भारत में पेट्रोल और डीज़ल की कीमतें केवल अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों से तय नहीं होतीं, बल्कि यह केंद्र और राज्य सरकारों के टैक्स ढांचे, तेल विपणन कंपनियों (OMCs) की लागत और वैश्विक ऊर्जा संकटों के बीच संतुलन का परिणाम हैं.
राज्यों के टैक्स से तय होती है पंप की कीमत
देश में केंद्र सरकार का एक्साइज ड्यूटी सभी राज्यों में समान रहता है, लेकिन अंतिम खुदरा कीमत राज्य-स्तरीय वैट (VAT) और अन्य सेस के कारण बदल जाती है.
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इसी वजह से एक ही ईंधन की कीमत अलग-अलग राज्यों में काफी भिन्न है.
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राज्यवार पेट्रोल कीमतें (₹/लीटर):
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- आंध्र प्रदेश: ₹117.8
- तेलंगाना: ₹115.7
- केरल: ₹112.3
- मध्य प्रदेश: ₹111.4
- पश्चिम बंगाल: ₹109.8
- महाराष्ट्र: ₹108.5
- कर्नाटक: ₹107.7
- तमिलनाडु: ₹105.6
- दिल्ली: ₹99.5
- उत्तर प्रदेश: ₹99.5
- गुजरात: ₹96.1 जिन राज्यों में VAT अधिक है वहां कीमतें ₹112 प्रति लीटर से भी ऊपर पहुंच रही हैं, जबकि कम टैक्स वाले राज्यों में यह ₹100 के आसपास है.
2026 में ईंधन कीमतों पर वैश्विक झटके का असर
रूस-यूक्रेन युद्ध (2022) और 2026 के हॉर्मुज़ संकट के चलते अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतें कई बार $100 प्रति बैरल से ऊपर पहुंचीं.
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इस दबाव के बावजूद भारत में कई बार टैक्स और खुदरा कीमतों में हस्तक्षेप किया गया .
2021–2026: ईंधन कीमतों में प्रमुख बदलाव
- 4 नवंबर 2021: पेट्रोल -₹5, डीज़ल -₹10
- 21 मई 2022: पेट्रोल -₹8, डीज़ल -₹6
- 14 मार्च 2024: -₹2/-₹2
- अप्रैल 2025: -₹2/-₹2
- 27 मार्च 2026: पेट्रोल -₹10, डीज़ल -₹10 (डीज़ल पर एक्साइज शून्य)
- 15 मई 2026: +₹3/+₹3
- 19 मई 2026: +₹0.87/+₹0.91
- 23 मई 2026: +₹0.87/+₹0.91
हाल के संशोधनों के साथ 2026 में लगातार तीन बार यानि 15 को पेट्रोल डीजल की कीमतों में ₹3 की बढ़ोतरी की गई , 19 मई को पेट्रोल की कीमत ₹0.87 और डीजल की कीमत ₹0.91 बढ़ाई गई, वही आज यानि 23 मई को एक बार पेट्रोल और डीजल की कीमत क्रमशः ₹0.87 और ₹0.91 OMC के द्वारा बढ़ाई गई है .
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सरकार की नीति: टैक्स कट बनाम ऑयल बॉन्ड मॉडल
UPA सरकार ने 2005–2010 के बीच करीब ₹1.34 लाख करोड़ के ऑयल बॉन्ड जारी किए थे. यह देनदारी आज की सरकार द्वारा ब्याज सहित चुकाई जा रही है.
इसके विपरीत, मौजूदा नीति में सरकार टैक्स सीधे घटाकर उपभोक्ता को राहत देने का प्रयास करती है, जिससे राजस्व पर तत्काल असर पड़ता है.
ऊर्जा संकट में भारी वित्तीय दबाव
2026 के हॉर्मुज़ संकट और वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल के दौरान—
- पेट्रोल पर लगभग ₹24/लीटर और डीज़ल पर ₹30/लीटर तक का बोझ OMCs ने उठाया
- 84 दिनों के संकट काल में भारी अंडर-रिकवरी दर्ज की गई
- कुल सरकारी/OMC नुकसान लगभग ₹30,000 करोड़ तक पहुंचा
इसके अलावा 2021–24 और LPG सब्सिडी के कारण भी हजारों करोड़ रुपये का वित्तीय दबाव बना रहा.
केंद्र का कदम
27 मार्च 2026 को सरकार ने बड़ा फैसला लेते हुए—
- पेट्रोल पर ₹10 और डीज़ल पर ₹10 एक्साइज ड्यूटी घटाई
- डीज़ल पर निर्यात शुल्क लगाया गया ताकि घरेलू सप्लाई सुरक्षित रहे
सरकारी बयान के अनुसार, इसका उद्देश्य OMCs की भारी अंडर-रिकवरी को कम करना था, न कि तुरंत उपभोक्ता कीमत घटाना.
भारत में पेट्रोल-डीज़ल की कीमतें तीन हिस्सों पर निर्भर करती हैं—
- केंद्र का टैक्स
- राज्यों का VAT
- OMCs की लागत और अंडर-रिकवरी
इसलिए केंद्र द्वारा टैक्स कट के बावजूद, बढ़ती अंतरराष्ट्रीय कीमतों और कंपनियों के नुकसान की भरपाई के कारण पंप पर तुरंत राहत नहीं दिखी. भारत की ईंधन मूल्य प्रणाली एक “मल्टी-लेयर फाइनेंशियल मॉडल” है, जिसमें केंद्र, राज्य और तेल कंपनियां मिलकर कीमत तय करती हैं.
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2022 से 2026 के बीच वैश्विक ऊर्जा संकटों ने इस प्रणाली को लगातार दबाव में रखा है.अभी भी अंतरराष्ट्रीय बाजार और घरेलू टैक्स संरचना के कारण कीमतों में उतार-चढ़ाव जारी है.