एमएम सुंदरेश, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, जस्टिस प्रसन्ना बी वराले, जस्टिस आर महादेवन और जस्टिस जॉयमाल्या बागची शामिल हैं।
सॉलिसिटर जनरल की सरकार के पक्ष में दलीलें
तुषार मेहता ने सरकार के पक्ष में दलील दी कि पिछले 50 साल में PIL को लेकर जो लक्ष्य निर्धारित किया गया था, वह पूरा हो चुका है। क्योंकि आज देश की न्याय व्यवस्था काफी सरल और पारदर्शी हो गई तो PIL को या तो खत्म कर दिया जाए या इसमें बदलाव करके इसे नए सिरे से लागू कर दिया जाए। देश में राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) और जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DALSA) मौजूद हैं, जो आज जरूरतमंद लोगों को मुफ्त कानूनी सलाह और मदद देते हैं।
वहीं ई-फाइलिंग सिस्टम ने हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक लोगों की पहुंच को आसान बना दिया है। एक लेटर लिखकर लोग सीधे अदालत पहुंच सकते हैं। आजकल PIL प्रेरित होकर दायर की जाती हैं, यानी PIL दायर किसी के द्वारा की जाती हैं और इनके दायर होने की वजह कुछ और ही होती है। PIL गरीबी, अशिक्षा, विकलांगता या सामाजिक बहिष्कार के कारण अदालत का दरवाजा खटखटाने में अक्षम लोगों के लिए शुरू हुई थी, लेकिन आज देश में स्थिति बदल गई है।
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सरकार की मांग पर क्या बोले CJI सूर्यकांत?
बता दें कि सॉलिसिटर जनरल की दलीलों पर CJI सूर्यकांत ने सहमति जताते हुए कहा कि अदालतें जनहित याचिका को लेकर सतर्क हो गई हैं। अदालतें अब PIL स्वीकार करने से पहले बहुत सावधानी बरतती हैं। इसे दायर करने की वजहों की बारीकी से जांच करती हैं। अब उन याचिकाओं पर नोटिस जारी होते हैं, जिनमें कोई दम या ठोस आधार होता है। 2006 से 2026 तक तक 20 साल में बहुत कुछ बदल गया है। हो सकता है कि आगे जाकर जनहित याचिका (PIL) की जरूरत ही न पड़े।
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