Breast Cancer: 5 सेकंड से कम समय में सलाइवा से गंभीर ब्रेस्ट कैंसर का चलेगा पता

Breast Cancer: ब्रेस्ट कैंसर एक प्रकार का कैंसर है जो ब्रेस्ट के टिश्यू में सेल्स के बढ़ने के साथ ही शुरू होता है, लेकिन कई लोगों को इसकी जानकारी नहीं होती है और ज्यादा देर होने पर आपको गंभीर परिणाम झेलने पड़ते हैं। 

breast cancer

ब्रेस्ट कैंसर Image Credit: Freepik

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हालांकि, गांव में अब ज्यादातर सभी एडवांस हैं, लेकिन फिर भी महिलाओं की बात आती है, तो जाहिर सी बात है, कहीं न कहीं जानकारी का अभाव रहता है। अब बात यहां ब्रेस्ट कैंसर की हो रही है, तो कई महिलाएं घर के कामों में इतना उलझी रहती हैं कि खुद के लिए समय नहीं निकाल पाती हैं। इसका परिणाम यही होता है कि अगर वो बीमार भी हो रही हैं, तो ज्यादातर इस चीज को नजरअंदाज कर देती हैं। ब्रेस्ट कैंसर को लेकर महिलाओं में अधिकतरों को नहीं पता चल पाता है कि इस बीमारी की शुरुआत हो गई है या अगर है तो इलाज में देरी कर देती है।

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देखा जाए तो दुनिया में ब्रेस्ट कैंसर की दर बढ़ रही है, लेकिन इसका पता लगाना मुश्किल हो जाता है, लेकिन अब जल्दी पता लगाने के लिए एक नया इक्विपमेंट आशा की किरण लेकर आया है। फ्लोरिडा यूनिवर्सिटी और ताइवान में नेशनल यांग मिंग चियाओ तुंग यूनिवर्सिटी के रिसर्चरों ने एक हैंडहेल्ड ब्रेस्ट कैंसर स्क्रीनिंग इक्विपमेंट बनाया है।

रिसर्च क्या कहती है 

जर्नल ऑफ वैक्यूम साइंस एंड टेक्नोलॉजी बी में प्रकाशित, बायोसेंसर ग्लूकोज परीक्षण स्ट्रिप्स और एक Arduino प्लेटफॉर्म जैसे सामान्य कंपोनेंट का इस्तेमाल करता है। यह पांच सेकंड से कम समय में लार के एक छोटे से नमूने से ब्रेस्ट कैंसर बायोमार्कर (HER2 and CA15-3) का पता लगाता है।

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एचईआर2 और सीए 15-3 के कारण ब्रेस्ट कैंसर सेल्स बहुत तेजी से विकसित होने की ओर बढ़ने लगती हैं, जिससे इसका इलाज करना मुश्किल हो जाता है।

यह तकनीक पारंपरिक ब्रेस्ट कैंसर स्क्रीनिंग मेथड के लिए संसाधनों की कमी वाले क्षेत्रों में विशेष रूप से काम की हो सकती है।

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लेखक ह्सियाओ-ह्सुआन वान ने कहा कि ये खासकर समुदायों या अस्पतालों में बायोसेंसर ब्रेस्ट कैंसर की जांच पर प्रभाव डाल सकता है।

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डिवाइस की पोर्टेबिलिटी, लगभग किसी के हाथ के साइज की, उसकी दोबारा लागू करने के साथ ही मिलकर इसे स्क्रीनिंग के लिए एक अच्छा ऑप्शन बनाती है।

क्या है प्रोसेस 

इस प्रोसेस में पेपर टेस्ट स्ट्रिप्स शामिल हैं, जिसमें लार का नमूना लगातर बिजली के वाइब्रेशन से गुजरता है, जो बायोमार्कर को एंटीबॉडी के साथ बांध देता है। यह चार्ज और कैपेसिटी को बदल देता है, जिसके सिग्नल में बदलाव होता है। फिर इसे मापा जाता है और डिजिटल जानकारी में ट्रांसलेट किया जाता है, जिससे मौजूद बायोमार्कर की कंसंट्रेशन के बारे में जानकारी मिलती है।

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मैमोग्राम, अल्ट्रासाउंड और एमआरआई जैसे तरीकों की तुलना में, बायोसेंसर डिजाइन सबसे क्रांतिकारी तरीका है। ये तरीके न केवल महंगे हैं, बल्कि स्पेशल इक्विपमेंट की भी जरूरत होती है, लोगों को कम खुराक वाले रेडिएशन के संपर्क में लाया जाता है, और अक्सर टेस्ट के परिणामों के लिए लंबे समय तक इंतजार करना पड़ता है।

बायोसेंसर को केवल लार की एक बूंद की जरूरत होती है, जो प्रति मिलीलीटर कैंसर बायोमार्कर के एक फेमतोग्राम की मामूली फोकस के साथ भी सटीक परिणाम दे सकता है और इस घातक बीमारी के खिलाफ लड़ाई में एक महत्वपूर्ण कदम है।

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Disclaimer: उपरोक्त जानकारी पर अमल करने से पहले अपने डॉक्टर या किसी हेल्थ एक्सपर्ट की राय जरूर ले लें। News24 की ओर से कोई जानकारी का दावा नहीं किया जा रहा है।

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