What is Israel Gospel AI System: आज की दुनिया में युद्ध का तरीका तेजी से बदल रहा है. पहले लड़ाइयां मैदान में सैनिकों, टैंकों और मिसाइलों से लड़ी जाती थीं, लेकिन अब इसका एक बड़ा हिस्सा कंप्यूटर स्क्रीन के पीछे तय होने लगा है. मॉर्डन टेक्निक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने जंग की प्लानिंग को पूरी तरह बदल दिया है. इसी कड़ी में इजराइल की सेना एक ऐसे AI सिस्टम का इस्तेमाल कर रही है, जो कुछ ही सेकंड में हजारों जानकारियों को खंगाल के यह तय कर सकता है कि हमला कहां करना है. इस सिस्टम का नाम ‘गॉस्पेल’ या ‘हब्सोरा’ है. यह तकनीक जहां एक तरफ सैन्य रणनीति को तेज और सटीक बनाती है, वहीं इसके इस्तेमाल को लेकर कई सवाल और विवाद भी खड़े हो रहे हैं.
क्या है गॉस्पेल या हब्सोरा सिस्टम
गॉस्पेल या हब्सोरा इजराइल की सेना का बनाया एक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सिस्टम है. इसे इजराइल की खुफिया इकाई Unit 8200 ने तैयार किया है. यह सिस्टम बड़ी मात्रा में डेटा को बेहद तेजी से प्रोसेस करने की क्षमता रखता है. इसका काम अलग-अलग स्रोतों से मिली जानकारी को जोड़कर संभावित सैन्य ठिकानों की पहचान करना है. इसे ऐसे समझा जा सकता है जैसे एक डिजिटल एक्सपर्ट, जो लगातार युद्ध क्षेत्र से जुड़े डेटा पर नजर रखता रहता है.
---विज्ञापन---
कैसे जुटाता है जानकारी?
यह AI सिस्टम कई तरह के सोर्से से डेटा इकट्ठा करता है और उन्हें आपस में जोड़कर एनालाइज करता है. इसमें सैटेलाइट से ली गई तस्वीरें शामिल होती हैं, जिनसे जमीन पर होने वाली गतिविधियों पर नजर रखी जाती है. इसके अलावा ड्रोन से मिलने वाला लाइव वीडियो भी सिस्टम तक पहुंचता है. इलेक्ट्रॉनिक सिग्नल जैसे मोबाइल फोन कॉल, रेडियो मैसेज और इंटरनेट गतिविधियों को भी यह सिस्टम पढ़ता है. साथ ही पहले से मौजूद खुफिया रिकॉर्ड और संदिग्ध ठिकानों का पुराना डेटा भी इसमें शामिल किया जाता है.
---विज्ञापन---
सेकंड्स में तय हो जाता है संभावित टारगेट
इन सभी जानकारियों को जोड़ने के बाद सिस्टम यह विश्लेषण करता है कि किस इलाके में संदिग्ध गतिविधि हो रही है. उदाहरण के तौर पर किसी घर में असामान्य हलचल, हथियारों के भंडारण की आशंका या किसी जगह से रॉकेट लॉन्च होने की संभावना जैसी चीजें AI के जरिए पहचान ली जाती हैं. इसके बाद सिस्टम संभावित ठिकानों की एक सूची तैयार करता है, जिसे सैन्य अधिकारियों के सामने रखा जाता है. अंतिम निर्णय सेना के अधिकारियों का होता है, लेकिन शुरुआती विश्लेषण काफी हद तक मशीन ही करती है.
इंसानों के मुकाबले 50 गुना तेज
इस सिस्टम की सबसे बड़ी खासियत इसकी रफ्तार है. पहले सैन्य खुफिया एजेंसियों के अधिकारी नक्शों, तस्वीरों और दस्तावेजों की जांच करके महीनों की मेहनत के बाद सीमित संख्या में टारगेटतय कर पाते थे. कई बार करीब 20 विशेषज्ञ अधिकारियों की टीम पूरे साल काम करके मुश्किल से 50 से 100 संभावित लक्ष्यों की पहचान कर पाती थी. लेकिन ‘गॉस्पेल’ सिस्टम इस प्रक्रिया को बेहद तेज बना देता है. यह कुछ ही दिनों में सैकड़ों संभावित ठिकानों की पहचान कर सकता है और एक दिन में लगभग 100 टारगेटतक सुझाने की क्षमता रखता है. इसी वजह से इसे इजराइल सेना के अंदर ‘टारगेटफैक्ट्री’ भी कहा जाता है.
