खामेनेई सरकार के खिलाफ शुरू हुई लड़ाई अब अमेरिका और ईरान के बीच के तनाव की वजह बन गई है. अमेरिका आए दिन ईरान को खुली धमकी दे रहा है. ईरान के सुप्रीम लीडर अली खामेनेई के लिए अपनी कुर्सी बचाना मुश्किल हो गया है. अगर ईरान में तख्तापलट हो जाता है तो वहां एक नए दौर की शुरुआत होगी. लेकिन क्या आप जानते हैं कि ईरान में इस्लामिक क्रांति से पहले भारत के साथ उसके रिश्ते कैसे थे. चलिए इस बारे में विस्तार से चर्चा करते हैं.
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1950 में भारत-ईरान में हुई दोस्ती की डील
आजादी से पहले पंडित जवाहरलाल नेहरू ने ईरान से रूस की सेना को हटाने की मांग की सराहना की थी. नेहरू ने सोवियत संघ के खिलाफ नहीं जाना चाहते थे. ईरान भारत के साथ अच्छा बर्ताव करता था. मार्च, 1947 में नई दिल्ली में आयोजित एशियाई संबंध सम्मेलन में भी ईरान शामिल हुआ. ईरान के प्रतिनिधि ने भारत को आजादी की बधाई दी. दोनों के बीच 15 मार्च, 1950 को एक एग्रीमेंट पर रजामंदी बनी, जिसके मुताबिक दोनों में दोस्ती और शांति बनाए रखने पर समझौता हुआ.
कैसे रहे भारत-ईरान के रिश्ते?
ईरान का झुकाव पश्चिम की ओर हो गया और भारत ने गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाई. देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने ये साफ कर दिया कि भारत किसी भी गुट में शामिल नहीं होगा. इन्हीं वजहों से ईरान और भारत के संबंध तय हुए. नेहरू गमाल अब्देल नासिर को अरब दुनिया के नेता के तौर पर समर्थन दे रहे थे जो ईरान के शाह को अच्छा नहीं लगा.
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पाकिस्तान के साथ थी करीबी
ईरान और पाकिस्तान के बीच अच्छे रिश्ते थे. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली खान ने मई 1949 में ईरान का दौरा किया और शाह ने मार्च 1950 में पाकिस्तान का दौरा किया. उसी महीने ईरान और पाकिस्तान के बीच दोस्ती की संधि पर बात बन गई. ईरान के शाह 1956 में पहली बार भारत आए. वो लगातार नेहरू को ये विश्वास दिलाने की कोशिश कर रहे थे कि पाकिस्तान के साथ उनकी दोस्ती से भारत को कोई खतरा नहीं है.
भारत-पाक युद्ध में क्या था ईरान का रुख?
भारत-चीन युद्ध के दौरान, ईरान खुलकर भारत के समर्थन में खड़ा रहा. लेकिन 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान उसने पाकिस्तान का साथ दिया. ईरान ने 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान भी उसी का साथ दिया. हालांकि बाद में शाह ने कहा कि वो भारत के खिलाफ लड़ाई में पाकिस्तान की मदद नहीं करेंगे.
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