Kumar Gaurav
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केंद्र सरकार डिलिमिटेशन बिल 2026 को लोकसभा में 16 अप्रैल को पेश करने की तैयारी में है. इस बिल का मकसद देश भर के निर्वाचन क्षेत्र का नए सिरे से पुनर्निर्धारण करना है. सरकार के मुताबिक, मौजूदा सीटों का बंटवारा पुराने जनसंख्या आंकड़ों पर आधारित है, जिससे कई राज्यों में प्रतिनिधित्व का संतुलन प्रभावित हुआ है. अब प्रस्तावित बिल के तहत 2011 की जनगणना के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण किया जाएगा.
बिल में एक डिलिमिटेशन आयोग के गठन का प्रावधान है. इसमें सुप्रीम कोर्ट के वर्तमान या पूर्व न्यायाधीश, चुनाव आयोग के प्रतिनिधि और राज्य चुनाव आयुक्त शामिल होंगे. यह आयोग देश भर के चुनावी क्षेत्रों की नई सीमाएं तय करेगा.
आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद उन्हें आमतौर पर न्यायिक चुनौती नहीं दी जा सकती, जिससे यह प्रक्रिया निर्णायक मानी जाती है.
इस पूरी प्रक्रिया को महिला आरक्षण कानून (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) से भी जोड़ा गया है. इसके तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में करीब एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने का प्रावधान है, जो डिलिमिटेशन के बाद लागू होगा.
यह कदम प्रतिनिधित्व को अधिक संतुलित बना सकता है, हालांकि राज्यों के बीच सीटों के अनुपात में बदलाव और इसके राजनीतिक प्रभाव को लेकर बहस भी तेज हो सकती है.
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