ये भी पढ़ें- ‘ईरान से निपट लें पहले फिर…’, डोनाल्ड ट्रंप का अगला टारगेट भी सेट, बताया Iran के बाद किस देश की है बारी?
गाजा युद्ध में हुआ इस्तेमाल
इस तकनीक की झलक पहली बार 2021 के संघर्ष के दौरान देखने को मिली थी, लेकिन 2023 के गाजा युद्ध में इसका इस्तेमाल बड़े स्तर पर किया गया. रिपोर्टों के मुताबिक इस सिस्टम की मदद से इजराइल की सेना ने हजारों संभावित ठिकानों की पहचान की. अनुमान है कि इस तकनीक के जरिए 12,000 से ज्यादा संभावित लक्ष्यों को चिन्हित किया गया, जिससे सैन्य कार्रवाई की रफ्तार काफी बढ़ गई.
फायर फैक्ट्री के साथ मिलकर करता है काम
‘गॉस्पेल’ सिस्टम अकेले काम नहीं करता. इसके साथ एक और टेक्निकल सिस्टम जुड़ा होता है, जिसे ‘फायर फैक्ट्री’ कहा जाता है. जब गॉस्पेल संभावित टारगेट की पहचान कर लेता है, तो फायर फैक्ट्री यह तय करता है कि उस लक्ष्य पर हमला कैसे किया जाएगा. इसमें यह भी तय होता है कि कौन-सा फाइटर जेट जाएगा, किस तरह का हथियार इस्तेमाल होगा और हमला किस समय किया जाएगा. इस तरह निशाना चुनने से लेकर हमले की योजना तक का बड़ा हिस्सा तकनीक की मदद से तय होता है.
गॉस्पेल और लैवेंडर सिस्टम में क्या फर्क है?
इजराइल की सैन्य तकनीक में गॉस्पेल के साथ एक और AI सिस्टम का जिक्र होता है, जिसे Lavender AI सिस्टम कहा जाता है. दोनों सिस्टम का उद्देश्य अलग-अलग है. गॉस्पेल मुख्य रूप से इमारतों, सुरंगों या संभावित सैन्य ठिकानों की पहचान करता है. दूसरी तरफ लैवेंडर का फोकस इंसानों पर होता है. यह बड़ी आबादी के डेटा को स्कैन करके हर व्यक्ति को एक स्कोर देता है, जिससे यह अनुमान लगाया जाता है कि उसकी गतिविधियां किसी उग्रवादी संगठन से कितनी मेल खाती हैं. सरल शब्दों में कहें तो गॉस्पेल यह तय करता है कि हमला कहां करना है, जबकि लैवेंडर यह बताता है कि किसे निशाना बनाया जा सकता है.
AI सिस्टम को लेकर विवाद और सवाल
हालांकि इस टेक्निक ने युद्ध की प्लानिंग को तेजी से बदल दिया है, लेकिन इसके इस्तेमाल को लेकर कई तरह सवाल भी सामने आएं हैं. आलोचकों का कहना है कि मशीनें केवल डेटा के आधार पर फैसला करती हैं और उनमें मानवीय संवेदनाएं नहीं होतीं. अगर किसी निर्दोष व्यक्ति का संपर्क गलती से किसी संदिग्ध व्यक्ति से जुड़ जाए, तो AI उसे भी खतरे के रूप में चिन्हित कर सकता है. इसके अलावा मशीन यह भी नहीं समझ पाती कि किसी इमारत के आसपास नागरिक या बच्चे मौजूद हो सकते हैं. ऐसे मामलों में अगर कोई गलती होती है, तो यह सवाल उठता है कि उसकी जिम्मेदारी आखिर किसकी होगी सिस्टम बनाने वालों की या उस अधिकारी की जिसने उसके आधार पर कार्रवाई की.
यहां क्लिक कर पढ़ें जंग से जुड़ा हर अपडेट